घर के ऊपर घर को देखा
और भागते शहर को देखा

किसे होश है एक दूजे की
मजलूमों पे कहर को देखा

तोता भी है मैना भी है
मगर प्यार में कसर को देखा

हाथ मिलाते लोगों के भी
मुस्कानों में जहर को देखा

चकाचौंध है अंधियारे में
थकी थकी सी सहर को देखा

एक से एक भक्त लक्ष्मी के
कोमलता पे असर को देखा

पानी को अब खेत तरसते
शहर बीच में नहर को देखा

बढ़ता जंगल कंकरीट का
जहाँ सिसकते शजर को देखा

यहाँ काफिया यह रदीफ है
सुमन तो केवल बहर को देखा

3 comments:

  1. यहाँ काफिया यह रदीफ है
    सुमन तो केवल बहर को देखा

    अच्छी रचना सुमन जी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. हाथ मिलाते लोगों के भी
    मुस्कानों में जहर को देखा
    अच्छी रचना...

    उत्तर देंहटाएं

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