काम अगर किसी को काम हमारा लगे शहद जैसा
वह कूबाची में देखे सचमुच वह कैसा।
- कविता कर्म पर आलेख
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मैं गुलाम हूँ अपनी इन कविताओं का 
श्रम करता रहता डटकर

हाड़ तोड़ता, कमर झुकाता
रात-दिवस, बहे पसीना माथे पर
फिर भी मेरी मालिक, मेरी कविताएँ मुझसे तुष्ट न हो पातीं,
बहुत रात को ,बहुत देर से वे मुझको जब मन आता, दौड़तीं।
मैं रिक्शा हूँ, मेरी दोनों बगलों से, बम भिड़ते है, टकराते,
जहाँ-तहाँ से मेरी त्वचा उधड़ जाती, वे धचके दे, धकियाते।
पहिए, जिनसे जुता हुआ चिर तन मेरा भारी ही होते जाते।

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वह घटना बहुत पहले घटी थी, मगर मुझे आज भी वह इतनी अच्छी तरह और इतनी साफ तौर पर याद है मानो कल ही घटी हो। मैं तो इस पर एक कविता भी रच चुका हूँ, मगर यहाँ दोहराए बिना नहीं रह सकता।

दाग़िस्तान के कवि हमज़ात का मै बेटा, जिसे उस वक़्त कोई नहीं जानता था, अपना गाँव छोड़कर पहले मख़चक़ला और फिर मास्को चला गया। साल बीते। मैने साहित्य-संस्थान की पढ़ाई समाप्त की, दस कविता-सग्रंह निकाल दिए। एक संकलन के लिए मुझे स्तालिन पुरस्कार भी मिल गया। मैंने शादी की। थोड़े में यह कि कवि रसूल हमज़ातोव बन गया। तभी मेरे दिल में फिर से अपने गाँव जाने का ख़्याल आया।

सारा-सारा दिन मैं उन जगहों पर घूमता रहता, जहाँ कभी बचपन और किशोरावस्था में भागा फिरता रहा था। मैं चट्टानों और गुफाओं को देखता, लोगों से बातें करता, निर्झरों के गीत सुनता, क्रब्रिस्तान में चुपचाप बैठा रहता फिर से खेतों में घूमने लगता। सं. रा. अमरीका में मैने फ़ोर्ड कारख़ाने में वह जगह देखी, जहाँ नई कारों की आजमाइश की जाती है। लेखन के लिए ऐसा परीक्षणस्थल वह होना चाहिए, जहाँ उसका जन्म हुआ है। औरतें गेहूँ के खेतो में निराई करके घर लौट रही थीं। वे थकी-हारी और धूल से लथपथ थीं, पैनी घास से उनके हाथों पर खरोंबे आ गई थीं, उनके पास गया।

मालूम नहीं कि या तो मुझे देखकर वे मेरी चर्चा करने लगी थीं या पहले से ही मेरा जिक्र छिड़ा हुआ था, मगर अचानक मैने मुट्ठीभर घास से माथे पर पसीना पोंछनेवाली नारी को यह कहते सुना- “अगर मुझसे कोई यह पूछता कि मैं सबसे अधिक क्या चाहती हूँ, तो मेरा जवाब होगा-रसूल हमज़ातोब का बेफ़िक्र दिल और उसके जैसी मज़े की जिन्दगी।“

“तुम क्या समझती हो कि रसूल के सीने में दिल की जगह पनीर का टुकड़ा है और वह कभी नहीं कसकता?” मेरी एक रिश्तेदार ने मेरा पक्ष लिया। पनीर का टुकड़ा तो चाहे न हो, मगर फिर भी उसे गेहूँ के खेत की निराई नहीं करनी पड़ती। सामूहिक काम की घंटी उसे नहीं बुलाती और दोपहर का खाना खाने की अनुमति नहीं देती। उसे यह मालूम नहीं कि श्रम-दिवस किसे कहते हैं, कैसे उसके लिए काम किया जाता है और क्या मुआवज़ा मिलता है। मज़े से अंट-शंट, अल्लम-गल्लम लिखता रहता है....उसे किस बात की चिंता हो सकती है ?’’

ओ भलीमानस ! कैसे मैं तुम्हे अपने काम, अपने अभिमान और कठिन श्रम के बारे में बताऊँ? उदास-उदास-सा मैं खेत से गाँव की ओर चला गया। गावँ के चौपाल मै पके बालों वाले बुजुर्ग ठंडे को गर्म रहे है। बड़े इतमीनान से वे आपस में ज़मीन, भावी फसल, पहाड़ों, चरागाहों, बीमारियों और जड़ी-बूटियाँ तथा हमारे गावँ के बीते दिनों की चर्चा कर रहे थे। मैं उनके पास गया, सलाम-दुआ की ओर ठड़े पत्थर पर बैठ गया। एक बुज़र्ग के पास ताज़ा अखबार था, जिसमें मेरी कविता छपी थीं। उन्ही के बारे में बातचीत होने लगी। घुडसवार को अपने घोड़े की तारीफ़ से खुशी होती है। मुझे भी उम्मीद थी कि मेरे गाँववासी अभी मेरी कविता की प्रशंसा करेंगे। बात यह है कि मास्को और मख़चकला में मै तारीफ़ सुनने का आदी -सा हो चला था। उस बुजुर्ग ने, कहा जिसके हाथ में अखबार था, कहा- ’’तुम्हारे पिता हमज़ात कविता रमते थे। तुम, हमज़ात के बेटे भी कविता लिखते हो। तुम काम कब करोगे? या तुम रोटी के टुकड़े से कुछ अधिक भारी चीज उठाए बिना ही अपनी सारी जिन्दगी बिता देने को इरादा रखते हो?’’

’’कविता ही तो मेरा काम है,’’ मैने यथाशत्ति धीरज से जवाब दिया। बातचीत के ऐसे रूख ले लेने पर मैं सकते में आ गया था।

’’अगर कविता लिखना ही काम है, तो निठल्लापन किसे कहते हैं? अगर गीत ही श्रम है, तो मौज और मनोंरजन क्या है?’’

’’गीत गानेवालों के लिए वह सचमुच मनोंरजन हैं, मगर जो उन्हे रचते हैं, उनके लिए वही काम है। नींद और आराम, साप्ताहिक और वार्षिक छुðियों के बिना काम। मेरे लिए काग़ज वही मानी रखता है, जो खेत तुम्हारे लिए। मेरे शब्द-मेरे दाने हैं। मेरी कविताएँ-मेरे अनाज की बालें है।’’

’’हाँ, ये सब तो बहुत सुन्दर शब्द हैं। खेत मेरे घर की छत पर नहीं आ जाता। मुझे खेत में काम करने जाना पड़ता है। मगर तुम तो कहीं क्यों न हो, चाहे बिस्तर में ही, गीत अपने आप ही तुम्हारे घर पर दस्तक देता है। इसका मतलब यह है कि हर गीत एक पर्व है। मगर हमार खेत तो रोज़मर्रा की आम ज़िन्दगी है।’’ हमारे गाँव के बुजुर्गों ने इस तरह या लगभग इस तरह अपने विचार प्रकट किए।

’’मगर गीत ही तो मेरी ज़िन्दगी है।’’

’’इसका यह मतलब है कि तुम्हारी जिन्दगी तो स्थाई पर्व है। बात यह है कि गीत तो पतिभा का मामला है। जिसके पास प्रतिभा है, उसके लिए अच्छा गीत रचना बहुत आसान काम है। मगर जिसके पास उसकी कमी है, उसे श्रम करना पड़ता है। हाँ, इस सम्बन्ध में श्रम सें बहुत लाभ नहीं होता।’’

’’नहीं, आपकी बात सही नहीं है। जिसके पास कम प्रतिभा होती है, वह कला को बच्चों का खेल समझता है। वही एक गीत से दूसरे गीत पर उड़ता फिरता है। जैसा कि कहा जाता है। घास काटता है। बड़ी प्रतिभा के साथ-साथ उसके प्रति ज़िम्मेदारी भी आती है और वास्ततिक प्रतिभावाला व्यक्ति अपनी कविताओं को बहुत कठिन और महत्वपुर्ण काम मानता है। गाई जानेवाली हर चीज़ गीत नहीं होती, सुनाई जानेवाली हर चीज़ कहानी नहीं होती, सुनाई जानेवाली हर चीज़ कहानी नहीं होती।’’

’’तो बताओ कि तुम कैसे काम करते हो और तुम्हारे धन्धे में क्या कठिनाइयाँ होती हैं?’’ मेरे इर्द-गिर्द बुज़ुर्ग हलबाहे बैठे थे। 

मैं उन्हें अपने काम के बारे में बताने लगा, मगर जल्दी ही यह समझ गया कि मेरे लिए बहुत ही साधारण बातों को, जिन्हे मै बहुत ही अच्छी तरह समझता हूँ, दुसरों को समझना मुश्किल है। मै अटकने और बेचैनी महसूस करने लगा और खामोश हो गया। बाज़ी बुज़ुर्गों के साथ रही थी। मैं उन्हें यह नहीं समझा पाया कि कविता पाया कि रचना क्यों मुश्किल है और कुल मिलाकर कविता रचना काम ही पाया है। तब से अब तक बहुत साल बीत चुके हैं। मगर आज भी अगर कोई मुझसे यह पूछता कि मेरा काम क्या है, कि वह क्यों मुश्किल कामों से कैसे भित्र है, तो शायद मैं साफ़ तौर पर यह न समझा पाता। मेरे काम की जगह कहाँ है, मेज़ पर, हाँ, काम की मेज पर। मगर सैर के वक़्त वह पहाड़ी पगडंडी पर भी होती है, जब मैं अपनी कविता की कल्पना करता हूँ और शब्द तथा ध्वनियाँ मेरे पास आती हैं, मगर मैं उन्हें ठुकराकर एक तरफ़ कर फेंक देता हूँ। मेरे काम की जगह रेलगाड़ी भी है, जिससे बैठकर मैं किसी दूसरे देश को जाता हूँ कारण की इस वक्त भी मेरे दिमाग़ में नई कविता के विचार आ सकते है। हवाई जहाज, ट्राम, लाल चौक, नदी-तट, जगंल और किसी मंत्री का स्वागत-कक्ष भी मेरे काम की जगह हो सकती है।

 पृथ्वी पर हर जगह ही मेरा कार्य-स्थल, मेरा खेत है, जहाँ में रहता और हल चलाता हूँ। किसी वक्त मैं काम करता हूँ ? सुबह को या शाम को ? कितना बडा़ है मेरा कार्य-दिवस ? आठ घटें का या छह घटें का या इससे अधिक के कार्य-दिवस के लिए संघर्ष क्यों नहीं करता ? बात यह है कि जब से मुझे होश है, मैं हमेशा ही काम रहा हूँ। खाने के वक्त और थिएटर में बैठक में और शिकार के समय, चाय पीते और मातम मनाते हुए भी, मोटर में और शादी के मौके पर भी। यहाँ तक कि नींद में कविता की पंक्तियाँ, उपमाएँ और विचार तथा कभी-कभी तो तो पूरी तैयार कविताएँ दिखाई देती हैं। इसका मतलब यह है कि नींद में भी मेरा कार्य-दिवस जारी रहता है। बहुत पहले ही हड़ताल कर देनी चाहिए थी मुझे।

मै कैसे काम करता हूँ ? इस सवाल का जवाब देना सबसे ज़्यादा मुश्किल है। कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि मेरा काम दूसरे सभी लोगों के काम के समान है। कभी-कभी मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि वह बिल्कुल अनूठा है और दुनिया के लोग जितने भी काम कर रहे है, उनमें से किसी के साथ भी इसकी तुलना नहीं की जा सकती।
कभी-कभी मैं महसूस करता हूँ कि इर्द-गिर्द सभी लोग काम करते है और मैं अकेला ही कुछ नहीं करता। कभी-कभी मुझे ऐसी अनुभूति होती है कि सिर्फ मैं ही काम करता हूँ और मेरी तुलना में बाकी सभी निठल्ले हैं।

पक्षियों के बड़े मजे हैं। वे जिन्दगीभर यही गीत गाते रहते है, जो उनके माँ-बाप उन्हें सिखा देते हैं। नदी भी मौज करती है। हज़ारों साल से वह एक ही धुन गाती चला जा रही है। मगर मुझे तो अपनी छोटी-सी ज़िदगी में इतने गीत रचने हैं, जो बहुत सालों तक काफ़ी हों। 

(अगले अंक मे जारी) 

4 comments:

  1. पृथ्वी पर हर जगह ही मेरा कार्य-स्थल, मेरा खेत है, जहाँ में रहता और हल चलाता हूँ। किसी वक्त मैं काम करता हूँ ? सुबह को या शाम को ? कितना बडा़ है मेरा कार्य-दिवस ? आठ घटें का या छह घटें का या इससे अधिक के कार्य-दिवस के लिए संघर्ष क्यों नहीं करता ? बात यह है कि जब से मुझे होश है, मैं हमेशा ही काम रहा हूँ। खाने के वक्त और थिएटर में बैठक में और शिकार के समय, चाय पीते और मातम मनाते हुए भी, मोटर में और शादी के मौके पर भी। यहाँ तक कि नींद में कविता की पंक्तियाँ, उपमाएँ और विचार तथा कभी-कभी तो तो पूरी तैयार कविताएँ दिखाई देती हैं। इसका मतलब यह है कि नींद में भी मेरा कार्य-दिवस जारी रहता है। बहुत पहले ही हड़ताल कर देनी चाहिए थी मुझे।
    nicely said.

    -Alok Kataria

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  2. बिलकुल अलग भाषा है और अलग कहन है

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  3. कभी कभी इस बात को मैंने भी महसूस किया है कि जिस काम या विचार को हम अत्यधिक महत्वपूर्ण समझते हैं, उसी के महत्व को दूसरों को समझाना बहुत मुश्किल बल्कि कभी कभी तो असंभव हो जाता है. लेखकीय कर्म के लिये भी यह बात पूरी तरह सत्य है.
    आगे पढ़ने को लालायित हूँ!

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