आज जब मै कहानी की गठरी लादे बिलासपुर की सड़क पर, टायर की चप्पल पहने गुज़र रहा था, तब रास्ते मे मुझसे बूढी काकी ने कहा, देखो-देखो "नमक का दारोगा!" अपने जागते ज़हन से देखो ! "बडे घर की बेटी" ने दिसम्बर 2010 मे "मंगलसूत्र" पहने पुरे किये 100 साल और वह जो शंकर है, किसान से मज़दूर और मज़ूर से मजबूर हो गया। क़र्ज़ की बीमारी से परिशान है वह...और बडे भाई साहब "कफन" मे लिपटे आज भी मुसकुरा रहे है। 

31 जुलाई 1880 के मास्टर आफ वेल्थ की कहानिया आज भी बोलती है, और ये भी सच है कि हर ज़िन्दा तहरीरे बोलती है, कालजयी होती है, अपने समय और काल से बहुत आगे का सफर तय करती है।  मुंशी अजायब राय और आनन्दी देवी के धनपत राय श्रीवास्तव / नवाब राय, तुम्हे "ज़माना" कानपुर् के सम्पादक मुंशी दया नारायण निगम ने मुंशी प्रेमचन्द का नाम दे दिया, क्यो ये नाम दिया मुझे नही मालूम। 

प्रेमचन्द!तुम् कथा साहित्य का एक ऐसा नाम हो जो आज भी कहानी की पगडन्डी पर "लैम्प पोस्ट" की तरह साथ साथ चल रहा है। आज इस नई सदी मे भी, कथा गांव से कोई "पूस की रात" मे मशाल लिये आवाज़ दे रहा है मुझे....आज भी आवाज़े मेरा पीछा करती है, आवाज़े उन छोटे-छोटे किसानो की जिन की इच्छाये असाध्य साध बनी है,  आज भी  "भोला-महतो" के पास न तो रुपये है और न ही गाय , ज़मीन का बट्वारा होता गया, आंगन मे अलग अलग दीवारे खडी होती गयी, और अब तो हालत यह है कि घरो से आंगन ही गायब हो गये, अब तो सिर्फ दीवारे ही दीवारे.....अलग अलग विचारो की दीवार। एक माँ की कोख से पैदा हो कर हम अलग अलग हिस्से के वारिस बन गये,क्या बोलूं प्रेम चन्द! कहानी आज भी वही खडी है जहा तुम उसे छोड कर गये थे। रग्घु दादा ,गिरधारी ,हरखू होरी और तुम्हारा, फलक की वुसअतो वाला गोदान सब के सब ज़िन्दा है। 15 उपन्यास, लगभग 300 कहानियो के पात्र 9 अक्टुबर 1936 के बाद आज भी 2011 मे ज़िन्दा है.....कितना सच्चा था, तुम्हारे समय का सच? समाज के यथार्थ का कितना सूक्ष्म अध्य्यन किया था तुम ने प्रेम!

जानते हो नवाब राय, तुम्हारे जाने के बाद कहानी बहुत सारे आन्दोलनो से गुज़री....कहानी कभी अकहानी बनी, कभी सचेतन, कभी सांकेतिक, कभी नई, पता नही क्या क्या बनती रही, मगर सच तो यह है कि कहानी "कफन" से आगे नही बढ पायी। आज भी बेदी की लाजवंती ऐसा ही कुछ कह्ती है मुझ से। 

आप सब की सोच लहरे क्या कह्ती है?
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11 comments:

  1. कहानी कफन के बाद आगे नहीं बढी है। आगे केवल कहानी के आन्दोलन बढे हैं और कहानीकार अब तक वर्चस्व के लिये लाठी चल रहे हैं। कहानी कहीं होगी भी तो घुट रही होगी।

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  2. खुर्शीद हयात्1 अगस्त 2011 को 10:55 am

    अनन्या जी !शुक्रिया,आप सही फरमा रहे है,कहानियो के आन्दोलन के बीच कहानी कही गुम हो गयी..आज नई सदी मे कहानी आगे-आगे और पाठक पीछे-पीछे ,वह पाठक वर्ग कहा गया जो मुंशी प्रेमचन्द् के साथ साथ चलते थे और आज भी चलते है..बोलना जीवन का प्रतीक है.(खुर्शीद हयात)

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  3. आपका प्रश्न ज्वलंत है और कहानी विधा की मौत तक ज्वलंत ही बना रहेगा। हर बार किसी उबाउ कहानी को पढती हूँ तो बार बार मानसरोवर ही याद आता है।

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  4. मेरे ये शब्द श्रद्धा सुमन स्वरुप मोहतरम खुर्शीद हयात साहब को समर्पित है ...
    by Aamir Faruqi on Tuesday, August 2, 2011 at 8:26am
    मुंशी प्रेमचंद कि जयंती पर लिखे गया मोहतरम खुर्शीद हयात साहब के एक लेख दिनांक 31.07.2011 के सन्दर्भ में .....मेरे ये शब्द श्रद्धा सुमन स्वरुप उन्हें समर्पित है ...

    आदरणीय खुर्शीद भाई ...आज पहली बार आप को हिंदी में संबोधित कर रहा हूँ | मुंशी प्रेम चंद जी पर आप का लिखा ये लेख पढ़ कर ये मन किया कि आप से क्यों न हिंदी में ही आचार-विचार किया जाये | मैं प्रारंभ से ही हिंदी को उर्दू कि बड़ी बहन मानता आया हूँ क्यों कि उर्दू हिंदी के ही आँचल में पल कर बड़ी हुई है और मुंशी जी की कहानियों ने इन दोनों ही सशक्त और सुन्दर भाषाओं के बीच एक अनोखा सामन्जस बना कर रखा है | जिसे आप हिंदी भी कह सकते हैं और उर्दू भी..अर्थात मुंशी जी ने अपनी सचेत और संवेनदशील रचनाओं के माध्यम से दोनों बहनों को एक ही शीशे में प्रतिबिंबित कर दिया है | मुंशी जी की कहनियों की संवेदनाये अजर-अमर सत्य के धरातल से उठाई गयी है जो कि निसंदेह कभी धूमिल हो ही नहीं सकती |

    आप ने अपने इस आलेख में मुंशी जी की कहानियों की पीड़ा, संवेदना, तिरस्कार और पराजय को बड़ी ही सुंदरता से ..उनके ही शीर्षकों के माध्यम से एक निराले और नए ढंग से इस तरह सजोया है कि पढ़ने वाला मंत्र मुग्ध हो जाये | ....बधाईयां स्वीकार करें
    (AAMIR FAROOQUI-LUCKNOW)

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  5. बहुत प्रभाव पूर्ण आलेख प्रेम चंद जी के बारे में इतने रोचक ढंग से टिपण्णी बहुत प्रभावी लगी आप का अंदाज़ मन्त्र मुग्ध करता है

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  6. ‎1991 KI LIBERAL ECONOMY KE BAAD KE BHARAT ME JO AB INDIA HO CHALA HAI PREMCHAND HUM JAISE QABEEL KE LOGON K LIYE SARTHAK TO DIKHTE HAIN KHURSHEED HAYAT BHAEE, LEKIN YE SARTHAKTA SIRF UNKE JANM DIN PE KYUN AUR SIRF HUM AAP JAISE SARPHIRO'N K LIYE HI KYUN? KYUN HORI HAMESHA HORI HI RAHE.???(yahiya ibrahim-jamshedpur)

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  7. khurseed jee apaka aalekh laghu katha ke saman hai... Gagar Mai Sagar.
    Bhai aamir farooqui jee , prem chand jee hindi mai na bhee likhate to ve Urdu ke Mahan lekhak hote. उर्दू हिंदी के ही आँचल में पल कर बड़ी हुई है... vah kya shabd hai.

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  8. बहुत स्टीक मुंशी प्रेम चंद जी की हर कहानी _____
    आंदोलनों का कफन है समाज का हर कहानी मन झीझोड़ देती है बरबस आँख अश्रुधारा

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  9. खुर्शीद हयात्2 अगस्त 2011 को 4:50 pm

    शरद जी शुक्रिया !

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  10. aalochnaatmak tippanee bhee fantacy ke kitne nazdeek ho sakatee hai ?(Satish Jayswal )

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  11. पूनम माटिया3 अगस्त 2011 को 11:33 am

    ‎Khursheed Hayat ji aapki lekhni ka kamaal hai .jo faruqi sahib .kii kalam se aapke liye ek se badhkar ek visheshan nikalte ja rahein hai .plz aap apne lekh ka link hame bhi dijiye taaki hum apne jigaayasa kii kuchh tripti kar paayein .aap yunhi hamse apni lekhni aur share karein .

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