सूरजप्रकाश समकालीन कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है। अपनी वेबसाईट पर सूरजप्रकाश अपना ही परिचय देते हुए लिखते हैं कि -

 "अपने लेखन के बारे में और अपने किये और न किये गये कामों के बारे में अब कोई भ्रम नहीं पालता। मैं ये स्वीकार करता हूं कि मैं पूरे जीवन में कोई भी बड़ा तीर नहीं मार सका और न ही मैंने अपने लेखन के ज़रिये कोई क्रांति ही की है। मुझे जितने लोग चाहने वाले हैं, उससे ज्यादा न चाहने वाले होंगे। मैं सीधा सादा जीवन जीता हूं और संतुष्ट रहता हूं। मैंने देखा है कि दुनिया में एक से बढ़ कर एक तीस मार खां भरे पड़े हैं और अपुन की कहीं कोई गिनती नहीं है। हां, इतना ज़रूर है कि ईमानदार जीवन जीया अपनी सामर्थ्य भर परिवार, समाज और देश के प्रति अपने छोटे मोटे कर्तव्य निभाता रहा। बेशक दूसरों के लिए ज्यादा काम करना चाहिये था और कर भी सकता था।......। पैंतीस बरस की उम्र में लिखना शुरू किया। अब तक तीस पैंतीस कहानियां, पचास के करीब व्यंग्य, दो उपन्यास और तीस चालीस लघु कथाएं लिखीं। अंग्रेज़ी और गुजराती से कुछेक महत्वपूर्ण किताबों के अनुवाद किये। कुछेक किताबों का संपादन किया। रेडियो, दूरदर्शन पर भागीदारी की। कहानी संग्रह और उपन्यास पर एमफिल और पीएचडी के लिए कार्य हुए। कुछ कहानियां दूरदर्शन पर आयीं। एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग मेरे हिस्से में भी आया"

यही साफगोई और बेबाकी उनकी रचनाओं में भी दिखाई पडती है। आज उनके साथ हुए पुराने संवादों और वार्तालापों को उलट-पलट रहा था तो नये कहानीकारों के लिये उनके विचारों पर केन्द्रित आलेख मिला। फरीदाबाद में उनसे मुलाकात के दौरान उन्होंने अपनी कुछ लघुकथाओं के साथ यह दस्तावेज़ मुझे दिया था। सूरजप्रकाश जी की लघुकथायें साहित्यशिल्पी पर निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है कहानी को ले कर उनके विचार विशेषकर उनके लिये जो कहानी विधा पर कार्य कर रहे हैं।

प्रस्तोता: - राजीव रंजन प्रसाद।

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प्रेम चंद नें कहानी के प्रमुख लक्षणों को बताते हुए लिखा है “ कहानी एसी रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य होता है।उसके चरित्र, उसकी शैली तथा उसका कथाविन्यास सभी उसकी एक भाव को पुष्ट करते हैं। उपन्यास की भाँति उसमें मानव जीवन का संपूर्ण वृहत रूप दिखाने का प्रयास नहीं किया जाता न उसमें उपन्यास की भाँति सभी रसों का सम्मिश्रण होता है, वह एसा रमणीक उद्यान नहीं जिसमें भाँति भाँति के फूल-बेल बूटे सजे हुए हैं, बल्कि वह एक गमला है जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर होता है। कहानी की मूलभूत विषेशता पर प्रेमचंद का कहना है कि जब तक वे किसी घटना या चरित्र में कोई ड्रामाई पहलू नहीं पहचान लेते तब तक कहानी नहीं लिखते (श्री मदनलाल की पुस्तक, “कलम का मजदूर: प्रेमचंद” पृष्ठ-266)। ड्रामाई पहलू का अर्थ है कोई सघन, केन्द्रित और तनावपूर्ण प्रसंग। इसी कारण कहानी में संक्षिप्तता, सघनता, और प्रभाव की एकदेशीय केन्द्रीयता, सृजनशील नीयम अथवा गुण माने गये हैं।


कहानी लेखन पर मेरे अपने कुछ विचार हैं:-

• कहानी की पहली और आखिरी शर्त है उसकी पठनीयता। कहानी अगर खुद को पढ़वा नहीं ले जाती तो उस पर और काम करने की ज़रूरत है।

• कहानी की भाषा और शैली को ले कर हमेशा नये प्रयोग करते रहें लेकिन देखें कि कहीं शैली के प्रयोग के चक्‍कर में कहानी का दम ही न घुट जाये।

• अपनी शैली को दोहरायें नहीं बल्कि हर बार नये प्रयोग करें।

• कहानी लिखते समय अपनी विद्वता के साथ साथ पाठक के स्‍तर को भी ध्‍यान में रखें।

• कहानी ऐसी हो कि ज़रूरत पढ़ने पर उसे मुंह जुबानी सुना सकें या रेडियो आदि पर सुनाते समय उसे पढ़ते समय अटकें नहीं।

• मास्‍टर्स को खूब पढ़ें, ये देखने के लिए पढ़ें कि आखिर क्‍या है उनकी कहानियों में जो देश, काल और भाषा की सारी दूरियों के बावजूद हमारी स्‍मृति में बनी रहती हैं।

• अपने समकालीनों की रचनाओं को पढ़ें ताकि आपको पता चले कि आपके समकालीन अपने वक्‍त की सच्‍चाइयों को अपनी रचनाओं में किस तरह से उतारते हैं।

• नियमित लेखन की आदत डालें। चाहे ये लिखना डायरी हो या पत्र।

•सच्‍ची घटनाएं कभी भी अच्‍छी कहानियों का मसाला नहीं बनतीं। अगर ऐसा होता तो मनोहर कहानियां, सच्‍ची कहानियां और इस तरह की पत्रि‍काएं सर्वश्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रि‍काएं होतीं।

• कहानियों में आये तथ्‍यों आदि की विश्‍वसनीयता की जांच कर लें तभी उन्‍हें लिखें।

• अपने पाठक को कभी भी बेवकूफ न समझें।

• खूब यात्राएं करें और अनुभव बटोरें। लेकिन सभी अनुभवों पर कहानियां लिखने की ज़रूरत नहीं होती। अनुभव जीवन का समृद्ध बनाने के लिए होते हैं।

• खूब लिखें लेकिन ज़रूरी नहीं कि सारा लिखा हुआ प्रकाशित हो ही।

• कहानी का शीर्षक ऐसा हो जो आपको कहानी पढ़ने के लिए प्रेरित करे।

• क्‍या लिखना है, ये जानने के साथ साथ ये जानना भी बेहद ज़रूरी है कि क्‍या नहीं लिखना है।

• नये लेखक को अपने आप में कथा नायक की असीम संभावनाएं नज़र आती हैं। इसलिए आम तौर पर हर लेखक का शुरुआती लेखन आत्‍म कथात्‍मक ही होता है। लेकिन वक्‍त बीतने के साथ अपने आप पर जितना कम लिखा जाये उतना बेहतर। आपके अनुभव जितने समृद्ध होंगे, आप उतने बेहतर रचनाकार बनेंगे।

• अपनी कहानी पर दूसरों की आलोचना के लिए तैयार रहें। अच्‍छे मित्र कभी भी आपका अहित नहीं चाहेंगे। शुरू शुरू में अपनी रचना की कटु आलोचना बेशक खराब लगे, दीर्घ काल में बेहद उपयोगी होती है।

• कहा जाता है कि पूरी दुनिया के साहित्‍य में गिने चुने विषयों पर ही कहानियों लिखी जाती हैं। लेखक का नजरिया, ट्रीटमेंट और उसकी सोच ही एक कहानी को दूसरी कहानी से अलग करती है।

• कहानी को अपने भीतर पूरी तरह से तैयार होने दें तभी उसे कागज पर लिखें। कहानी कागज पर उतरने से पहले हमारे भीतर पूरी तरह से लिखी जा चुकी होती है, उन्‍हीं पलों का इंतज़ार करें।

-सूरजप्रकाश 

16 comments:

  1. कहानी लिखने की कोशिश करती रहती हूँ। सूरज जी की टिप्स बहुत काम आयेंगी। कुछ अच्छा लिख सकी तो इसके जिम्मेदार सूरज जी होंगे :)

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  2. सूरज जी का बहुत बहुत धन्यवाद। यह प्रस्तुति जानकारीपूर्ण है। कहानी लिखने के प्रयास में अवश्य सहायता करेगी।

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  3. प्रिंट निकाल कर रख लिया है। अब कहानी लिखूंगा तो ये टिप्स काम आयेंगे।

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  4. kahanee lekhan kee bareekiyan lekha mai hai...lekha achha laga..

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  5. कहानी की पहली और आखिरी शर्त है उसकी पठनीयता। कहानी अगर खुद को पढ़वा नहीं ले जाती तो उस पर और काम करने की ज़रूरत है।

    जहाँ तक मैं समझता हूँ, सूरज जी की यह बात केवल कहानी पर ही नहीं बल्कि साहित्य की हर विधा पर लागू होती है. पठनीयता के अभाव ने गुज़रे समय में जनसामान्य और साहित्य के बीच में जो दीवार खड़ी की है, वह किसी से छुपा नहीं है.

    सूरज जी के ये विचार सिर्फ नये कथालेखकों के ही लिये उपयोगी नहीं हैं अपितु कई स्थापित लेखकों को भी इन्हें आत्मसात करने की आवश्यकता है.

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  6. सूरज प्रकाश एक बहुत अच्छे वक्ता भी हैं। साहित्यशिल्पी को चाहिये कि सूरज जी से दिल्ली या फ़रीदाबाद में एक कहानी कार्यशाला करवाए। वैसे राजीव जी सूरज मूलतः देहरादून से हैं। वहां भी कार्यशाला करवाई जा सकती है। सूरज के माध्यम से नये कहानीकारों को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। वैसे एक अंदर की बात यह है कि 14 मार्च 2012 को सूरज अपने जीवन के 60 वर्ष पूरा करने जा रहा है। यानि कि उनका षष्ठीपूर्ति वर्ष चल रहा है.... हो जाए सेलिब्रेशन! तेजेन्द्र शर्मा

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  7. तेजेन्द्र जी की बात गौर करने योग्य है। इस लेख में सूक्ष्म बातों का उल्लेख है जो अच्छी कहानी लिखने में सहायता कर सकती है। बधाई।

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  8. बहुत सुन्दर एंव उपयोगी बातें बताई हैं. आभार.

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  9. आप सब का स्‍नेह सर आंखों पर। इससे बड़ी विडम्‍बना क्‍या होगी कि कहानी लिखने के गुर बताने वाला यह बंदा खुद सात बरस से एक भी कहानी नहीं लिख पाया है। पहले से बेहतर लिखना सूझता नहीं और पहले से खराब लिखना नहीं चाहता। हर लेखक के जीवन में इस तरह का सूखापन आता है। मेरे मामले में ये कुछ
    ज्‍यादा ही हो गया। निधि जी के लिए मेरी हार्दिक शुभकामना। वे जरूर लिखेंगी और बेहतर लिखेंगी, ये जिम्‍मेवारी मैं लेता हूं।
    सूरज

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  10. सूरज प्रकाश जी ने जिस बेबाकी और साफ़गोई से अपना परिचय दिया है, वह बहुत ही प्रशंसनीय है और ऐसे लेखकों के लिए एक शिक्षा भी है जो साधारण और थोड़ा लिख कर अपने को बहुत महान समझने लगते हैं और खुद की ही पीठ ठोंक कर दूसरों को नीचा समझते हैं।
    लेख में जो टिप्स दिए गए हैं, वह निःसन्देह ही नवोदित लेखकों के बहुत काम आएँगे।

    प्रेम गुप्ता ‘मानी’

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  11. sooraj ka kam he khud ko tpakar doosro ko prakash dena... Sooraj Prakash ji ke lekh se esaa hi me mahsoosh kar raha hoo . sri Tejendra Sharma ji ke sujhao se me sahmat hoo . Sooraj ji se meri phone me baat hui he may unse mila nahi hoo .. ve behad nek inshan to he hi ek achche lekhak bhi he jinse bahut kuch sikhane ko milega.. lekh ke liye unhe sadhubad va prnam

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  12. जी परनाम.... बहुत कुछ सिखाने की कोशिश की है आपने. देखिये क्या सीख पाते है हम .

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