भारत की महान संस्कृति व परम्परा "असतो मा सद्गमय ,तमसो मा ज्योतिर्गमय ,तथा मृत्योर्मा अमृतं गम्य" की है इन तीनो सूत्रों में भारतीय संस्कृति का पूरा दर्शन समाया हुआ है |सत्य की प्रतिष्ठा जीवन का आधार रहा है |सत्य के लिए यहाँ इतिहास में सर्वस्व होम करने की अनेकों घटनाये मिलती हैं |यही हमारा इतिहास बोध है |राजाओं का वंश क्रम हमारा इतिहास बोध नही है |अपितु ऋषियों का त्याग राजाओं का वैराग्य जैसे राजा शिवी राजा हरिश्चन्द्र राजा विक्रमादित्य आदि के म्हण कार्य ही हमारे इतिहास का गौरव हैं |यह इतिहास बोध पीढ़ी डॉ पीढ़ी हमारे समाज में रचता बसता आ रहा है |इन्ही सूत्रों का विस्तार ही प्रकारांतर से और प्रतीकात्मक रूप से इन पर्वों व उत्सवों का स्वरूप है |इन्ही उत्सवों में ही एक महत्व पूर्ण उत्सव है - दीपोत्सव , जो तमस यानि हर प्रकार की की बुराइयों पर ज्ञान या प्रकाश का प्रसार है |प्रकाश रूप है अग्नि का या अग्नि का प्रतिफल है - प्रकाश |विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ वेदों में सब से पहले अग्नि के मंत्र मिलते हैं |बाद में ईश की प्रार्थना है अर्थात संसार के एक महत्व पूर्ण महत्त्व अग्नि की उपासना इस देश की महान परम्परा रही है |वह विभिन्न अवसरों पर भैगोलिक परिस्थितयों के अनुसार होती रही है |और सम्पूर्ण विश्व में इस का प्रसार व प्रचार भारत से हुआ है |वह चाहे पारसी धर्म हो या अन्य मत सभी में इस तत्व का महत्व भारत के कारण प्रतिपादित है |
बात सीधी २ यदि दीपोत्सव या दीपावली की करें तो यह भी अग्नि के उपासना का ही उत्सव है इसी लिए दीपोत्सव की विभिन्न प्रकार से मनाने की परम्परा रही है इस में कुछ अनुचित तथ्य भी पता नही कैसे सम्मलित होते चले गये यथा राम के अयोध्या लौटने पर दीपावली मनाई गई तब से परम्परा चली परन्तु काल गणना के अनुसार इस पर्व से पूर्व ही श्री राम के अयोध्या लौटने का समय है श्री राम कथा का मूल स्त्रोत वाल्मीकि रामायण इस बात की पुष्टि करती है |

मूल बात तो तमस से प्राणी के संघर्ष की है |उस पर विभिन्न माध्यमों से विजय प्राप्त करने की है जो वास्तव में दीपोत्सव है |तमस यानि हर प्रकार की बुरे हर प्रकार का पेदूष्ण हर प्रकार की युगानुरूप अनैतिकताएं ये सभी तमस हैं |इन सब के विरूद्ध संघर्ष के उपरांत की स्थिति ही वास्तविक दीपोत्सव है |

यह दीपोत्सव निरंतर प्रकाश की मांग करता है |हम ने माटी का दिया जलया ,छत की मुंडेर पर रखा पूजा में रखा ,हर स्थान पर रखा पर वह अँधेरे से कितनी देर तक संघर्ष कर पायेगा |दो घंटे चार घंटे परन्तु अँधेरा तो फिर भी बना रहा अँधेरे का अस्तित्व नही मिटा पाया और मिटेगा भी नही |प्रकाश के आने से कुछ समय के लिए `बेशक अँधेरा समाप्त होगया पर उस का अस्तित्व मिटता नही अस्तित्व बना रहता है अँधेरे अस्तित्व कभी समाप्त नही होता असल में तो यह संघर्ष ही दीपोत्सव है |इस तमस को समाप्त करना ही दीपावली है |

परन्तु यह माटी के बने घी तेल या विद्युत् प्रकाश अव्लियों से कैसे सम्भव है |उस के लिए सदाचरण जरूरी है |उल्लू की सवारी पर सवार लक्ष्मी विलास के साधन तो देंगी पर तमस नही मिटा पाएंगी |उस के लिए सुन्न महल में दियरा {दीपक }बालना जरूरी है तब झिलमिल २ झलकेगा नूर जो प्रकाश से भरपूर रहेगा |तब सन्न में नूर चमकेगा तो अनंत दीपोत्सव आ जायेगा |फिर माटी का दिया नही अंतर का दीवला प्रज्ज्वलित हो जाएगा |तब दीपोत्सव मनेगा ऐसे दीपोत्सव को आनन्दमय बनाएं आनन्द से दीपोत्सव मनाएं |

बात यहाँ समाप्त नही हुई है |लोक प्रसिद्ध कहावत है शास्त्रं सिद्धे लोक विरुद्धे न चरनियम व चर्नियम अर्थात जो लोक में प्रचलित है उस के विरुद्ध आचरण भी उचित नही है |सब ओर दीपों की जगमगाहट हो और आप केवल अपने अंदर की दीपावली ढूंढ रहें हों , बेशक ,परन्तु लोकाचार हेतु आप को भी चीन देश निर्मित लड़ियाँ लगनी पड़ेंगी ,दीपक जलाने ही पड़ेंगे परन्तु इस के पीछे भी महान भारतीय सांस्कृतिक वैज्ञानिक कारण हैं क्यों किकोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व हम दीप स्थापना अवश्य करते हैं कार्तिक मास की अमावश्या को व तदोपरांत तो आने वाला समय तमस भरा ही है तो यह सब उस आने वाले तमस से संघर्ष की तैयारी समझो |वर्षा ऋतू कालोपरांत प्रक्रति में उत्पन्न कित पतंगों को दूर करने के लिए रखे हुए वस्त्रादि में उत्पन्न बैक्टेरिया आदि से निपटने के लिए तथा आने वाले समय में सूर्य की कम ऊर्जा व इस कारण उत्पन्न कुछ नकारात्मक ऊर्जा से निपटने के लिए यानि सब ओर सकारात्मक ऊर्जा यानि पोसिटिव एनर्जी के प्रसार हेतु दीपक ही एक महत्व पूर्ण सस्ता व सुलभ साधन है |इस के लिए लक्ष्मी आने भने ही सही वहाँ तदीया जलते हैं परन्तु सोचो लक्ष्मी के आगे वो भीउन के वाहन उल्लू के समक्ष दीया आखिर सोचो जिस को रौशनी भाती नही उसी के समाने भी दिया जलाया जा रहा है पर जलाना है और यहाँ तक की लक्ष्मी जी से ले कर घूरे यानि कूढ़े के ढेर पर भी दिया रखते हैं या जहाँ भी कहीं अँधेरा कोना है हर उस कोने तक प्रकाश प्रकाश यानि सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार हम दीपोत्सव के भने करते हैं ताकि नकारात्मक ऊर्जा से बचा जा सके |

फिर दूसर कारण बौद्धों के साधना के प्र्भावोत्प्न्न तन्त्र साधना भि९ तमस कहती है यह सब उस के अनुकूल भी प्रतीत होता है |श्रीम बिज मन्तर की साधना का भी उपयुक्त समय है |परन्तु कुछ मिथक अज्ञानता के कारण बिना बात भी समाज में प्रचलित हो गये जैसे जुआ खेलना बताऊ कहाँ लिखा है यह सब |यह सब धर्म के नाम पर या परम्परा के नाम मिथ्या चार है |ऐसे ही लोगों का विश्वाश है रात को लक्ष्मी जी आएँगी वे रात को घर के दरवाजे खुले छोड़ कर सो गये लक्ष्मी जी तो आईं नही पर चोर घर में रखी जो थोड़ी बहुत लक्ष्मी थी उसे भी ले गये |

इस लिए जरूरी है उत्सव की भावना को समझना अपनी सीमाओं को जानते हुए ही उत्सव मनाना जिस से उस का भरपूर आनन्द प्राप्त हो सके

मैं इस दीपोत्सव के अवसर पर आप सब को हार्दिक मंगल कामनाएं प्रदान करता हूँ आप सब का मंगल हो!

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