शहरीकरण का भूत [कविता] - ज्योतिप्रकाश सिंह


शहरीकरण के भूत ने
मंहगाई की भूख ने
सरकार की लूट ने
सांचा बदल दिया
हँसते-डोलते गाँव का ढांचा बदल दिया।

आह! वो उल्लास के दिन
तंगी में भी बेहद उन्माद के दिन
मिलना-मिलाना
भाईचारा सद्‌भाव का रस
कठिन परिश्रम, शांति और प्रेम में
डूबा रहता था गाँव बरबस

अब याद आता है
रह-रह के वो बचपन
जब आस पड़ोस से निकलता था
चुल्हे का धुंआ
मां देती थी उपला, और कहती
चाची से जरा सा आग लेके आ।
पड़ोस की दादी भी आती,
कहती
दुल्हन जरा सा देना धनिया।

तब पूरा गाँव एक परिवार होता था
अब भी कुछ है,
पर पहले अलग ही रास होता था
गाँव मैं बधुत्व था,
आपसी सहयोग का वास होता था।

नौजवान भागे शहर कमाने को
पेट में दाना, घर मैं सुख
ऐसा धन लाने को
कभी कहा जाता रहा होगा
भारत गाँवों को देश
अब सरकार ने बदल दिया यह अभिलेख
संयुक्‍त परिवार का क्या कहे भाई
अब तो परदेशी हो गया माँ का सपूत
वाह रे शहरीकरण का भूत॥

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1 टिप्पणी “शहरीकरण का भूत [कविता] - ज्योतिप्रकाश सिंह”

अभिषेक सागर ने कहा…
29 सितंबर 2011 को 3:47 pm

अच्छी कविता...बधाई


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