अंतरिक्ष में आकाश गंगाएं, उनमें सैकड़ों सौर मंडल, उनमें अनेकानेक ग्रह, कछ ग्रहों में आबादी, कछ में केवल जमीन, लेकिन जहॉ आबादी वहॉ जमीनों का बॅटवारा, उनका नामकरण देश। ये खगोलशास्त्र है, सबको पता है। नहीं पता तो ये कि अंतरिक्ष की किसी आकाशगंगा के किसी सौर मंडल में कोई ग्रह है, जिसमें कछ आबादी या जमीन के कछ हिस्से का नाम गारत देश है, मैं वहॉ के लोगों को अेलियन कहता हूँ, वे मुझे नहीं जानते, यदि जानते होते तो निश्चय ही मझे क्या आपको भी झेलियन ही कहते। वैसे इस गारत देश का अपना एक इतिहास है वहॉ के लोग पैदाइशी निकम्मे, डरपोक, स्वप्नदृष्टा और अवतारों की प्रतीक्षा करने वाले होते हैं, इसमें उनकी कोई गलती भी नहीं, परातन काल में भगवान जी के आदेश पर जब अवतारों को उस ग्रह के अलग अलग देशों में प्रकट होना था तब वे समय से निकले भी, लेकिन जिस विमान में वे सभी अवतार बैठे थे उस में तेल पानी ठीक नहीं था और गारत देश के ऊपर पहुँचकर ही तेल खत्म हो गया, सारे अवतारों को वहीं इमरजैन्सी लैन्ड करना पडा, नतीजतन सभी गारतवासी अवतारों मे अटूट विद्गवास करने लगे। 

इसका परिणाम ये हुआ कि वहॉ अलग अलग देशों के अलग अलग प्रजातियों के वे एलियन आते रहे जिन्हें अवतारों में विश्वास नहीं था, गारतवासियों को ठोकते पीटते लूटते रहे, उनकी नस्लों में मिलावट करते रहे, लेकिन ये बेचारे गारतवासी अवतार की प्रतीक्षा ही करते रहे। सबसे अंत में वहॉ गोरे एलियन्स ने लगभग एक सौ नब्बे साल तक ठोका पीटी की, तब वहॉ भगवान जी ने एक अवतार भेजा, वो एक बूढा सा कृशकाय प्राणी था, पर उसमें गजब की ताकत थी, वो सच बोलता था अहिंसक विरोध करता था, भूख हडताल से विपक्षी को धराशायी कर देता था, या ये भी हो सकता है कि अवतार को जीतना ही था, इसलिये गोरे चले गये, एलियन्स आजाद हो गये। 

लेकिन वहॉ के कछ चतर एलियन्स जो वक्त की नजाकत भॉप कर उस बूढे के पीछे लग लिये थे, ने वहॉ के निवासियों की प्रवृत्तियों को समझ लिया और अपने विनम्र लोकतांत्रिक तरीकों और उस बूढ़े की कर्बानी को भनाते हुए उन पर कब्जा करके बैठ गये, हालॉकि बाद में इन कब्जेदारों के अलग अलग दल हो गये थे, लेकिन करते सब एक जैसा ही थे, पॉच साल में एक बार विनम्रता पूर्वक वे गरीब अेलियन्स के सामने हाथ जोड कर आते, उन्हें दारू, कंबल बॉटते, जातियों का अर्थ समझाकर चनाव जीतते और पॉच साल तक वही गंडई उन पर करते जो एक सौ नब्बे साल तक गोरे एलियन्स करके गये थे। पीडित अेलियन्स गस्सा भी होते, अगली बार दूसरे दल को जिता देते पर उससे कोई फर्क नहीं पडता, दूसरा दल पहले वाले से तरक्की ही करता और ज्यादा लूटता, तरह तरह के टैक्स बनाता जनता पर चिपकाता और बटोरकर गारत देश के बाहर पहुँचा देता। इन दलों की लूट ने आम एलियन तक को लटेरा, परपीडक और दिशाहीन बना दिया था, मजदूर से लेकर कलक्टर तक भ्रष्टाचार या दो नंबर नाम की बीमारी का शिकार हो चके थे, पीडित और ईमानदार टाइप एलियन्स ने अवतार के लिये भगवान से निवेदन किया, भगवान के पास समय की कमी थी सो भगवान जी ने खन्ना नाम के प्राणी में अवतारी शक्तियॉ डाल दीं, उसने भी वही तरीका अपनाया जो आजादी के वक्त कृशकाय बूढे ने अपनाया था, पहले वह आमरण अनशन पर बैठा तो लाखों लोग उसके समर्थन में आ गये जिनमें कछ ईमानदार थे, कछ अवसरवादी, कछ बतौर फैशन ही उसके साथ जुडे लेकिन एलियन सरकार हिली, उसे बातचीत के लिये बलाया गया कि चलो हम सब मिलकर भ्रष्टाचार से निपटेंगे एक कानून बनायेंगे, दरअसल सत्ताधारी दल की नीयत कानून बनाने की नहीं बल्कि खन्ना से निपटने के लिये योजना बनाने के लिये समय लेने की थी, क्योंकि ये उस दल की सरकार थी जिसने आजादी के बाद चौंसठ में से लगभग पचपन साल तक शासन किया था, यानी अगर दो नंबर की जॉच होती तो ये दल एक नंबर पर ही होता, खैर तीन चार महीने उस अवतार को झूला झलाया गया फिर एक मामूली सा कानून का मसौदा बनाकर मंसद नाम की सर्वोच्च संस्था के सामने रख दिया गया और खन्ना को धता बता दी गई पर खन्ना नहीं हारा, आखिर अवतार था, उसने धमकी दे दी थी कि यदि उसकी बात नहीं मानी गई तो आजादी की सालगिरह के दूसरे दिन वह आमरण अनशन पर बैठ जायेगा। अब सरकार पर खन्ना संकट आ चका था, उनके दल की पालाकमान बीमार पड़ीं थीं, सरकार के प्रधानतंत्री बिना उनके पूछे एक नंबर भी नहीं करते थे तो दो नंबर के खिलाफ कानून के मसले पर क्या कर पाते? 

नतीजतन उस दल का हर तंत्री प्रधानतंत्री बन चका था, हर मान्सद तंत्री और हर कार्यकर्ता मान्सद। तंत्रीमंडल की आपात बैठक चल रही थी, सब सोच में डूबे थे, अचानक एलियन विकास तंत्री श्री छिब्बल बोले 'अब ये खन्ना असह्‌य हो गया है, बताइये कितने साल खर्च किये हमने यहॉ तक पहुँचने में, रातों रात स्टार बन गया है ये एलियन, चारों तरफ उसकी जय जयकार हमारी भय भयकार हो रही है, कितना पैसा खर्च किया हम लोगों ने? एक इलैक्शन में दस से बीस करोड, वो चार आने का एलियन? आप सब लोग कछ सोचेंगे कि उसे ही बना दें प्रधानतंत्री?' उन्होंने प्रधानतंत्री की ओर देखा

प्रधानतंत्री ने कोई तवज्जो नहीं दी, उन्होंने जाकिट की जेब में से कान साफ करने की मैडीकेटेड बत्ती कान में डाल कर, एक ऑख मींचकर उसे धीरे धीरे घमाया तथा परोक्ष में बता दिया कि इस चर्चा से बेहतर उनके लिये कान का मैल निकालना है।

'आप भी छिब्बल जी.... इतना आगे बढने ही क्यों दिया? फिर उसे पटाने के लिये जब छद्म परस्कार दिया गया था तब आप कहॉ थे? उसका आशीर्वाद लेते हुए शिव विजय जी के तमाम फोटो अखबारों में दिख रहे हैं' एक महिला स्वर आया' 

देखिये दम्बिका जी, उस वक्त तो ये हमारे दल के नजदीक था, या तो उस वक्त हम इसे नहीं पहचानते थे, या ये हमें नहीं पहचानता था, हमारे बाबा का चेला तो अभी भी बनता है ये, क्या पता था इस तरह हमारे ही उॅगली करेगा? फिर भी अेसा नहीं कि साथी लोग चपचाप थे, सपारी तो दी गई थी इसकी, पर क्या करें? कमबख्त सपारी किलर ही इससे मिल गया, जाके बता और आया, पर आप बताइये आप टेलीविजन तंत्री हैं, आपके रहते इतना बाइट कैसे मिला इसे?'

'अइयो सर जी, जगरने का नईं, अब ख्या खरने खा अे ए सोछने खा, फहले ख्या खिये ख्या मीनिंग, ओ इंख्वारी खराये आप, ख्या रिझल्ठ निखली?'

'देखिये निदंबरम जी, रिजल्ट ऑन पेपर क्या निकलना था आप भी जानते हैं, ये आजकल के जज भी ना कछ नहीं कर पाते, बस कछ संदेहास्पद बातें ही डाल पाया, आरोप भी लगाये हैं हमने उस पर भ्रष्टाचार के लेकिन उसका कोई विद्गवास नहीं कर रहा, लोग कहते हैं खन्ना भ्रष्ट था तो उसे कानून बनाने के लिये क्यों बलाया था? हम तो उसे जॉच से उसे डराना चाहते थे, बड्‌ढा डरा नहीं, मिलिटी मैन है साला'

'आपखा फ्राब्लैम ख्या मालूम? आप झमीन से झड़ा नईं, इसखे लिये चालू खादब खी मदद लेने का ओ फॅसाने निखालने खा सब थरीखा जानथी'

'वो मदद करेगा?'

'खइसे नईं खरेगी, ओ तो के.पी. आन्दोलन खी सबसे भ्रष्ट प्रोडक्शन होती, साला कैटल एलियन्स का चारा तक नईं छोडी, भ्रष्टाचार खतम हुई तो सबसे पहले चालू खादब खतम हुई, अमरा मदद उसका मझबूरी सर जी'

छिब्बल जी ने फोन लगाया, उधर से आवाज आई

'का छिब्बल बाबू, अब खैरात बॅटने लगा का? देखिये तो हमरा मदद का जरूरत परा कि नहीं?'

'अब देखिये खादब जी ये राष्टीय संकट है, मतभेद भलाकर हम सब उस खन्ना से निपटने का तरीका सोचें तो ठीक रहेगा'

'आप कछ निकाल पाये?'

'हॉ अपने जन्मदिन पर दो लाख बीस हजार खर्च किये थे बड्‌ढे ने'

'बाप रे अतना पइसा तो हमरा महरारू के बप्पा के काका की तेरवीं पर नहीं उठा'

'तब आप करते क्या थे? देशी दारू की भट्‌टी थी आपकी, चौथ उगाही करते थे आप, कोई ढंग की बात कीजिये, भला मानिये के.पी. का कि भैंस के तबेले से निकलकर आप मख्यतंत्री बन गये, इस मद्‌दे पर तो पब्लिक हमें कायावती का जन्म दिन याद दिला देगी, जब उसने जन्मदिन पर पूरे प्रदेश में उगाही कराई थी, न देने पर एक इंजीनियर मार भी दिया था'

'अेसन है, ओ बढ़वा मिलटरी में काम किया है, कौनौ गरबर तो किया होगा पक्का, एकाध बोतल दारू, एकाध पाकिट सिगरेट, एकाध चड्‌ढी, एकाध बनियान, भ्रष्टाचार तो भ्रष्टाचार है दो लाख करोड हो कि दो रूपया, दो रूपया ज्यादा बरा है, साला स्वीपर के झाडू में दो सींक कमा जाय तो हमरा कानून पूरा झाडू उसकी बॉडी में घसेर देता है, अइसा ही कछ निकालिये'

'सब पता कर लिया, पंद्रह रूपये का एक झोला गमाया था खन्ना ने, पॉच पॉच करके पचहत्तर कटा दिये थे'
'पंद्रह का पछत्तर?'

'हॉ, कीमत तो पंद्रह ही थी, खरीदा हम लोगों ने था इसलिये पचहत्तर थे रिकार्ड में'

उग्र धड़े के नेता धनीश दिवारी को गस्सा आया, उन्होंने छिब्बल जी से फोन छीना

'बंद कीजिये फालतू प्लानिंग, हम हाथ पर हाथ नहीं रख सकते, ये हमारी औकात पर, हमारे अस्तित्व पर हमला है, प्रधानतंत्री या पालाकमान आदेश दें, कल ही गोली मारता हूँ बहन के.....को, इसकी मॉ..., इसकी दादी......., इसकी पडोसन......'

'अरे....अरे....रिकार्डिंग तो नहीं हो रही? उग्र मत होइये दिवारी जी, लाइये अपने मोबाइल जमा कीजिये मेरे पास सब लोग, कोई भरोसा नहीं कल दल बदल करके हममें से कोई विरोधियों को सबूत पहुँचा दे, मैं आपकी भावनाओं को समझता हूँ धनीश जी, चाहते हम भी यही हैं, लेकिन उसकी हत्या किसी सरफिरे से करवा भी दें तो वो भी राष्ट पिता बन जायेगा'

'कैसे बन जायेगा? बाप का राज है क्या? राष्टपिता तो पहले ही हमारा बूढा बाबा बन चका है, और ये भी तो उसी का नाम ले लेकर यहॉ तक पहुँचा है' शिव विजय जी बोले।

'तो राष्ट चाचा बन जायेगा' एक आवाज आई। 

'राष्ट चाचा भी हमारी पार्टी का ही है, वो ही रहेगा' वकील अहमद बोले। 

'तो राष्ट ताऊ बन जायेगा, मामा, फूफा कछ भी, इस पर बहस न करो पर ये तय है कि शहीद बन जायेगा, कछ और सोचिये' छिब्बल जी बोले। 

'अेनकाउन्टर कैसा रहेगा?' शिव विजय जी ने अपनी धूर्त मस्कान फेंकी। 

'हम आपकी धूर्तता के कायल हैं शिव विजय जी, आपकी धूर्तता ने पार्टी को कई बार संकट से निकाला है, एनकाउन्टर तो सरकार का संवैधानिक अधिकार है, बस दबा छिपा हो, लेकिन इस बार मामला बढ चका है लोग सरकार के खिलाफ हो जायेंगे, हॉ ये फणे में किसान आन्दोलन में होता तो निपट लेता एट स्पॉट'

'अच्छा बड्‌ढे की सी.डी. बना दें तब?'

'अरे आप तो अेसे कह रहे हैं कि बड्‌ढा पैदाइशी लगाईबाज हो, माफ कीजिये दम्बिका जी...' उन्होंने वल्गर शब्द बोलते हुए मस्कराकर दम्बिका जी की ओर देखा

'नहीं नहीं कैरी ऑन...अच्छा विषय है' वे मस्कराईं

'हॉ तो शिव विजय जी बड्‌ढा बहुत संयमी है, बकरी का बच्चा भी नहीं कि चाहे जब वीडियो बना लो' दखर्जी जी बोले

'तो हमें कौन उसके संयम को चैक करना है? देखिये हर आदमी की मिलती जलती शक्ल का आदमी इस ग्रह पर मौजूद है, आपका, मेरा, ममिताभ बचपन और वचिन पेन्डल्कर का भी, मैं तो दो एलियन्स पकड़ भी लाया हूँ खन्ना से मिलते जलते, आप कहें तो दोनों की सी.डी. बनवा दें'

'सी.डी. की जॉच भी होगी लैब में?'

'सरकारी लैब में' उनकी मस्कराहट धूर्तता से लंपटपने पर आ गई

'आयडिया अच्छा है, लेकिन चौहत्तर साल का एलियन है, इस उमर में एलियन सी.डी. लायक नहीं रहते'

'आम एलियन ....ये अपवाद है' वे बेद्गार्म हॅसी हॅसे

'वो जज के सामने ही अपने डाक्टर, अपने लैब वाले से जॉच कराये तब?'

'ये तीन साल बाद होगा, जेल में उसकी दाल में पाइंट टू एम.जी. यूरेनियम, थोरियम कछ भी मिलवा दो, अेसा एटम बम जैसा फूट फूट कर निकलेगा शरीर में से कि घर के लोग भी यकीन कर लेंगे कि बड्‌ढा ककर्मी था' वे फिर वारांगना हॅसी हॅसे

'नहीं ...इसके लिये वक्त चाहिये था, तरत फरत में अेसे आरोप नहीं लग सकते'

'दंगा कैसा रहेगा? उसके धरने में उसके लोगों से ज्यादा अपने लोग घसेड दिये जायें, जो राह चलती फीमेल एलियन्स को छेडें, ज्यादा करें तो रेप कर दें, तोड फोड या उत्पात करें, सडकों पर लूटपाट करें, फिर उसे उठाओ, उसके आदमियों को उठाओ, कर्फ्‌यू लगा दो, शूट एट साइट, फिर आपके पास दोनो ऑप्शन हैं मारो या जेल में डालो, ज्यादा हो तो इमरजेन्सी लगा दो, एकाध विपक्षी को भी निपटा लेंगे'

'ये ठीक रहेगा?'

'सही बताऊॅ अपना बड्‌ढा बाबा इसीलिये इतना आगे गया कि गोरे एलियन्स ने उसे समय से नहीं निपटाया, अगर शरू में ही शूट अेट साइट हो जाता तो अपने बाबा को इतना नाम नहीं मिलता'

'लेकिन जनता..?'

'लूटपाट, रेप, तोड़फोड सबकी रिकार्डिग होगी अपने पास, जनता को दिखा देंगे, जनता कितने दिन याद रखेगी? चौहत्तर से सतत्तर तक कत्तों की तरह रगेदा था पब्लिक को, अस्सी में हम फिर आ गये, तोपों में दलाली कान्ड हुआ, हम हटे लेकिन डेढ साल बाद फिर हम ही आये, इसलिये कछ भी करो पब्लिक सब भूल कर अवतारों की प्रतीक्षा करती है और एक अवतार पैदा होने में साठ सत्तर साल तो लगते हैं, भगवान भी इतनी फर्सत में नहीं बैठा'

'अइयो टीक बोली ए द्गिाव विजय बाई, चिब्बर सर दिस शड बी द राइट आप्शन'

'अच्छा तो भाइयों फाइनल....हॉ प्रधानतंत्री जी आप इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं?' छिब्बल जी बोले

'हॉ, क्या बोला...' प्रधानतंत्री उबासी लेते हुए उठे

'कमाल है सर आप अेसे संकट में भी सो लेते हैं?' शिव विजय जी झल्लाये

'जागकर भी हम क्या उखाड सकते हैं? सिवाय नैतिक जिम्मेदारी लेने के?'

'आपने योजना सनी?'

'हमने पहले भी कोई योजना नहीं सनी'ये'

'ये मैडम के सामने बोल पायेंगे?'

'उनसे मैं निजी बातें नहीं करता, फिर आपको क्या फर्क पड़ता है? मैडम को कन्विन्स कीजिये, मैं नैतिक जिम्मेदारी ले लूंगा'

'आप तो किसी काम के नहीं ....चलो भाइयों, आप भी दंबिका जी, संकट का समय है, बीमार मैडम से बात करना ही पडेगी '

प्रधानतंत्री जी ने उन्हें जाते हुए देखा, सर खजाया, कर्सी पर पॉव फैलाये और सो गये, कमाल है वो अेलियन और हम झेलियन एक जैसे ही होते हैं।

3 comments:

  1. व्यंग्य धारदार है अभी अभी अन्ना की गिरफ्तारी भी हो गयी है।

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  2. khanna sankat is for a change in recent political era.

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