मैं बहुत सालों से उसके घर में सफाई का काम कर रही थी| वो वृद्ध महिला बहुत ही सहज और दयालु थी| जब मैं उसके घर काम करने जाती तो वो मुझे कॉफी के साथ हमेशा कुछ न कुछ खाने को देती थी| उसने मुझे कभी खाली कॉफी नहीं दी| कभी कभी बच्चो के लिये भी कुछ न कुछ दे देती थी| विदेशो में ज्यादातर माँ बाप अपनी उम्र की अंतिम अवस्था में या तो अकेले हो जाते है या वृद्ध आश्रम में पंहुचा दिए जाते हैं| उन्ही में से ही थी श्रीमती आली, जिनके घर मैं बरसो से सफाई का काम कर रही थी|
आखरी बार, मैंने उनके घर फैसला लिया की आज में घर की उपरी मज़िल की सफाई कर दू| वहा बहुत ही धुल मिटटी थी, सब तरफ पुरानी अलमारी लकड़ी के बक्से रखे थे| जब से श्रीमती आली के बच्चे उनको छोड़ कर गए हैं तब से मकान की उपरी मंजिल में कोई नहीं जाता, कभी कभी उनके नाती पोते जरुर उपर जा कर खेलते हैं| सफाई करते करते मुझे एक चाँदी का छोटा सा बक्सा दिखाई दीया जिसमें चाभी लटक रही थी| में ये कभी नहीं सोच सकती थी कि इस कबाड़ खाने में कोई कीमती सामान भी हो सकता है| अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिये मैंने वो बक्सा खोल कर देखा, उसके अंदर एक बहुत ही सुंदर पन्ने की सोने की अंगूठी थी| श्रीमती आली अमीर हैं ये तो मैं जानती थी लेकिन वो अपनी बेशकीमती अंगूठी को इस तरह उपर रखेंगी ये पता नहीं था|
मैंने अंगूठी को अपनी उंगली में पहन कर देखा तो वो मेरे हाथ में बहुत सुंदर लग रही थी| लग रहा था जेसे मेरी उंगली के लिये बनाई गई है| मुझे ज़ेवरो से हमेशा से प्यार रहा है| या यूँ कहे की ज़ेवर हर औरत की कमजोरी होती है, सो मेरी भी थी| और इसी कमजोरी वश मैंने उस अंगूठी को अपने पास रखने का फैसला लिया क्योकि अगले हफ्ते ही मुझे एक शादी में जाना था| मैं भी शादी में सुंदर दिखना चाहती थी बाकि अमीर औरतो की तरह महंगे गहने पहनना चाहती थी| मैंने सोचा अगर में इस अंगूठी को एक हफ्ते के लिये इस बक्से से उधार ले लू और शादी निपट जाने के बाद इसी तरह वापिस रख दू तो किसी को पता भी नहीं चलेगा और मेरा काम भी हो जाएगा| श्रीमती आली तो कभी भी उपर नहीं आती, उनको क्या पता चलेगा वेसे भी इतने सालो में मैंने उनको इस अंगूठी को कभी भी पहने नहीं देखा और न ही उपर की मजिल में जाते देखा था|
अंगूठी को अपनी जेब में रखते हुए, में अपने को धोकेबाज़ समझ रही थी| मुझे ऐसा करना बिलकुल भी अछा नहीं लग रहा था| लेकिन अब में उसको अपनी जेब में रखा चुकी थी| श्रीमती आली नीचे से आवाज़ दे रही थी उन्होंने कॉफी तैयार कर ली थी| मैंने जल्दी जल्दी सफाई ख़त्म की और नीचे आ गई|
उस हफ्ते शादी में मैंने बहत ही प्रशंसा सुनी सभी लोगो ने मेरी और खासकर उस अंगूठी की जम कर तारीफ की| सभी को वो महंगी अंगूठी बहुत सुंदर लग रही थी| मेरे पति ने भी पूछा की ये बेशकीमती अंगूठी में कहा से लाइ? मैंने उनसे झूट कहा की ये नकली पत्थर की अंगूठी है और उन्होंने मान लिया| वेसे भी आदमी लोगो को असली और नकली गहनों में ज्यादा फर्क दिखाई नहीं देता|
सोमवार को मुझे फिर से श्रीमती आली के पास काम पर जाना था| में मन ही मन खुश थी की अब मेरा काम निकल गया अब में तस्स्सली से श्रीमती आली की अंगूठी वापिस उसी चांदी के बक्से में रख दूंगी| अभी मैं श्रीमती आली के गहर में पूरी तरह अंदर भी नहीं घुसी थी की उनकी बेटी मेरे सर पर खड़ी हो कर चिल्लाने लगी की शायद मुझे पता हो की (ओमा) दादी माँ की अंगूठी कहा है? में दर के मारे एकदम सुन्न हो गई थी| मन ही मन सोच रही थी की इसको केसे पता चला अंगूठी के बारे मे? ये तो यहाँ कभी कभी आती है| दर के मारे मैंने झूठ कह दीया की मुझे नहीं पता कोण सी अंगूठी, मैंने नहीं देखी| लेकिन वो मानने को तेयार ही नहीं थी, उसने कहा की उसको श्रीमती आली ने बताया है ही बीते हफ्ते में उपर की मजिल में सफाई करने गई थी तभी से अंगूठी गायब है| उसने बताया की वो अंगूठी उसकी दादी की सास ने उनको दी थी तभी से वो अंगूठी विरासत के रूप में रही थी| वो भी उस अंगूठी को किसी शादी में पहनने के लिये लेने आई थी| मैं तो मानो डर के मारे पसीने पसीने हो रही थी| वो पुलिस को बुलाने की बात कर रही थी| हो सकता है किसी और ने वो अंगूठी पहनने को ली हो और देना भूल गया हो? मैंने अपने बचाव मैं कहा|
तभी श्रीमती आली ने कहा 'अरे में भूल गई पिछले हफ्ते बच्चे भी उपर खेल रहे थे, हो सकता है उन्होंने निकल कर कही रख दी हो' श्रीमती आली की बात सुन कर मेरे दम में दम आया| जाओ पहले जा कर अपने बच्चो से पुछो फिर मेरे पास आना| बस अब यही का बचाव का रास्ता था मेरे पास बस इतना कह कर मैं वहा से घर आ गई| और उसके बाद फिर कभी वापिस श्रीमती आली के पास नहीं गई| उस अंगूठी को मैंने बहुत अच्छे से छुपा दीया था| मन में डर था की शायद एक न एक दिन उसकी बेटी पुलिस को लेकर मेरे घर आ जायेगी|
इस बात को अब कई महीने बीत गए थे| अचानक मुझे श्रीमती आली का एक पत्र मिला, जिसमें उन्होंने उस अंगूठी वाली घटना के लिये माफ़ी मांगी थी और बताया था की हाँ बच्चो ने ही वो अंगूठी कही खो दी| पत्र पड़ कर मेरी आँखों में आसू आ गए, उसी समय में अपने आपको चोर महसूस करने लगी मेरी अंतर आत्मा मुझे कचोट रही थी क्योकि सच तो सिर्फ में ही जानती थी| तभी मैंने निर्णय लिया और उस घटना की सच्चाई एक पत्र में लिख कर अंगूठी समेत श्रीमती आली को एक माफ़ी नामा भेज दीया| मुझे उम्मीद है कि वो उस दिन की मेरी स्थिति को समझ कर मुझे जरुर माफ़ कर देंगी|

2 comments:

  1. मुझे आश्चर्य है कि इतनी अच्छी कहानी पर किसी ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया क्यो नही लिखी.वाकई बहुत अच्छी कहानी है. मुझे बहुत पसंद आयी
    Umesh mohan dhawan

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  2. bahut achhi kahani...chhoti si aur pyari si...

    उत्तर देंहटाएं

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