माना कि तुम्हारे तरकश में हैं
पैनी सच्चाइयों के तीर
और तुम आमादा हो
वार करने पर
ताकि दे सको
हर विफलता को भूल का नाम;
कठघरे में खड़ा कर सको
बिखरते वज़ूद की कराहटों को
और लानत भेज सको -
सहमी हुई सम्वेदनाओं को

लेकिन कभी सोचा;
क़ि ऐसा करने से -
पुतेगी कालिख;
तुम्हारे भी नाम पर
क्योंकि हमारे तार
उलझ गए थे आपस में,
कहीं न कहीं -
जाने अनजाने!

5 comments:

  1. विनीता जी
    कविता बहुत अच्छी है
    कुछ कुछ धुमिल जी की तरह तीखापन
    और खुश्बु है ! गहराई की तरफ जाने का प्रयास ....
    धन्यवाद .. आपका जय बस्तरिया

    उत्तर देंहटाएं
  2. hi vinita, i want to know how can i publish my poem here? juoti 9999815751

    उत्तर देंहटाएं
  3. i m not vinita,,why on my email-adress these comments are coming..plz correct email-address..jyotipatent@gmail.com merA ID HAI...I M JYOTI CHAUHAN

    उत्तर देंहटाएं
  4. विनीता शुक्ला10 फ़रवरी 2012 को 8:46 am

    ज्योति जी कविता की सराहना के लिए धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  5. विनीता शुक्ला10 फ़रवरी 2012 को 8:47 am

    जय जी कविता को पसंद करने के लिए धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं

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