इधर हाल में जिन युवा जनवादी कवियों ने अपनी सहज पहचान बनाई है उसमें सुरेश सेन निशांत प्रमुख है। जनपद में रहकर अच्छी एवं अर्थवान कविता सम्भव है यह उनकी कविताओं को पढ़कर जाना जा सकता है। 

अंकिता प्रकाशन गाजियाबाद उत्तर प्रदेश से प्रकाशित उनके कविता संग्रह ‘‘ वे जो लकड़हारे नहीं हैं ’’ उनकी समाज के प्रति वेदना अभिव्यक्ति है। उनकी कविता नागार्जुन, केदार बाबू एवं त्रिलोचन की परम्परा को विकसित करती प्रतीत होती है। 

विजेन्द्र जी के शब्दों में ‘‘ लोक या सर्वहारा ही निशांत की कविता के केन्द्र में है। उनकी कविता के चरित्र, परिवेश और खुरदरे भू-दृष्य बताते  हैं कि कहीं भागना दौड़ना नहीं है। वह सब हमारे आस-पास ही बिखरा है...........। निषांत जी के कविता संग्रह ‘‘ वे जो लकड़हारे नहीं हैं ’’ से उद्धृत कविता छोटे माहम्मद प्रस्तुत है।

छोटे मोहम्मद-
छोटे मोहमद....!
पक गए दिखते हैं
देवकी के बगीचे के आम
चलो चुपक से
सुग्गों से पहले वहां पहुंच जाएं
दो-चार आम चुरा ले आएं
अपने एकान्त में
उनकी मिठास का
जी भर आन्द उठाएं

इस जेठ की दुपहरी में
सोए हुए हैं घर वाले
हवा बेठी है गुमसुम
भीगी बिल्ली सी
न्दी भी होगी अकेली
चलो ! नदी तक हो आएं
अपनी शरारतों में
उसे भी शामिल करें
संग उसके
खूब धमा-चौकड़ी मचाएं
और नदी को बताए बिना
उसके तलछट से
मोतियों और सीप जैसे
कुछ सुन्दर पत्थर समेटे लाएं

छोटे मुहम्मद!
खेतों में भुट्टे
कतने लगे हैं सूत
प्हरेदारी में खड़े हो गए हैं बिजूके
लगता है भर गया है दानों में रस।

चलो! श्रस भरे भुट्टों को
चोरी से तोड़ें
खडड् के किनारे भूनें
और मजे से खाएं
पर मुंह और हाथ से उठती
भुट्टों की भीनी गंध से
मं के हाथों पकड़े जाएं
छोटे मोहम्मद

अब नहीं रहा
वैसी शरारतों का मौसम
न रहे वो रस भरे आम के पेड़
न नदी ही रही उतनी चंचल
भुट्टों के खेतों में
बिजूके की जगह
खड़े हैं लठेत।

और झुलसे हुए हैं रिश्तों के भी चेहरे
किसकी लगाई आग है यह
जो दिखती नहीं
फिर भी झुलसा रही है
हमारे तन और मन को

छोटे मुहम्मद !
आओ सोचें कुछ
बीता जा रहा है मौसम
बच्चे हो रहे हैं बड़े
वहीं वे भी न झलसे
हमारी तुम्हारी तरह
इस नफरत की भयावह आग में।

5 comments:

  1. साहित्य शिल्पी पर आ कर दिन बन जाता है। निशांत जी की यह बहुतकुछ कहती हुई कविता है।

    छोटे मुहम्मद !
    आओ सोचें कुछ
    बीता जा रहा है मौसम
    बच्चे हो रहे हैं बड़े
    वहीं वे भी न झलसे
    हमारी तुम्हारी तरह
    इस नफरत की भयावह आग में।

    उत्तर देंहटाएं
  2. और झुलसे हुए हैं रिश्तों के भी चेहरे
    किसकी लगाई आग है यह
    जो दिखती नहीं
    फिर भी झुलसा रही है
    हमारे तन और मन को

    बहुत अच्छी कविता---बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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