"लघु पत्रिकाएं" शीर्षक पढ़ कर न्यूनता का भान होता है, किन्तु "लघु पत्रिकाएं" समुद्र से ज्यादा गहरी एवं वैचारिक दृश्टि से विस्तृत होती है। लघु पत्रिकाओं एवं व्यावसायिक पत्रिकाओं में भेद मेरी समझ से परे है। सत्तर-अस्सी के दषक में फिल्मों को कला एवं व्यावसायिक फिल्मों में विभाजित कर एक सीमा रेखा तय कर दी गयी एवं कलाकार स्वयम् द्वारा निर्धारित लक्ष्मण रेखा से परिसीमित होकर रह गये। समय बदला, गंगा में ढेरों पानी बह गया एवं कलाकारों ने कला एवं व्यावसायिक फिल्मों के भेद को मिटा दिया। पत्रिकाएं अच्छी और बुरी हो सकती है लेकिन लघु या दीर्घ नहीं, लधु पत्रिकाओं को मेने करीब से देखा-पढ़ा और समझा तब जाना कि लघु पत्रिकाओं का प्रसार कम होता एवं आमतोर पर ये पाठकों तक डाक के माध्यम से या सीधे संपादक के हाथों प्राप्त होती है, ये किताब की दुकानों पर उपलब्ध नहीं हो पाती। सिर्फ व्यावसायिक दृश्टि से पत्रिकाओं का दुकानों पर उपलब्ध ना हो पाना उसे "लघु" नहीं बना सकता। किताब की दुकानों तक पत्रिकाओं को पहुँचाना इतना कठिन भी नहीं कि उसे पूरा ना किया जा सके।

लघु पत्रिकाओं में जनपद की आत्मा निवास करती है, ये पत्रिकाएँ छोटे-छोटे षहरों एवं कसबों से निकलती हैं। ये लोगों के जीवन का वास्तविक दर्पण है।विज्ञान जगत में भी लधु (माईक्रो) एवं दीर्घ(मेगा) षब्द का प्रयोग किया जाता है, यहाँ माईक्रो स्टडी का अर्थ विस्तृत अध्यन से होता है, मुझे ऐंसा प्रतीत होता है लघु पत्रिकाए समाज का विस्तृत अध्ययन है। कुछ विचारकों ने लघु पत्रिकाओं को महत्वाकांक्षी संपादकों की घरेलू पत्रिका माना है, विचारों में विभिन्नता हो सकती है किन्तु गुणवŸाा को नकारना संभव नहीं है, गुणवŸाा पूर्ण आलेखों का संकलन, चयन एवं प्रकाषन वह भी अव्यवसायिक स्तर पर इन पत्रिकाओं को "दीर्घ पत्रिका" बना देता है।

किंतु लेखक एवं प्रकाषक अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते, अच्छा लिखना यदि लेखक की जिम्मेदारी है तो जन-जन तक उसे पहुँचाना भी लेखक एवं प्रकाषक की जिम्मेदारी होगी। लघु पत्रिकाओं को लोगों को सुलभ कराने की रणनीति बनाना अनिवार्य होगा अन्यथा ये पत्रिकाएँ वास्तव में इनके प्रकाषकों घरेलू पत्रिकाएं बन कर रह जायेंगी एवं कालांतर में इनका असतित्व खतरे में पड़ जायेगा। आज लघुपत्रिकाओं को प्रिंटिंग, प्रकाशन एवं वितरण की प्रथक-प्रथक जिम्मेदारियों को समझना होगा, पत्रिका प्रकाषन के लिए प्रथक7प्रथक जिम्मेदारियों का निर्धारण भी अनिवार्य है। किसी लेखक से लेखन, प्रकाषन एवं वितरण की जिम्मेदारी एक साथ निर्वहन करना संभव दिखाई नहीं देता। वितरण जन-जन तक पहुँचने का एक मात्र साधन है, अतः इसे नजरंदाज करना संभव नहीं है।

लघु पत्रिकाएं जब तक व्यावसायिक रूप ग्रहण नहीं करेगी तब तक लोगों को व्यावसायिक पत्रिकाओं के माध्यम से अधकचरा साहित्य ही पढ़ने को मिलेगा, आज आवष्यकता उस लक्ष्मण रेखा को मिटाने की है जो लघु पत्रिकाओं एवं व्यावसायिक पत्रिकाओं में दूरी तय करती है।

व्यावसायिक पत्रिकाओं ने भी स्तरीय सामग्रियों का प्रकाषन कर एवं साहित्यिक स्तम्भ षुरू कर लघु एवं व्यावसायिक पत्रिकाओं में भेद कम करने का प्रयास किया , वहीं अच्छे लेखकों को व्यावसायिक पत्रिकाओं में अपनी रचनाएं भेजना चाहिए। लधु पत्रिकाएं अपना संगठन बना अपनी समस्याओं को हल कर सकती है, वहीं आपसी ताल मेल से वितरण को भी विस्तार दिया जा सकता है।

2 comments:

  1. लघु पत्रिकाओ को स्तरीय रखते हुए इसे बढावा देना बहुत जरूरी है...

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  2. लघुपत्रिकाओ के बारे मे तो आपने याद ही दिला दी...इसे बढावा जरूर देना चाहिए।

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