बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी मनोहर श्याम जोशी के नाम से भला कौन अपरिचित होगा। वह आजीवन लिखते रहे, रचते रहे और जीवन को भिन्न-भिन्न आयामों से महसूस करते रहे। किस्सागोई तो उनके स्वाभाव में ही बसी था। मृत्यु से दिनों पहले ही एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा था-‘‘इस समय हमने जो कुछ भी लिखा है, उसमें सन्तोष नहीं है। मरने के पहले सन्तोष वाला कुछ लिखना चाहता हूँ।‘‘ 

उस दौरान वे ‘कपीश जी‘ लिखने में व्यस्त थे। इस रचना में पूर्व बनाम पश्चिम की भिड़ंत को उन्होंने पवनपुत्र हनुमान के माध्यम से उकेरा है। हनुमान जी स्वप्न में अब्राहम लिंकन जैसी दाढ़ी वाले एक व्यक्ति से उनकी मुलाकात करवाते हैं और वहीं एक उद्योगपति एवं ट्रेड यूनियनिस्ट की पुत्री अमेरिकी बाला के भी सम्पर्क में आते हैं। पर अन्ततः रहस्मय परिस्थितियों में उनकी मौत हो जाती है। वस्तुतः इस रचना के माध्यम से जोशी जी ने अमेरिका एवं भारत की सात पीढ़ियों का किस्सा व्यक्त किया है। 

यही कारण है कि लोग उन्हें किस्सागोई का बादशाह कहते थे। पर स्वयं जोशी जी इसे कुमायूँनी परम्परा की प्रतिध्वनि मानते थे। जोशी जी ताउम्र हिन्दी की साहित्यिक परम्परा के विपरीत साहित्यवाद से बचते रहे। उन्होंने साहित्यवाद के स्थापित तरीकों को तोड़ा और अपने हिसाब से नए प्रतिमानों की रचना की। वे स्वयं कहते थे-‘‘मैं विद्वान नहीं हूँ। मेरी विद्वता मात्र पत्रकारिता के स्तर की है। थोड़ा यह भी सूँघ लिया, थोड़ा वह भी सूँघ लिया। मैं तो प्रिन्ट मीडिया का आदमी हूँ।‘‘ यही कारण था कि जोशी जी का लेखन परम्पराओं, विमर्शों, विविध रूचियों एवं विशद अध्ययन को लेकर अंततः संवेदनशील लेखन में बदल जाता है। 

भव्य और आकर्षक व्यक्तित्व वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी मनोहर श्याम जोशी का जन्म 9 अगस्त 1933 को अजमेर में हुआ था। उनके पिता श्री प्रेमवल्लभ जोशी वहाँ राजकीय शिक्षा सेवा में अधिकारी थे। बचपन से ही वैज्ञानिक बनने की तमन्ना रखने वाले जोशी ने लखनऊ विश्वविद्यालय से बी0एस0सी0 की डिग्री प्राप्त की एवं ‘कल के वैज्ञानिक‘ उपाधि से नवाजे गए। विज्ञान के विद्यार्थी होने के कारण वे चीजों को गहराई में उतरकर देखने के कायल थे। लखनऊ की जमीन तो वैसे भी साहित्य के लिए रसायन का काम करती है, फिर जोशी जी इससे कैसे अछूते रह पाते। सो, लखनऊ लेखक संघ की एक बैठक के दौरान वे अपने प्रथम साहित्यिक गुरू अमृत लाल नागर से टकरा गए और फिर यहीं से महज 21 वर्ष की उम्र्र में ही मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी का अनुभव बटोरते हुए लेखन को पूरी तरह से जीविका का आधार बना लिया। लखनऊ लेखक संघ की बैठकों में अमृत लाल नागर, भगवती चरण वर्मा और यशपाल ये तीनों साहित्यिक दिग्गज नियमित रूप से आते थे। 

जोशी जी ने इन तीनों ही विद्वानों से कुछ न कुछ सीखा- नागर से भाषा और किस्सागोई, भगवती बाबू से तुर्शी तो यशपाल जी से नजरिया। जोशी जी लेखक संघ की जिस बैठक में पहली बार गए उसमें उनके द्वारा कहानी पाठ प्रस्तावित था। फिलहाल जब जोशी जी ने ‘मैडिरा मैरून‘ नामक अपनी कहानी का पाठ किया, जिसमें उन्होंने भावुकता-व्यंग्यात्मक तेवर आजमाए थे, तो उनकी सबसे ज्यादा तारीफ अमृत लाल नागर ने की। यह बात अलग है कि तब तक जोशी ने नागर की कोई रचना भी नहीं पढ़ी थी। नागर जी ने उस कहानी पाठ के बाद जोशी को गले लगाकर कहा- ‘‘इस नए लेखक की खोज से मुझे इतनी खुशी हुई है, जितनी कि फैजाबाद में पुरानी अयोध्या के अवशेष मिलने से।‘‘ खैर इसके बाद जोशी जी का लेखकीय जीवन चल पड़ा। 

उन्होंने आरम्भ में कविताएँ लिखीं एवं उसके बाद कहानी व उपन्यास लेखन में प्रवृत्त हुए। अपने कैरियर के रूप में उन्होंने पढ़ाई पूरी होने के पश्चात एक स्कूल में मास्टरी और तत्पश्चात आकाशवाणी में नौकरी की। उसके बाद जोशी जी उस समय की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘दिनमान‘ में सहायक सम्पादक और फिर ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान‘ के सम्पादक बने। उस समय ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान‘ और ‘धर्मयुग‘ दो ऐसी पत्रिकाएं थीं जो सम्पूर्ण देश की सांस्कृतिक-सामाजिक चेतना की संवाहक थीं। एक सम्पादक के रूप में जोशी जी ने साहित्य की हर विधा में रचनात्मक हस्तक्षेप किया और युवाओं को आधुनिक बोध से जोड़ते हुए कहानी व कविता के दायरे से परे व्यंग्य, यात्रा-वृतांत, रिपोतार्ज, कवर स्टोरी, संस्मरण इत्यादि की तरफ भी प्रवृत्त किया। सन् 1984 में उन्हें हिन्दुस्तान छोड़ना पड़ा और तत्पश्चात उन्होंने अंग्रेजी पत्र ‘वीकेंड रिव्यू‘ और ‘मार्निंग इको‘ के सम्पादन का कार्यभार संँभाला। जोशी जी के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख समाचीन होगा कि पैतृक पक्ष से वे कुमायूँनी ब्राह्मण थे, जन्म अजमेर में हुआ और कर्मक्षेत्र लखनऊ बना। लखनऊ के प्रति अपने लगाव को वे स्वयं स्वीकारते हैं-‘‘मैं मूलतः लखनवी हूँ और भूलतः कुछ और।‘‘

जोशी जी समय की नब्ज को पहचानने में माहिर थे। उन्होंने अपने को एक ही क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा बल्कि साहित्य के अलावा, पत्रकारिता, टी0वी0 धारावाहिक और सिनेमा माध्यमों से भी वे गहरे व जीवंत रूप से जुड़े रहे। उनका कहना था कि- ‘‘जो विधा मुझे अपने पास बुलायेगी, उसके पास जाना चाहूँगा। अनामंत्रित ढंग से विधाओं से मेल-मिलाप नहीं करूँगा।‘‘ इसके चलते जहाँ उनके लेखन में सहज संप्रेषणीयता आई वहीं वे प्रयोगधर्मी भी बने रहे। वे एक ऐसे लेखक थे जो अपनी तरह से सोचता और लिखता था। जोशी जी ने अपना ज्ञान स्वाध्याय से विकसित किया और उनकी स्मृति भी बहुत अच्छी थी। उन्हें कई महत्वपूर्ण कृतियों के संदर्भ अक्षरक्षः याद रहते थे। प्रयोगधर्मी के रूप में उन्होंने सिंधी, उर्दू, बम्बईया, कुमायूँनी, भोजपुरी सभी भाषाओं का भिन्न-भिन्न रूपों में प्रयोग किया- कसप में कुमायूँनी, कक्का जी कहिन में उर्दू और भोजपुरी, कुरू कुरू स्वाहा में बम्बईया। वे भारत में हिन्दी टी0वी0 धारावाहिकों के जनक माने जाते हैं। उनके द्वारा लिखित सोप ओपेरा ‘हम लोग‘ हिन्दी का और भारत का ऐसा धारावाहिक बना जो अपने समय में दुनिया के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले धारावाहिकों में शामिल था। ‘हम लोग‘ की विशेषता भारतीय शहरी मध्य और निम्न मध्य वर्ग की आकांक्षाओं-संघर्षों की ऐसी कहानी है, जो बेहद सहजता, शालीनता व संवेदनशीलता के साथ कही गई है। जब ‘हम लोग‘ धारावाहिक शुरू होता था तो बाहर सड़कों और गलियों में कोई नजर नहीं आता था। उन्हीं दिनों एक अखबार में ‘हम लोग टाइम‘ नाम से एक कार्टून प्रकाशित हुआ था, जिसमें मंत्री जी की सभा में किसी के भी न आने पर वे अपने सेक्रेटरी को डाँट पिलाते हैं- ‘‘किस मूर्ख ने तुम्हें सभा का यह वक्त रखने के लिए कहा था? जानते नहीं कि यह हम लोग टाइम है।‘‘ हिन्दी साहित्य के उत्तर आधुनिक काल में लिखे उनके धारावाहिकों- बुनियाद, कक्का जी कहिन, मुंगेरी लाल के हसीन सपने, जमीन आसमान, गाथा हमराही इत्यादि ने भारतीय मनोरंजन को एक नई दिशा दी एवं दूरदर्शन के क्षेत्र में भी क्रान्ति लाई। ‘बुनियाद‘ तो एक ऐसे परिवार की कहानी थी जो सन् 1947 में विभाजन के बाद भारत आया था। ‘हम लोग‘ और ‘बुनियाद‘ धारावाहिक जोशी की किस्सागोई के प्रत्यक्ष उदाहरण रहे हैं। टी0वी0 धारावाहिकों के साथ-साथ जोशी जी ने कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी। इनमें हे राम, अप्पू राजा, भ्रष्टाचार और पापा कहते हैं इत्यादि प्रमुख हैं। 

मनोहर श्याम जोशी के पास वैचित्र्य की कमी नहीं थी। साधारण चरित्रों का अद्भुतिकरण और अद्भुत चरित्रों का सामान्य विश्लेषण उनकी रचनाओं की एक दुर्लभ विशेषता रही है। वे हमेशा निम्नवर्गीय या निम्नमध्यवर्गीय पात्रों को उठाते हैं। फंतासियों के रूप में उनके नायक आदर्शवादी, साहसी, पराक्रमी व उदात्त हीरोइज्म को क्रिएट नहीं नहीं करते, बल्कि नायकत्व की पारंपरिक अवधारणाओं को खण्डित करते नजर आते हैं। उनके नायक भीरू-कातर और विदूषकीय तेवरों वाले दिखते हैं। वस्तुतः जोशी जी में सच्चाई को ढकने की बजाय उन्हें उकेरने का साहस था। उनके लिए साहित्य पांडित्य-पाखंड या प्रदर्शन का पर्याय नहीं बल्कि अपनी विविध रूचियों और व्यापक अध्ययन को संवेदनशील रूप में तराशने का माध्यम थी। उन्हें बेचन शर्मा ‘उग्र‘ के बाद का सबसे बड़ा शैलीकार यूँ ही नहीं माना जाता है। उनमें एक अजीब किस्म के उजड्डपन और सोफिस्टिकेशन का अद्भुत संगम था। उनमें तहजीब भी थी और गँवारूपन भी। जोशी जी खास किस्म के गम्भीर और कॉमिक लेखक थे। कॉमिक का मतलब गम्भीर अर्थों में कॉमिक, जो हमारे यहाँ अक्सर लक्ष्य नहीं किया जाता है। वे सामाजिक और पारिवारिक संस्थाओं का मजाक उड़ाते हैं और परिस्थितियों की कारूणिकता को हास्य-व्यंग्य के जरिए हल्का करना चाहते हैं। यही नहीं, उनकी नितांत अपनी विशेषता थी- अपने पांडित्य पर ही नहीं अपने समूचे आप पर हँस सकने की सामर्थ्य। इसी अद्भुत क्षमता के चलते उनकी ‘लखनऊ मेरा लखनऊ‘ जैसी श्रेष्ठ आत्मकथात्मक कृति सामने आयी। वस्तुतः जोशी जी ने जिस दौर में लिखना आरम्भ किया वह विसंगति-विडंबना का जमाना था। विरूपतायें समाज के हर क्षेत्र में कुकुरमुत्ते की तरह जमीन से फूट रही थीं। ऐसे समय में उन्होंने अपना पहला उपन्यास ‘कुरू-कुरू स्वाहा‘ लिखा। ‘कुरू-कुरू स्वाहा‘ ने हिन्दी उपन्यास को रूमानियत से मुक्त किया और उसके जड़ हो चुके फॉर्म को तोड़कर भाषा को एक नया आयाम दिया, जो निहायत सामयिक और आधुनिक था। इस उपन्यास ने साबित किया कि कोई श्रेष्ठ रचना एक नहीं, दो नहीं वरन् कई स्तरों पर चलती है और समाज व व्यक्ति के विभिन्न रूपों को एक साथ समानांतर धाराओं में समेटती हुई उनके बीच सम्बन्ध स्थापित करती है। स्वयं जोशी जी का मानना था कि उन्होंने यह उपन्यास अर्जेंटीना के लेखक गोरखेज से प्रेरणा लेकर लिखा जो सारे साहित्यिक आन्दोलनों में हिस्सा लेने के बाद लेखन के क्षेत्र में लौटे थे। ‘हरिया हरक्यूलिस की हैरानी‘ उपन्यास में भी पारम्परिक इतिवृत्तात्मकता की जड़ता टूटी एवं सैकड़ों पृष्ठों में चलने वाले प्रकृतवाद से मुक्ति मिली। इस उपन्यास में अपने समाज से जुड़े रहने की ललक, अकेलापन और पितृभक्ति लगभग सभी परम्परागत विस्थापित समाजों का विशिष्ट चरित्र है। इस उपन्यास में गुमालिंग शब्द बार-बार आया है, जिसका कि इस्तेमाल अश्लीलता के साथ किया गया है। ‘हमजाद‘ उपन्यास में उन्होंने स्त्री-पुरूष के बीच की रागात्मकता और रोमांस की निर्ममता को उकेरा तो ‘कसप‘ में मधुर रागात्मकता को। ‘क्याप‘ उनका सर्वप्रमुख उपन्यास था, जिस पर हाल ही में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। ‘क्याप‘-माने कुछ अजीब, अनपढ़, अनदेखा-सा, अप्रत्याशित। जोशी जी के उपन्यास सदैव किसी निष्कर्ष पर पहुँचे हीं, जरूरी नहीं। उनके उपन्यासों में आदि से अन्त तक सामाजिक विरूपताओं के साथ हँसी का भाव रहता था, पर अचानक ही वे उसे इस मोड़ पर खड़ा कर देते थे कि आगे कुछ सूझता ही नहीं था। उनके लिए जिन्दगी निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का नाम था, सो उनका उपन्यास तो खत्म हो जाता था पर उसका अंत नहीं होता था। जोशी जी की यह एक अनूठी विशेषता थी कि वे अपना उपन्यास डिक्टेट कराके लिखवाते थे, यानी चलते-फिरते हुए भी वे उपन्यास लिख सकते थे। उनके उपन्यासों में अनुप्रास का प्रयोग है और उनके शीर्षक उनकी शैली का संकेत देते है। शैली में संश्लिष्टता उनकी खूबी है और शीर्षकों में खिलंदड़ापना है। जोशी जी की यही प्रवृत्तियाँ उन्हें अपने समकालीनों निर्मल वर्मा और श्रीलाल शुक्ला से अलग करती हैं। निर्मल जहाँ एकांत के अँधियारे में चले गए वहीं श्रीलाल की रचनाओं में व्यंग्य और भी वाचाल व तीखा होता गया। जोशी जी उस दौर में लेखन कर रहे थे जब धीरे-धीरे पुराने मूल्य जड़ हो रहे थे और नए को लेकर असमंजस व दुविधा का भाव था। ऐसे संक्रमण काल को जोशी जी ने पत्रकारिता और व्यंग्य का माध्यम लेकर समझने की कोशिश की। उनकी अन्य रचनाओं में ‘मंदिर घाट की पौड़ियाँ‘, ‘बातों-बातों में‘, ‘टा-टा प्रोफेसर षष्टीबल्लभ पन्त‘, ‘सिल्वर वेडिंग‘, ‘कैसे किस्सागो‘, ‘एक दुर्लभ व्यक्तित्व‘ इत्यादि प्रमुख हैं।

मनोहर श्याम जोशी आधुनिकतावादी एवं उससे भी आगे बढ़कर उत्तर-आधुनिकतावादी थे। यद्यपि उन्होंने क्रांतिकारी आन्दोलनों में शिरकत नहीं की परन्तु उनकी समग्र रचनाशीलता में क्रांतिधर्मिता है। प्रेस, रेडियो, टी0वी0, वृत्तचित्र, फिल्म, विज्ञापन, व्यंग्य, संप्रेषण इत्यादि क्षेत्रों में समान रूप से सर्वश्रेष्ठ लेखन करने वाले जोशी ने आजाद भारत के राजनैतिक समाज के भूलभुलैया भरे रास्तों में निरंतर परिवर्तन होते देखे तो भूमण्डलीकरण एवं सूचना-क्रांति के कारण सिमटती दुनिया के आंतरिक विघटन व ग्लानि को भी देखा। यहाँ तक कि पश्चिम की प्ले ब्वॉय जैसी पत्रिकाओं में उपलब्ध हाने वाले सेक्स सम्बन्धी दिलचस्प विषयों को भी जोशी जी ने सत्तर-अस्सी के दशक में जोरदार ढंग से छापा। कोई भी ऐसा प्रसंग नहीं रहा जिस पर उनकी कलम न चली हो- चाहे वह अमेरिका द्वारा विश्व-पुलिस के रूप में भूमिका निभाना हो अथवा प्रवासी भारतीयों के अधकचरे भारत प्रेम से लेकर सिलिकॉन वैली का वर्णन हो। कभी-कभी उनकी साफगोई एवं यथार्थ को उसी कटु रूप में परोसने के चलते कई आलोचकों ने ‘सिनिसिज्म‘ (मूल्यहीनता) जैसे आरोपों से भी उन्हें नवाजा पर ‘कसप‘ जैसे संवेदनशील प्रेम-आख्यान, जिसका शुमार हिन्दी के दो-तीन श्रेष्ठ उपन्यासों में होता है, के लेखक पर यह आरोप लगाना स्वयं में विराधाभास लगता है। 

मनोहर श्याम जोशी (9 अगस्त 1933-30मार्च 2006) का रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल था कि उस पर कोई एक लेबल लगाना सम्भव नहीं। वक्त के साथ उन्होंने टी0वी0 और सिनेमा के बढ़ते प्रभाव को समझा और लोगों तक अपना संदेश देने हेतु उनका भी प्रयोग किया। वे एक प्रोफेशनल लेखक थे और इस रूप में उन्होंने मीडिया, साहित्य और तकनीक के बीच एक अनूठा अन्तर्संबंध कायम किया। एक सशक्त उपन्यासकार होने के साथ-साथ उन्होंने पत्रकारिता में भी कई आयाम जोड़े, जबकि पत्रकारिता को साहित्य का दुश्मन माना जाता रहा है। उन्हें मध्यप्रदेश साहित्य परिषद सम्मान, शरद जोशी सम्मान, शिखर सम्मान, दिल्ली हिन्दी अकादमी अवार्ड, टेलीविजन लेखन के लिए ओनिडा और अपट्रान अवार्ड, ‘क्याप‘ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार जैसे सम्मानों से भी विभूषित किया गया। एक साक्षात्कार के बाद स्वयं श्रीमती इंदिरा गाँधी तक ने उन्हें अतिवादी कह दिया था, पर इसके बावजूद आपातकाल में उन्हें भूमिगत नहीं होना पड़ा। बेबाकी अन्त तक उनके स्वभाव में छायी रही पर अफसोस व तड़प भी। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था-‘‘वस्तुतः जिन चीजों को लेकर हम निकले थे वह तो इस सदी में हुई नहीं। अगली सदी में क्या होगा हमें समझ में नहीं आता?‘‘                     
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कृष्ण कुमार यादव
निदेशक डाक सेवाएं
अंडमान व निकोबार द्वीप समूह
पोर्टब्लेयर-744101                                                                                               

6 comments:

  1. मनोहर श्याम जोशी को इस तरह याद किये जाने के लिये साहित्य शिल्पी तथा के के यादव की जा धन्यवाद।

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  2. संग्रहणीय आलेख है बहुत ही जानकारीपूर्ण है।

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  3. कृष्ण कुमार यादव जी जो भी लिखते हैं उसमें उनका अपना कहन और शोध दोनों का सम्मिश्रण होता है।

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