बहुत दूर अतीत में पीछे रह गए वे दिन जब नई भोर के स्वागत में चिड़ियां चहचाया करती थीं। अब तो यह संगीत कभी-कभार ही सुनने को मिलता है। बस बोतलें बजती हैं – दूध की भरी या ख़ाली बोतलें। सवेरे सवेरे वे गाड़ियों में आते हैं और ग्राहकों के द्वार पर भरी बोतलें रख जाते हैं और ख़ाली बोतलें उठा ले जाते हैं। बोतलों की यह टनन-टनन भी अब कम होती जा रही है क्योंकि दूध सुपरस्टोर्ज़ में सस्ता मिलने लगा है।

दूध ही तो चाहिये रीमा को। वह कल शाम ही इस किराए के मकान में आयी है पति निशीथ के साथ। एक उनका बेटा है – पांच वर्ष का नीरज। कल रात वे थके हारे कुछ भी खाकर सो गए थे। निशीथ को तो सुबह सुबह बेड-टी चाहिए होती है और नीरज को भी दूध देना होता है। आज वह देर से उठी। कांच से कांच का – बोतलों का – टकराव तो वह सुन न सकी। अब दूध कहां से आए?

अकारण ही उसने किचन का दरवाज़ा खोला। यह कैसा संयोग था कि बग़ल वाले घर के फ़ेंस की दूसरी तरफ़ खड़ी थी एक अपूर्व सुंदरी। उसकी आवाज़ कानों में खनखनाई, “बाजी!”

आमतौर पर यहां वार्तारम्भ ‘हाय’ या ‘हैलो’ जैसे शब्दों से होता है। इनमें ‘बाजी’ जैसे संबोधन का अप्नत्व कहां? फिर जिस अप्नत्व से उसने पुकारा था उसी अप्नत्व से वह बोली, “आप लोग तो कल शाम ही यहां आए हैं, किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो बेझिझक कहिए।”

यह थी शमीम!

“थैंक यू, ये तो अभी सोए पड़े हैं। उठेंगे तो चाय मांगेगे। यहां पास में कहीं से दूध मिल सकेगा?” शमीम ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह तुरंत अंदर गयी और दूध की एक बोतल उठा लाई। उसी शाम रीमा फ़ेंस के ऊपर से ही बोतल के बदले बोतल लौटाने लगी। “रहने भी दीजिए। एक निगोड़ी दूध की बोतल ही तो है।” “बोतल तो आपको लेनी पड़ेगी।” “बोतल मैं ले लूंगी, मगर आपको नए पड़ोसी होने की रस्म निभानी पड़ेगी।”

रीमा बोतल लेकर पहुंच गयी। शमीम ने अपनी दोनों बेटियों से मिलवाया – शाहज़िया, उम्र चार साल और शहनाज़, उम्र पांच साल। शहनाज़ तो नीरज की हम-उम्र निकली जो उस समय मां के साथ आया हुआ था। बच्चों में दोस्ती होना स्वाभाविक था। दोनों घरों में आना जाना शुरू हो गया। रीमा जल्दी ही समझ गयी कि शमीम बिल्कुल अनपढ़ है। शायद अपनी इसी कमज़ोरी को छुपाने के लिए वह हमेशा अपने पूरे मेकअप में रहती है। नए से नए फ़ैशन करती है। जब लोग ऐसे हुस्न से दो-चार होते हैं तो प्रशंसा में नज़रें उठती हैं और द्वेष में उंगलियां!

क्रिकलवुड – लंडन के उत्तर-पश्चिम में स्थित एक बस्ती है। अब अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिक’ के माने हुए ‘ऐंठन’ ॰ ॰ ॰ तनाव! तनाव ॰ ॰ ॰ जैसे गर्दन का, पीठ का या फिर पूरे बदन का। लगता है यहां इस तत्त्व की कोई कमी नहीं। यदि ‘क्रिकलवुड’ न होकर इस स्थान का नाम होता ‘क्रैकलवुड’ ॰ ॰ ॰ मतलब जलती लकड़ी का तिड़कना, चटख़ना तो यह और भी उचित होता। यहां के अधिकतर घर ऐसे हैं जिनकी बाह्य दीवारें आपस में जुड़ी हुई हैं। इन घरों की मरम्मत होती होगी, बराबर होती होगी। फिर भी यह चरमराते, चटख़ते से दिखते है। लगभग सौ साल पुराने इन जुड़े घरों की दीवारों के कान ही नहीं, आंखें और होंठ भी होते हैं। यह दीवारें सुनती ही नहीं, देखती और बोलती भी हैं। तभी तो रीमा और शमीम की बढ़ती दोस्ती और घनिष्टता की ख़बर जल्दी ही दूर दूर फैल गयी। सड़कों पर ठूंसे गए घरों में ऐसा ही होता है। यहां दीवारें भी बोलती हैं।

एक शाम जब शमीम रीमा के यहां आई हुई थी तो निशीथ ने पूछा, “शमीम जी, आपके ख़ाविंद कहां होते हैं? कभी उनसे भी मिलवाइये।” “क्या बताऊं? मैं तो ख़ुद तंग आ गई हूं अमीन के दौरों से। कभी वो कहां होते हैं, तो कभी कहां। बस तीन-चार दिन बाद उनका फ़ोन आ जाता है ॰ ॰ ॰ कभी कहीं से, कभी कहीं से! उनका कारोबार ही ऐसा है। लाख समझाया कि पैसा ही सबकुछ नहीं होता, मगर वो मानें तब ना!” “तो भाई साहिब करते क्या हैं?” “ठीक से तो मेरी समझ में भी नहीं आया। बस यही, इधर ख़रीदा तो उधर बेचा। उधर ख़रीदा, इधर बेचा। आजकल वो सिंगापुर में हैं।”

रीमा को अमीन के कारोबारी दौरों और उसके सिंगापुर में होने की हक़ीक़त भी जल्दी ही समझ में आ गयी। एक दिन वह शॉपिंग के लिए कहीं बाहर जा रही थी। रास्ते में उसे मिल गयी मिसेज़ सहगल। “आप शमीम की नयी पड़ोसन हैं न?” “जी।” “उससे दूर रहेंगी तो ठीक रहेगा। नहीं तो बिन बात बदनाम हो जाएंगी।”

ऐसा ही कुछ मिसेज़ क़ुरैशी, मिसेज़ कपूर और तनेजा साहिब ने भी कहा।

रीमा चौंकी। उसकी समझ में आने लगा की शमीम किसी कीचड़ में फंसी पड़ी है और छींटे उड़ेंगे ॰ ॰ ॰ और यह भी कि छींटों को पहचान नहीं होती कि कौन कितना साफ़ है, कौन कितना मलिन!

छींटों की दिशा तो वह बदल नहीं सकती थी। उसने अपनी ही दिशा मोड़ ली। यह था भी सरल! नीरज को स्कूल में डालकर रीमा ने पार्ट-टाइम नौकरी शुरू कर ली। उसने नीरज के सहपाठी बच्चों की माओं और कंपनी के सहयोगियों के साथ मेलजोल बढ़ा लिया। फ़ालतू समय में वह इन नई सहेलियों के साथ कॉफ़ी-पार्टियों में शामिल हो जाती। उन्हीं के साथ शॉपिंग के लिए निकल जाती।

इन्हीं मुलाक़ातों, पार्टियों में शमीम के पति अमीन के ‘कारोबारी’ दौरों की कहानी खुल गयी। पता चला कि जनाब ग़ैर-क़ानूनी ढंग से इंगलैंड में बसने के लिए कुछ लोगों को लाते हुए रंगे हाथों पकड़े गए और लंडन की एक जेल में चार साल के लिए आराम फ़र्मा रहे हैं। पति की अनुपस्थिति में और भी जो गुल खिलाए जा रहे हैं, उनकी चर्चा भी इन महफ़िलों में होती।

शमीम के गुलिस्तान में जो फूल खिल रहे थे, उनके नाम हैं -- आरिफ़, आफ़ताब, रफ़ीक़ और जमील। आरिफ़ और आफ़ताब तो लंडन ट्रांसपोर्ट में बस कंडक्टर हैं। रफ़ीक़ एक टैक्सी चलाता है और जमील किसी फ़ैक्टरी में काम करता है। इनमें किसकी दाल गलती है, किसकी नहीं – कौन जाने? वैसे आमतौर पर वह रफ़ीक़ की टैक्सी में घूमती देखी गयी है। कई तो कहते हैं कि जबसे अमीन को जेल हुई है, दाल तो तभी से गली गलाई थी। एक अकेली ख़ूबसूरत जवान औरत और इर्द-गिर्द पुरुषों की भीड़, यह सब तो होना ही था। कहने को वे सब किरायेदार हैं, लेकिन क्या वे किरायेदार ही हैं? कभी कभी तो लगता है कि ये उसकी राह के कांटे हैं। एक ख़याल यह भी है कि वह स्वयं अपना कांटा आप है। नहीं तो वह अपनी इच्छा से इन लोगों को अपने घर में क्यों रखती?
एक और है, प्रफ़ुल्ल बिस्वास! वह एक बंगलादेशी है। वह भी यहीं कहीं एक फ़ैक्टरी में काम करता है और रहता है सड़क के उस पार शमीम के घर के सामने वाली कतार के एक घर में। वैसे तो वह अकेला है, फिर भी उसने पूरा घर संभाल रखा है। सुनते हैं कि उसका परिवार कहीं बंगलादेश में है और यह घर उसने उन्हीं के लिए ख़्रीदा था। मगर उनको यहां आने का वीज़ा नहीं मिल सका। यह ही साल दो साल में एक बार उनसे मिल आता है।

प्रफ़ुल्ल बिस्वास शमीम के सभी किरायेदारों से बढ़कर आकर्षक है और अमीर भी। वह अपना नाम प्रफ़ुल्ल नहीं, बंगाली अंदाज़ से ‘प्रोफ़ुल्ल’ बताता है। शमीम का नाम हो जाता है ‘शोमीम’। उसके नाम का अन्तिम ‘म’ वह इस तरह से गटक जाता है कि सुनने वाला सुनता है ‘शो मी’!

मिसेज़ ‘शो मी’ यानी शमीम प्रफ़ुल्ल को क्या दिखलाती है या उसमें क्या देखती है, कौन जाने? लेकिन हर तीसरी चौथी शाम वह प्रफ़ुल्ल के घर में होती है ॰ ॰ ॰ सजी, संवरी ॰ ॰ ॰ अपनी सभी बिजलियों के साथ। फिर जब वह वहां से निकलती है – भरी-भरी, खिली-खिली सी – अपने आभूषणों में, तो वह और भी सुंदर लगती है। क्या वह किसी का विश्वास भंग कर रही है? यह तो वे दोनों ही जानते होंगे।

वह ईद का दिन था। उसी शाम रीमा शमीम के यहां पहुंच गयी। हाथ में थी रूमाल में लिपटी सवैयों की प्लेट। उस समय निशीथ भी घर में था। “आज ईद है ना! आपको ईद की सवैइयां खिलाऊं ताकि जब दीवाली आए तो आप भी हमें याद रखें।” वह हंसती हुई बोली। फिर वह रीमा से गले मिली।

रीमा और निशीथ ने भी जवाब में ‘ईद मुबारिक’ कह दिया। फिर निशीथ ने पूछा, “आज के दिन तो अमीन भाई साहिब भी घर पर होंगे। उन्हें भी हमारी ओर से ‘ईद मुबारिक’ कहिये।”

शमीम की आंखों में आंसू आ गए, “आज के दिन झूठ नहीं बोलूंगी। अमीन किसी दौरे-वौरे पर नहीं हैं। वो तो पिछले तीन साल से जेल में पड़े हैं। अभी एक साल की सज़ा बाक़ी है “क्यों क्या हुआ था?” “कुछ अपने ही लोग थे। उन्हें यहां बसाने के लिए चोरी-छिपे ट्रक में ला रहे थे। क़िस्मत ख़राब थी, पकड़े गए।” उसने जुर्म का औचित्य भी समझाया, “देखिए न भाई साहिब! यह लोग दो सौ साल हम पर हुकूमत कर गए। क्या इसमें हमारी कोई मर्ज़ी थी? क्या हमने कहा था, आओ और हम पर ज़ुल्म करो?” मतलब यह कि अमीन की यह हरकत जुर्म नहीं थी, प्रतिशोध था, जिसकी ज़िम्मेदारी अकेले अमीन पर थी।

नीरज उन दिनों बीमार चल रहा था। शमीम उसकी मिज़ाज पुर्सी को पहुंच गयी और अपने पति की जेल-यात्रा को लेकर लगी समझाने, “बाजी, इस मुल्क में जेल जाना कोई बड़ी बात नहीं! बड़े बड़े लोग भी जेल हो आते हैं, अपनी सज़ा काटते हैं और फिर बेदाग़ होकर नए सिरे से ज़िंदगी शुरू कर लेते हैं।”

एक दिन वह फिर आई। दो सौ साल तक चले अंग्रेज़ी राज के ज़ुल्मों को आज वह भूल चुकी थी और बखान करने लगी सरकार की मेहरबानियों की –

“जब घर का अकेला कमाऊ आदमी जेल में तो सरकार उसके बीवी-बच्चों का पूरा ध्यान रखती है। दोनों लड़कियों का भत्ता तो मुझे पहले ही मिलता था, अब तो उनका दूध भी मुझे मुफ़्त मिलता है। सरकार की तरफ़ से बच्चों के नए कपड़ों के लिए भी पैसे मिलते हैं। क्योंकि मेरी अपनी कोई आमदनी नहीं है, मुझे अलग से अपना भत्ता मिलता है। मैं भी कोई कम नहीं। मैंने चार कमरे किराए पर चढ़ा रखे हैं। किराएदारों को अपने कमरों को ताला लगाने की मनाही है ताकि अगर कभी सरकारी चेकिंग हो भी जाये तो मैं पकड़ी न जाऊं।”

रीमा के मुंह से निकल गया, “अगर आपकी किरायेदार लड़कियां होतीं तो वह ज़्यादा अच्छा न होता?” “नहीं। एक तो लड़कियों के अपने पर्दे होते हैं। वो हमेशा अपने कमरे बंद रखना चाहतीं और ताले ज़रूर लगातीं। दूसरे, उनके यहां रहने से भंवरों का मंडराना शुरू हो जाता।”

रीमा शरारतन मुस्कराई और सोचने लगी – क्या अंदाज़ हैं भंवरों से बचने के ॰ ॰ ॰ उन्हीं के बीच रहने लगो। बदनामी होती है तो हो।”

शमीम ने यह भी बताया कि सरकार की तरफ़ से एक मेम उसे अंग्रेज़ी सिखाने घर आती है। पति से मिलने जेल जाने और वापस लाने के लिए सरकारी गाड़ी आती है। मतलब यह कि इस देश में जेल हो जाना सज़ा नहीं, एक उपलब्धि है!

अमीन की रिहाई को अब छ: ही महीने रह गए हैं। शमीम उसे मिलने जेल पहुंची हुई है। आज अमीन बहुत ख़ुश है। उसकी आंखों की चमक और होंठों की मुस्कान बहुत कुछ कह रहे हैं। अपने बीवी-बच्चों को देखकर तो वह और भी खिल उठा – “एक ख़ुशख़बरी है।” “हमारी मुलाक़ातों के दिन बढ़ गए हैं?” “नहीं।” “तुम्हें कुछ दिनों की पैरोल मिल रही है?” “नहीं, यह भी नहीं।” “तो फिर क्या?” “बढ़िया बर्ताव और अच्छे चाल-चलन की वजह से क़ैद में चार महीने की छूट मिल गयी है। अब मैं दो ही महीनों में घर आ जाऊंगा।” शमीम भी मुस्कराई, “यह तो बहुत बढ़िया ख़बर है।” दोनों बच्चियों ने भी ताली बजाई।

फिर थोड़ा रुककर, ज़रा हिचकिचाती हुई सी शमीम बोली, “एक ज़रा सी गड़बड़ हो गयी है।” “कैसी गड़बड?” “छोड़ो ॰ ॰ ॰ रहने दो।” “फिर भी?” “हमारे सामने वो जो बंगलादेशी रहता है ॰ ॰ ॰ परफुल, परफुल बिसवास। दिन में तो वह और कहीं काम करता है पर शाम को घर में ही सुनार का काम करता है। जो पैसा हमारे पास था वो तो सब तुम्हारे मुक़दमे में लग गया। घर के चार कमरे मैंने किराये पर दे रखे हैं। घर का ख़र्चा अलग रखकर पूरा किराया और सरकार की तरफ़ से जो पैसा मुझे मिलता है, उस सब के ज़ेवर बनवा लिए हैं।

“परफुल सोना तो बाज़ार के भाव ही देता है मगर ज़ेवरों की बनवाई तो बाज़ार से बहुत सस्ती होती है। फिर वह उनपर हॉल मार्क भी लगवा देता है। बस सोने की क़ीमत पेशगी दे दो, अपनी मज़दूरी तो वह किश्तों में भी ले लेता है।”

एक अद्भुत सी चमक ॰ ॰ ॰ एक अजीब सा नशा था शमीम की आंखों में जब वह चहकी, “हाय अल्लाह! कैसे कैसे तो बढ़िया डिजैन हैं उसके पास! एक किलो से ज़्यादा सोना तो अब मेरे पास भी हो गया है।”

अमीन के दिल पर क्या गुज़र रही थी, शमीम न समझ सकी जब उसने पूछा, “हां, तो बहुत बढ़िया डिज़ाइन हैं तुम्हारे इस परफुल के पास?” “शानदार!” “॰ ॰ ॰ और वह पैसे भी किश्तों में ले लेता है?” शमीम ने ‘हां’ में सिर हिला दिया। “फिर तो कोई मुश्किल ही नहीं। तुम बनवाती रहो अपने सोने के झुनझुने ॰ ॰ ॰ पहनो उन्हें, छनकाओ उन्हें! मेरा क्या, मैं तो मिट्टी हूं। मेरी जान की, मेरी ज़िंदगी की कीमत ही क्या है? मैं छ: महीने और सड़ लूंगा यहां जेल में।” “मैंने यह कब कहा?” “तुमने कहा नहीं पर तुम्हारे दिल की बात मैंने पढ़ ली है। दिल से तो तुम्हारी यही मर्ज़ी है। तुम यह भी भूल गयी कि तुम ही थी जो सालों से मेरे पीछे पड़ी हुई थी कि तुम्हारे तीन नालायक़ भाईयों को किसी तरह यहां लाकर बसा दूं। सीधी राह से उन्हें वीज़ा मिल नहीं रहा था। मैंने कोशिश की और पकड़ा गया। उन्हीं की वजह से मैं यह क़ैद भुगत रहा हूं।” “ख़ाक डालो इस बात पर! हम बहुत ख़ुश हैं कि तुम जल्दी घर लौट रहे हो। तुम भी ख़ुशी-ख़ुशी घर आओ।”

दो महीने बाद अमीन घर लौट आया। शमीम ऊपर से तो बहुत ख़ुश लगती है। ॰ ॰ ॰ लेकिन ‘ख़ाक डालो’ कह देने भर से अंदर की चिंगारी राख तो नहीं हो गयी। वह तो अब भी सुलग रही है ॰ ॰ ॰ ‘अगर अमीन सिर्फ़ चार महीने और ॰ ॰ ॰ कुल चार महीने ॰ ॰ ॰ और भी कितना सोना जमा हो सकता था!’
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