अचानक सूरदास याद आने लगे हैं! ऑंख के अन्धे एक संत ने ऑंख वालों के लिए कैसा बढ़िया-बढ़िया उपदेश दिया है -‘उधो! मन न भये दस-बीस।’ कुछ लोग निश्चित ही बहुत पछताते होंगें कि उनके 10-20 मन क्यों नहीं हुआ! एक इसकी वफादारी में लगाए रहते तो एक श्रद्धापूर्वक अगले की जड़ काटने में। एक इधर मामला सेट करता तो एक उधर भी लाइन फिट किए रहता। वैसे बहुत से लोग ऐसा कर भी लेते हैं। अब पता नहीं उनका मन ही कई-कई होता है या यह उनका हुनर होता है!

बेचारे रामदेव! इनके तो है भी दस-बीस मन और उनको अलग-अलग लगाया भी लेकिन जब अपना मन ही दगा देने पर उतारु हो तो क्या हो सकता है! मेरे कई जानने वालों ने मेरी इस बात पर आपत्ति भी की कि मन दस-बीस कैसे हो सकता है? लेकिन वे मेरे इस जबाब पर दंग रह गये कि जो आदमी आसान से नुस्खे से गंजे के सिर में बाल उगा देता हो उसके लिए अपने ही मन को दस-बीस करना कौन सा मुश्किल होगा!

कैरियर की शुरुआत में बाबा जी ने संघ का हाथ थामा। संध ने भाजपा का भी हाथ थमा दिया। सब दूधो नहाओ,पूतो फलो मार्का चला। खूब लेन-देन भी हुआ। चंदा-चुटकी का भी काम हुआ। इस आधुनिक समय में प्रेम तक में लेना-देना हो रहा है तो बाबा तो खालिस व्यवसाय कर रहे हैं। लेकिन गुदगुदी भी कई बार रुलाने लगती है। सो मॉग जब तकलीफ देने लगी तो एक दिन योगी बाबा का संयम भी डोल गया और उन्होंने निस-वासर दौड़ पड़ने को आतुर अखबारवालों के सामने ही कह दिया कि हमारे यहॉ की भाजपा सरकार तो हमसे दो करोड़ रुपया घूस मॉग रही है।

हा-हा! बेचारे बाबा! वे शायद समझ रहे थे कि ऐसा बयान देकर वे भाजपा की अस्मिता पर ही कीचड़ उछाल देंगें लेकिन उन्हें संभवतः यह नहीं याद था कि जिस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अपने समय में सिर्फ एक लाख रुपये का घूस लेते हुए तहलका वालों से वीडियो फिल्म भी बनवा लेने की दिलेरी रखता हो उस पार्टी के लिए तो दो करोड़ रुपये का मामला निश्चित ही अत्यधिक गौरव का होगा! सो गौरव यहॉं फॅंसा भी तो बाबा का, न कि भाजपा का।

यह दो करोड़ की बात सबसे ज्यादा बुरी लगी टाटा को! उन्होंने सोचा कि यह बाबा लोगों को क्या बताना चाहता है कि सबसे ज्यादा पैसा उसी के पास हो गया है? उन्होंने अगले ही दिन कह दिया कि उनसे तो 15 करोड़ रुपया घूस मॉगा जा रहा था! फिर अम्बानी-वम्बानी भी अपनी प्रतिष्ठा बचाने में लग गये कि ढ़ेर सारा करोड़ तो उनसे भी मॉगा गया था। बाद में टाटा ने तो फोन-वोन का भी तमाम पुख्ता सबूत दिया कि उन्होंने तो करोड़ों का घूस सबको सही से देने के लिए ही राडिया नामक एक सिस्टम की बाकायदा तैनाती कर दी थी।

फिर बाबा ने एक मन कॉग्रेस की तरफ दौड़ाया कि चलो कॉंग्रेसी ही हो जॉय। उनका भाव यह रहा होगा कि उनके राज्य में भाजपा की काट कॉग्रेस ही है। लेकिन कॉग्रेस भी क्या करे! नारायणदत्त जैसे खेले-खाये बुजुर्गों ने भी वहॉ वह लौंडई फैला रखी है कि सुप्रीम कोर्ट तक हैरान है। सो कॉग्रेस ने बाबा से साफ-साफ कह दिया कि-‘‘आपन जोबना सम्हारी कि तुहैं बालमा ?’’

राजनीति, देखने में भले ही मुम्बई-पूना जैसा आठ लेन का सीधा-सपाट और चिकना राजमार्ग लगे कि इस पर चढ़ जाएगें तो फिर दिल्ली दूर नहीं है, लेकिन पॉव धरते ही पता चल जाता है कि यह तो हम झारखंड के नक्सलियों वाली बीहड पगडंडी पर आ गये हैं। बाबा रामदेव को भी अचानक इल्हाम हुआ कि सारा देश भ्रष्टाचारियों से भर गया है और इसे भ्रष्टाचार मुक्त करना अब बहुत जरुरी है। असल में बाबा, रोग, सुन्दरता और जवानी बढ़ाने-टिकाने की मॅंहगी दवा बनाने वाली विदेशी-देशी कम्पनियों के मालिक हैं। उनके मजदूर, मजदूरी बढ़ाने को लेकर अरसे से हड़ताल पर हैं और पुलिस भी अब उन्हें काबू में नहीं कर पा रही है। सो उन्होंने भ्रष्टाचार दूर करने का संकल्प लेकर एक देश व्यापी स्वाभिमान यात्रा शुरु कर दी ताकि लोगों का घ्यान फैक्ट्री-मजदूर तथा भाजपा-कॉग्रेस से हटकर उनकी तरफ आकर्षित हो और इसी बहाने एक जन-मानस अपने पक्ष में बना लिया जाय जो जरुरत पड़ने पर साथ खड़ा हो सके।

मोहल्ले में नई दुल्हन आ जाय तो उसकी एक झलक पाने को भला कौन लालायित नहीं हो जाता? यही हाल बाबा का हुआ। भारत में भ्रष्टाचार पर आन्दोलन! सबके कान खड़े हो गये-क्या करना चाहता है यह बाबा? बाबा के इर्द-गिर्द तमाम लोग इकट्ठा होने लगे कि देखें कौन सा माल अलग बॉधकर रखा है बाबा ने जनता को दिखाने के लिए। अब बाबा ने कभी कोई आन्दोलन तो किया नहीं था। भीड़ बटोरने का हुनर तो है उनके पास लेकिन भीड़ से आन्दोलन कराना तो वे जानते नहीं। सो किसी ने अन्ना का नाम सुझाया। बाबा को भी लगा कि यह तो स्टार आदमी है। साथ आ जाए तो ठीक है। कल को राजनीतिक पार्टी भी बनानी है तो बढ़िया रहेगा। बाबा नहीं जानते थे कि अनजाने ही वे धीरे-धीरे अमीर खुसरो की तरफ खिसक रहे थे-‘‘खीर पकाई जतन से चरखा दिया चलाय.......’’ आगे मैं नहीं कहूँगा। आप कह लीजिए, आपकी मर्जी! यह दॉंव भी गया बाबा के हाथ से। एक दॉव टाटा ले गये तो दूसरा अन्ना।

बेचारे रामदेव! जो आदमी सारी दुनिया को बताता रहा हो कि शरीर अगर ब्याधि है तो शरीर ही दवाओं का कारखाना भी है, वह ब्याधि और कारखाना दोनों में ही उलझकर रह गया। नाखून रगड़कर बाल उगाने और उसे काला करने की अद्भुत तरकीब बताने वाले बाबा की दाढ़ी के बाल पक रहे हैं! हो सकता है कि बाबा के नाखूनों में कोई तकलीफ हो और वे उन्हें रगड़ न पा रहे हों। दुनिया को हॅंसाने वाले अक्सर अवसाद के मरीज होते हैं। जय हो!! ऽऽ

6 comments:

  1. सुनिल जी केवल आंशिक रूप से आपसे सहमत हूँ। फिर भी मुझे लगता है कि बाबा रामदेव अच्छा काम कर रहे हैं। जो कुछ नहीं करते जब हम उनसे कोई शिकायत नहीं रखते तो फिर जो कुछ कर रहे हैं उनके रास्ते रास्ते कटाक्ष के कांटे बोने का क्या मतलब?

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  2. बाबा रामदेव की मंशा चाहे जो भी रही हो, उन्होंने एक अच्छे उद्देश्य की ओर जनता को आकृष्ट करने का प्रयास किया. ्यदि ऐसे प्रयास जारी रहें तो निश्चय ही राजनैतिक दलों को अपने स्वार्थों से हट कर इसके बारे में सार्थक कदम उठाने होंगे.
    हाँ, रामदेव जी कुछ गलतियाँ तो नि:संदेह की हैं जिनसे यह प्रयास पूर्णता को प्राप्त न कर सका.
    अच्छा और नुकीला व्यंग्य!

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  3. बाबा जी लगे रहो कभी तो लोग समझेंगे। तब तक आप पर कुछ व्यंग्य भी हो ही जाने दो। कर्मठ परवाह नहीं करते है।

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