प्राण शर्मा जाने माने शायर हैं। साहित्य शिल्पी पर उनका नीयमित स्तंभ "ग़ज़ल-शिल्प और संरचना" प्रकाशित किया गया था। 

प्राण शर्मा का जन्म १३ जून १९३७ को वजीराबाद (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। आप सन १९५५ से गीत , कविताएं और ग़ज़ले लिख रहे हैं। आप वर्ष १९६५ से ब्रिटेन में अवस्थित हैं। आपके  "गज़ल कहता हूं' और 'सुराही' - दो काव्य संग्रह प्रकाशित हैं। 

आज प्रस्तुत है उनकी कहानी - पति, पत्नि और संतान। 

कथानक पर बात करने की अपेक्षा कहानी को पाठ्कों के सम्मुख रखा जा रहा है तथापि यह कहना होगा कि "प्रवासी कहानी" और "मुख्यधारा" को ले कर होने वाली लम्बी चौडी बहसों का यह कहानी बहुत हद तक प्रत्युत्तर देती है। कहानी अपने मूल  विषय को परिचर्चा तक ले जाती है और जिस जगह पर पाठक से विदा होती है वहाँ सोचने के लिये पूरा आकाश सम्मुख होता है। - संपादक।

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शांतिस्वरूप को रिटायर हुए दो साल हो गये हैं। दोपहर में घर में बैठना उनके लिए असह्य हो जाता है। कौन सारा दिन टी.वी के पास बैठ कर पत्नी प्रमिला की इन जली - भुनी बातों को सुनता रहे "------ मुझे बताईये , सारी उम्र आपने मुझे क्या सुख दिया है? मेरी जवानी को आपने और आपकी माँ ने जवानी ही नहीं रहने दी। उसे नरक से भी बदतर बना दिया। शुक्र है , कुछ बड़े होते ही मेरे दो बच्चों ने मेरा साथ दिया .वे न होते तो मैं जवानी में ही मर - खप गयी होती--------- आपकी माँ जब तक जिंदा रही उसने मुझे सूली पर लटकाए रखा , कभी कोई ताना देती और कभी कोई ताना . -------- शादी से पहले मैंने सोचा था कि मेरी सास अच्छे संस्कारों वाली होगी, मेरी
सभी रीझें पूरी करेगी . जब वो मुझे पहली बार देखने आयी थी तो उसने मुझे अपनी छाती से लगा कर मेरी छाती को शीतल कर दिया था .क्या - क्या सुन्दर सपने देखने लगी थी मैं ! सबके सब चकनाचूर करके रख दिए उसने। आपने अपनी माँ का पूरा साथ दिया। हाथी के दांत खाने को और दिखाने को और निकले ----------- आपने अग्नि के सात फेरे लिए थे मेरे साथ। कोई वचन नहीं निभाया आपने। धर्मपत्नी बनाकर लाये थे आप मुझे लेकिन आपने पत्नी नहीं, दासी की तरह बनाकर रखा। पत्नी का दर्ज़ा कभी नहीं दिया . ---------- आपने कभी मेरी एक बात भी नहीं सुनी,सुनी अनसुनी कर देते थे आप तो। राज कपूर से मिलने की मेरी बड़ी इच्छा थी। आपसे रोज़ मिन्नत करती - चलो चलते हैं बंबई, राज कपूर से मिलने . आप एक कान से सुनते और दूसरे कान से निकाल देते --------- शादी से पहले अपने वादे याद करें . कितने प्यार - मनुहार से आप मुझे अपने गले से लगाकर कहते थे - प्रमिला, कुल्लू और मसूरी क्या, तुझे कश्मीर, स्वीडज़रलैंड और स्कोट्लैंड की भी सैर करवाऊँगा . -------- आप माँ के इशारों पर ही चले। मुझे ये कहते हुए शर्म आती है कि जवान होते हुए भी माँ के झिडकी से ही आपका पेशाब निकल जाता था ------------ वो शुभ घड़ी थी, आप इंग्लैण्ड आ गये पत्नी थी इसलिए मुझे भी आना पड़ा , पूरे पांच साल बाद। उन पांच सालों में आपने मेरी खबर तक नहीं ली। जिंदा थी कि मर गयी, कभी दो शब्द लिख कर आपने मेरा हाल नहीं पूछा। मुझे तो आपने अपनी माँ की जली - भुनी बातें सुनने के लिए छोड़ दिया था उसके पास। उस बुढ़िया के आगे मेरी कोई सुनवाई नहीं होती थी। भैंस के आगे बीन बजाती रह गयी मैं तो ------------- आपकी मनमानी चलती तो आप मुझे यहाँ कभी नहीं बुलवाते। अब तक मैं भारत में ही पड़ी रहती। गोरियों के साथ यहाँ आपकी रंगीन रातें खूब गुज़रती। शुक्र है मेरे माँ - बाप और भाइयों
का। उन्होंने बार - बार ज़ोर डाला और आपको मुझे बुलाना पड़ा ----------- आपका घर में बैठे रहना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता है। आप जब बाहर दोस्तों से मिलने जाते हैं तो सच मानिए मैं सुख का सांस लेती हूँ।" 

शांतिस्वरूप पत्नी प्रमिला के इन आरोपों का करारा जवाब दे सकते हैं , वे ईंट का जवाब पत्थर से देना खूब जानते हैं। क्या करें, उनके दो जवान बेटे हैं। दोनों ही माँ का साथ देते हैं। बात बिगड़ जायेगी इसलिए वह चुप रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। सोचते हैं कि शादी से पहले प्रमिला जबान की कितनी मीठी थी! मेरी तारीफों के पुल बाँधने में थकती नहीं थी। अपने प्रेम पत्रों में तो वह शहद घोल देती थी। प्राय: हर पत्र में में - "प्रियतम, आप कैसे हैं? सब कुछ अच्छा ही होगा क्योंकि आप बहुत अच्छे हैं। आपको कुछ न कुछ लिखना मुझे बहुत अच्छा लगता है। आप जैसा प्यारा व्यक्ति बड़े अच्छे नसीब से ही मिलता है। आप जैसे को पाना मानो अनमोल रत्न पाना है। आप मेरे लिए भगवान का दिया हुआ एक अमूल्य उपहार हैं----------- उस दिन की प्रतीक्षा है जब हम अग्नि के सात फेरे लेंगे और एक -दूजे के लिए एक हो जायेंगे, हमेशा -हमेशा के लिए . -------- डार्लिंग , मैं अपने बारे में क्या बताऊँ आपको ? जीवन भर का साथ रहेगा तो आप पायेंगे कि मैं कितनी शांतिप्रिय हूँ ! क्रोध की भाषा तो मैं समझती ही नहीं हूँ। पढ़ना, संगीत सुनना और घूमना मेरे शौक़ हैं। मैंने कहीं पढ़ा था कि पढने, संगीत सुनने और घूमने वाले बड़े शांत स्वभाव के होते हैं। शादी के बाद आपको सीने से लगाकर रखूँगी।"

बच्चे होने के पहले प्रमिला गाय थी गाय। बच्चे क्या हुए कि वह शेरनी बन गयी। बाज़ के पर लग गये उसे।  झपट्टे मारना उसकी आदत में शुमार हो गया। बेटे उसको रोकते - टोकते नहीं हैं बल्कि उसका पूरा साथ देते हैं। उनकी राय में आकर वह अंट-शंट अब कुछ बक जाती है। जवान हो कर भी बच्चे उससे छिपते रहते हैं। मुझसे तो आँख भी भी नहीं मिलाते हैं।  कभी नहीं पूछते - पापा , आप कैसे हैं ? आपको किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है? ऐसा व्यवहार करते है कि जैसे मैं उनका फादर नहीं, स्टेप फादर हूँ। सोच -सोच कर शांतिस्वरूप दुखी होने लगते हैं। 

एक बार पत्नी और बेटों की जली - भुनी बातों से तंग आकर शांतिस्वरूप पास ही एक पार्क में चले गये। अँगरेज़ मित्र डिक्सन मिला और पूछ बैठा - व्हाट इज रोंग विद यू ? यू आर लूकिंग वेरी सैड। जवाब में शांतिस्वरूप ने उदासी भरे शब्दों में कहा - बेटे बच्चे ही रहें तो बाप की सेहत के लिए अच्छा रहता है। उनके जवान होते ही उनकी नज़र में माँ की कीमत बढ़ जाती है और बाप की कीमत घाट जाती है . अपना सारा दुःख शांतिस्वरुप ने डिक्सन को कह सुनाया। डिक्सन को शांतिस्वरूप की हर बात सही लगी और जाते - जाते सहानुभूति के तौर पर वह कह गया - रेलैक्स मेट, इट हैपन इन आवर सोसाइटी एज वेल।

घर वाली की झकझक से बचने के लिए शांतिस्वरूप हर रोज़ सुबह के ग्यारह बजे भारी नाश्ता लेने के बाद पांच - छ: घंटों के लिए सिटी सेंटर की वैजीटेबल मार्केट में चले जाते हैं। वैजीटेबल मार्केट में दस- बारह पेंशनरों की महफ़िल जमती है। महफ़िल में आनेवालों में न कोई बंगाली है , न कोई गुजराती है और न ही कोई मराठी है। सब के सब पंजाबी हैं। कोई फोलशिल इलाके का है ,कोई स्टोक इलाके का है, कोई स्टोनी स्टान्टन इलाके का है और कोई स्टैचल इलाके का। दूर - दूर का फासला तय करके आते हैं सभी . अधिकाँश बस से आते हैं। एक - दो ही चल कर आते हैं। प्राय:सभी पेंशनर हैं। सबके पास फ्री बस पास है।

सर्दी का मौसम हो या गर्मी का, वेजीटेबल मार्केट के बैंचों पर बैठ कर सभी पेंशनरों में खूब गपशप चलती है। उन्हें न ठण्ड लगने का डर है और न ही बारिश में भीगने की चिंता। मार्केट चारों तरफ और ऊपर से ढकी हुई है। फिर भी सर्दियों में ठण्ड से बचने के लिए लगभग सभी मल्टी विटामिन की गोलियां खाकर घर से आते हैं। एक दिन संतोख सिंह ने मल्टी विटामिन के गुणकारी उपयोग के बारे में अपनी मूछों पर ताव देते हुए कहा था - दोस्तो , मल्टी विटामिन खाओ, जवानी पाओ और ठण्ड को दूर भगाओ। मुझे देखो , मैं अस्सी का हो गया हूँ।  घोड़े की तरह भागता - दौड़ता हूँ . ये देखो मेरे मज़बूत बाजू, पहलवान की तरह हैं किसी जवान के ऐसे? सभी ने ` नहीं ` में अपना - अपना सर हिला दिया था। 

दस - ग्यारह पेंशनरों की महफ़िल में सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर खूब चर्चा होती है . बढ़ - चढ़ कर भाग लेने वालों में केवल शांतिस्वरूप और कुलतार सिंह हैं। दोनों ही अपनी - अपने पत्नी और संतानों के सताए हुए हैं। घर से लाई हुई परेशानियों को वे सामाजिक और राजनीतिक विषयों से जोड़कर हमेशा बोलते हैं। शेष यार - दोस्त अच्छे श्रोताओं की तरह उनकी बातों का खूब आनंद लेते हैं। शाम को आनंदित होकर सभी अपने - अपने घर लौटते हैं। लौटते वक़्त हर कोई यही कहता है - चलो, आज का दिन भी मज़े में बीता।

शांतिस्वरूप और कुलतार सिंह को छोड़ कर शेष सभी अंगूठाछाप हैं। क्या हुआ अगर शेष सभी पढ़े - लिखे नहीं हैं लेकिन जीवन का अनुभव उनके पास भी है। यूँ ही उन्होंने बाल सफेद नहीं किये हैं।

पहले महफ़िल में धर्म या किसी जान - पहचान वालों के बेटे - बेटियों पर भी खुलकर चर्चाएँ होती थी। अब नहीं होती हैं। एक साल पहले चंद्रपाल सिंह और ओम प्रकाश में हिंदु धर्म और सिख धर्म को लेकर तकड़ी बहस हो गयी थी। बहस ने हाथापाई का रूप ले लिया था। उस घटना के बाद ही उत्तम सिंह की अनुपस्थिति में मोहन सिंह ने उसकी बेटी के बुरे लक्षणों की बाबत सबको बताया। बताया कि उसकी बेटी के कई अँगरेज़ लड़कों से अनैतिक सम्बन्ध हैं। उत्तम सिंह को पता चला तो वह दूसरे दिन दौड़ा आया। उसने मोहन सिंह पर ऐसे घूंसे बरसाए कि उसे दिन में ही तारे दिखने लगे थे . .। मोहन सिंह ने महफ़िल में आना ही छोड़ दिया।

महफ़िल में शामिल होनेवालों ने फैसला किया कि आइन्दा कोई किसी के धर्म या किसी के परिवार के बारे में कोई बात नहीं करेगा। तब से चर्चाएँ राजनीति और समाज तक ही सीमित होकर रह गयी हैं। साहित्य पर चर्चा होती है पर कभी - कभी। चूँकि एक - दो को छोड़कर साहित्य में किसी की रूचि नहीं है इसलिए उस पर चाचा कम ही होती है . हाँ , वारिश शाह और शिव कुमार बतालवी के नाम सभी जानते हैं। कभी कोई उनकी कोई पंक्ति सुनाता है तो सभी झूम उठते हैं। 

आज भारत में फैले भ्रष्टाचार पर चर्चा छिड़ती है। कुलतार सिंह बोल पड़ता है - काश , नोबेल पुरस्कार भ्रष्टाचार पर भी होता और भारत को दिया जाता। किसी शायर ने भारत में फैले भ्रष्टाचार पर कविता लिखी है। क्या आप सुनेंगे ? सभी ने एक स्वर में कहा - क्यों नहीं सुनेंगे भ्रष्टाचार पर , सुनाईये , सुनाईये।

कुलतार सिंह कविता सुनाता है , एक रंगमचीय अदाकार की तरह --

रब चीजां दी वंड जद करन लग्गा
धन देता उहने अमरीकियां नू
एकता दीती उहने बरतानियाँ नू
देश भकती दीती जापानियां नू
रूप देता उहने ईरानियाँ नू
लुट , खसुट , अनपढ़ता , फुट सारी
बख्स दीती हिन्दूस्तानियाँ नू

कुलतार सिंह कविता सुना कर सभी के दिल लूट लेता है। सभी वाह, वाह कह उठते हैं। भारत में फैले भ्रष्टाचार पर सब में जमकर चर्चा होती है।  

शांतिस्वरूप को खुलकर बोलने का अवसर मिल जाता है। वे अपने मन की भड़ास खूब निकालते हैं। गोया वे पत्नी प्रमिला के रोज़ - रोज़ के तानों पर भड़ास निकाल रहे हैं। वे बोलते हैं - "दोस्तो , सच ही कहा है कवि ने। भारत में लूट भी ज़ोरों पर है और फूट भी। बड़े नाज़ुक हालात हैं। वहाँ आदमी आदमी को लूट रहा है। गुंडागर्दी ही गुंडागर्दी है। साधु और डाकू एक से दिखते हैं। अपराध बढ़ रहे हैं। कचरियाँ भर रही हैं। सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का उक्ति चरितार्थ हो रही है। वकील बाबू सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने में ज़मीन आस्मान एक करने में थकते नहीं हैं। अध्यापक ट्यूशनों की तरफ ज़्यादा ध्यान देते हैं . देश भक्ति पर गीत लिखनेवाले कवि कवि दरबारों में भाग ले ले कर खूब धन बटोरते हैं लेकिन एक पैसा टैक्स में नहीं देते। मेरे दोस्तो, दहेज़ विरोधी संस्थाओं के होते हुए भी दहेज लेने की आँधी हर तरफ से उठ रही है। आज के नौजवान को देखो। वह माँ - बाप के दराजों से रुपयों - पैसों की चोरी करना अपराध नहीं समझता है क्योकि वह जानता है कि वो कौनसी उसके बाप की की सच्ची कमाई है। अगर वह चोर है तो उसका बाप भी चोर है। वह रात भर नाईट क्लबों में रंग - रलियाँ मनाने में अपनी शान समझता है। दोस्तो, भिखारी को ही देखिये भारत के। भीख में एक रुपया मिलने पर वो सौ गालियाँ देता है। साइकिल रिक्शा वाला तीस रूपये तय करके पचास रूपये की माँग करता है। बस कंडक्टर से पूछो कि बस कि बस कब चलेगी तो वो जवाब में गरजता है - जब समय होगा तो चलेगी। हमें यही तो बैठे नहीं रहना है। क्लर्क बाबू घर की बजाय दफ्तर में ज़्यादा ऊंघता है।बीमारी भले ही मामूली हो लेकिन डॉक्टर बीमार को इंजेक्शन लगाए बिना नहीं छोड़ता है। कपडे भेजने वाला पहले तो कमीज़ की कीमत चार सौ बताता है लेकिन धीरे - धीरे दो सौ पर बेचने को तैयार हो जाता है। नानक , कबीर , सूर तुलसी वगैरह ने कभी दो मन्ज़िला भवन बनाने के सपने नहीं संजोये थे। लेकिन उनके पदों को गा - गा कर न जाने कितने ही भजनीकों और गायकों ने महल जैसे मकान खड़े कर लिए हैं। दोस्तो, कन्या भ्रूण हत्या इस दौर की सबसे भयानक समस्या है। औरत औरत की दुश्मन बनी हुई है। आज ज़रूरत है जीजाबाई जैसी माँ की जिसने अपने सुपुत्र शिवा जी को अच्छे संस्कार दिए। आज ज़रूरत है उन माओं की जिन्होंने भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे सपूत पैदा किये। आज ज़रूरत है उन पत्नियों की जो अपने - अपने पति के कन्धा से कन्धा मिला कर चलीं।" 

शांतिस्वरूप के के ज़ोरदार वक्तव्य से सब के दिल हिल जाते हैं। ऊंघने वाले भी सकते की हालात में आ जाते हैं। तारीफ में साथियों की तालियाँ बज उठती हैं। पास बैठे कुछेक अँगरेज़ भी तालियाँ बजाने से रह नहीं पाते। यूँ तो अँगरेज़ पास बैठे लोगों की किसी बातचीत में दिलचस्पी नहीं लेते हैं लेकिन शांतिस्वरूप के जोश से भरे स्वर ने उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। 

घर में शांतिस्वरूप भले ही पत्नी के सामने दब्बू बन कर रहते हैं लेकिन बाहर साथियों के सामने ऐसा गरजते हैं जैसे उन जैसा शूरवीर कोई नहीं है।

कुलतार सिंह शांतिस्वरूप के स्वर में स्वर मिलाता हुआ बोलता है - "यारो , भारत देश का सुधार क्या ख़ाक होगा? जैसा राजा वैसी प्रजा। हमारे नेताओं ने समूचे देश को भ्रष्ट करके रख दिया है . भ्रष्टाचार के हमाम में सभी नंगे हैं। बेईमानी का बोलबाला है। चिंता वाली बात है कि नौजवान भी भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है। हमारी बीवियां उनको बिगाड़ रही हैं। बाप से छुपा कर बेटों को रुपया -पैसा देती हैं। उनको रोको - टोको तो वे आँखें दिखाती हैं। हम हैं कि उनके लिए बीमारियाँ पाल रहे हैं। बताईये , हम में कौन है जो अपने बाप की आँखों से आँखें मिलाकर
बात करता था ? कौन है जो उनके सामने ऊंची आवाज़ में बोलता था?"

"यही बात तो मैं कहता हूँ।"  शांतिस्वरूप एक बार फिर अपना राग अलापते हैं। "दोस्तो , हमारे बच्चे बिगड़ रहे हैं।  सच तो ये है कि उनके बिगड़ने में उनकी माएं कसूरवार हैं। अपने बच्चों को सीधे रास्ते पर लाने का एक ही उपाय है , वो ये है कि हमें उनके प्रति अपना मोह त्यागना पड़ेगा। माओं को अपनी विचारधारा को बदलना होगा। मेरे एक पड़ोसी हैं अँगरेज़। उन्होंने अपने जवान बेटे को दिन में तारे दिखा दिए थे। 
एक दिन वह घर में उसे देख कर हैरत में पड़ गये थे। बेटे से बोले - तू यहाँ कैसे अब ? 
उसने जवाब दिया - डैड , मैं वापस आना चाहता हूँ , आपके पास। आपकी सेवा करना चाहता हूँ अब। 
बाप गुस्से में बोला - नहीं , अब ये मुमकिन नहीं। तू मेरे घर में नहीं आ सकता है। तेरी माँ के मरने के बाद मैं अलग - थलग रह गया था। तुझे मैंने कई सन्देश भिजवाये। तू नहीं आया।  पांच सालों के बाद अब तू अपनी सूरत दिखा रहा है। चला जा यहाँ से। मैं अच्छे तरह जानता हूँ कि तू अब यहाँ किसलिए आया है? मुझे मिली पेंशन और बड़ी रकम तुझे यहाँ खींच लाई है। .मेरे रूपये - पैसों पर तेरी नज़र है। मेरे बुढापे की कोई चिंता नहीं है तुझे। जा , मुझे तेरी ज़रूरत नहीं है। मैं अकेला रहने का आदी हो गया हूँ। 
दोस्तो , बेटा गिड़गिड़ाया - डैडी , मुझे सेवा करने का एक मौक़ा दीजिये। बेटा डैडी के पैरों में गिर गया। बाप ने बेटे को धकेल दिया। कहा - चला जा यहाँ से। नहीं जाता तो मैं पुलिस को फोन करता हूँ। बेटा पुलिस का नाम सुनते ही एक दो तीन हो गया।  दोस्तो , हमें उस अँगरेज़ का अनुसरण करना होगा।  उस अँगरेज़ के बेटे को उसकी पत्नी ने बिगाड़ा था।...." 

सही कहते हैं आप शांतिस्वरूप जी किसी हद तक। लेकिन सच तो ये है कि कोई पत्नी से दुखी है और कोई पति से, कोई संतान से दुखी है और कोई बाप से। एक पर दोष मढ़ना ठीक नहीं है। मैंने कई परिवार हँसते - खेलते भी देखे हैं। मेरे परिवार को ही लीजिये। सभी मिल - जुल कर रहते हैं।  हर एक का सभी के लिए सद्भाव है। 

उजागर सिंह की बातें सुनकर कुलतार सिंह अपनी आँखें तरेरता है। शांतिस्वरूप के पेट में तो बल पड़ने लगते हैं। वह पुब्लिक टायलेट के ओर भागते हैं लेकिन उसके दरवाज़े पर लिखा है - आउट ऑफ़ ऑर्डर। शांतिस्वरूप के मुँह से गाली निकलती है - बास्टर्ड!!! 

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19 comments:

  1. A Story to read many times. An impressive PRAVASI KAHANI

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  2. प्राण शर्मा जी की ग़ज़ल कक्षा की तो मैं नीयमित विद्यार्थी रही हूँ। उनकी गज़लें भी खूब पढी हैं और संग्रह सुराही की भी अनेकों पंक्तियाँ पढी हैं। यह कहानी पढ कर सुखद आश्चर्य हुआ। यदि आपने और भी कहानिया लिखी हैं तो उन्हें भी इंटरनेट पर प्रकाशित कर दीजिये। साहित्य शिल्पी को धन्यवाद।

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  3. हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। सोमवार को
    ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।
    बेहतर है कि ब्लॉगर्स मीट ब्लॉग पर आयोजित हुआ करे ताकि सारी दुनिया के कोने कोने से ब्लॉगर्स एक मंच पर जमा हो सकें और विश्व को सही दिशा देने के अपने विचार आपस में साझा कर सकें। इसमें बिना किसी भेदभाव के हरेक आय और हरेक आयु के ब्लॉगर्स सम्मानपूर्वक शामिल हो सकते हैं। ब्लॉग पर आयोजित होने वाली मीट में वे ब्लॉगर्स भी आ सकती हैं / आ सकते हैं जो कि किसी वजह से अजनबियों से रू ब रू नहीं होना चाहते।

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  4. प्राण शर्मा जी की कहानी पढ कर सुखानुभूति हुई। विषय सामान्य सा लगता है लेकिन कहानी बहुत ही गंभीर है।

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  5. शर्मा जी ग़ज़ल के उस्ताद तो हैं ही, कहानी कला में भी पारंगत है. यह कहानी बेहद मार्मिक है और सच का बयान करने वाली है. ये कहानी उन लोगों तक भी पहुंचे जिनके लिए लिखी गई है. बधाई, प्राण जी.

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  6. एक पर दोष मढ़ना ठीक नहीं है- सही अंत पर आकर रुकी कहानी...बहुत उम्दा कहानी है. आपको पढ़ना अनुभव बटोरना है चाहे गज़ल हो या कहानी या लघु कथा.

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  7. एक अच्छी कहानी.हर घर में दो लोगों के बीच कुछ न सोच में अंतर तो होता ही है. बधाई प्राण जी

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  8. विदेशी परिवेश और देशी सोच के अंतर्द्वन्द्व को उजागर करती एक श्रेष्ठ कहानी।

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  9. आद. शर्मा जी की ग़ज़लें तो शानदार होती ही हैं, कहानी में भी प्रभावित किया है आपने|

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  10. रिश्तों मे कितना कुछ ैसा होता है जो घर को नर्क या स्वर्ग बना सकता है। हर परिवार की अलग अलग पीदा और खुशी को इस कहानी मे समेता गया है । दिल को छू गयी कहानी। भाई साहिब को बधाई।

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  11. apne samay ke satya ko udghatit karti is prabhavshali kahani ke liye priya bhai pran sharma jee ko badhai deta hoon.ashokandrey

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  12. कहानी बहुत प्रभावशाली है |

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  13. महेंद्र दवेसर 'दीपक'4 अगस्त 2011 को 2:33 pm

    राजीव जी,प्राण शर्मा जी की कहानी 'पति, पत्नी और संतान' पढ़ने का सुअवसर मिला और आनंद आ गया. एक बहती नदिया सी है यह कहानी! अंत में जब यह न्यागरा फॉल्स की तरह गहराई में उतरती है तो सचाई सामने आती है. जिन लोगों के गरेबान उनकी आत्मा से दूर होते हैं, उनका क्या हश्र होता है!!
    प्राण जी को एक अत्यंत सुन्दर, मार्मिक कहानी के लिए मेरी ओर से हार्दिक बधाई.
    महेंद्र दवेसर 'दीपक'

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  14. प्राण जी मेरे जैसा कहानीकार बेशक ग़ज़ल न लिख सके लेकिन प्राण शर्मा जैसा ग़ज़लकार एक अच्‍छी कहानी ज़रूर लिख सकता है, ये आपने बता दिया। खूब लिखीहै। बधाई

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  15. एक ग़ज़लकार की कहानी पढ़ना कौतूहल का विषय हो सकता है और कथापाठकों के लिये सुखद आश्चर्य भी, परंतु अन्त में जो चीज महत्वपूर्ण है वह है स्वयं कहानी. आदरणीय प्राण जी की गज़लों को पढ़ने के बाद पाठक उनसे जिस तरह जुड़ाव महसूस करते हैं, वह इस कहानी के साथ नहीं हो पाया है. कहानी में कथा-तत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है जो इस कहानी में कहीं पीछे छूट गया लगता है. एकाधिक कथानकों के समावेश से कहानी कुछ लम्बी और शिथिल होती प्रतीत होती है. शायद यही कारण है कि प्राण जी की कसी हुई ग़ज़लों का पाठक कहानी पढ़कर निराश होता है यद्यपि आपकी ग़ज़लों की ही तरह यह कहानी भी जीवन के सच को उजागर करने में कसर नहीं छोड़ती.

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  16. उपरोक्त टिप्पणी में मैं कहीं-कहीं "छोटा मुँह, बड़ी बात" कह गया हूँ परंतु जब व्यक्ति किसी रचनाकार के रचनास्तर की एक छवि बना ले तो उससे नीचे उसे कुछ भी पसंद नहीं आता. आदरणीय प्राण जी के संदर्भ में शायद यही बात मुझ पर भी लागू होती है. अत: वे स्वयं और उनके सुधी पाठक मुझे क्षमा करें!

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