दूसरे लेखकों के बारे में कुछ कहना मुश्किल है लेकिन अपने बारे में कह सकता हूँ कि मैं केवल ‘स्वान्त: सुखाय’ नहीं लिखता। हालाँकि लिखते समय कोई विशेष पाठक या पाठक-वर्ग तो मेरे ज़हन में नहीं होता लेकिन कहीं अलक्षित रूप से
वह मेरी साइकी में उपस्थित ज़रूर रहता है।
और रचना के प्रकाश में आने के बाद भी वह अधिकतर अलक्षित ही रहता है। मैं इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि मेरे पाठक देश-विदेश में फैले हुए हैं। फ़िर कई बार मन आशंकित हो उठता है और यह सवाल मन में ज़रूर आता है कि आख़िर मेरे लिखे हुए कौन या कौन-कौन पढ़ रहा है, कोई पढ़ भी रहा है या मेरी रचना जंगल में नाचता मोर है। यह अलक्षित पाठक जब कभी सामने आता है तो रचना के नाच में कई-कई तरह के रंग भरने लगते हैं। फूलों या काँटों से भरी कई-कई वीथिकाएँ नज़र आने लगती हैं।

मैं कई विधाओं में लिखता हूँ। सभी विधाओं के पाठकों को एक तरह से देखना भी मुझे सही नहीं लगता। खासतौर पर नाटक के पाठक को। दृश्य विधा होने के नाते जब नाटक का मंचन होता है तो वही पाठक एक दर्शक के रूप में तब्दील हो जाता है और मैं यह भी मानता हूँ कि नाटक के शब्द की यात्रा मेरी कलम से शुरू होकर जब वह मंच पर अभिनय, संगीत, वेशभूषा आदि अनेक कलाओं के कंधों पर सवार होकर दृश्य-बिम्बों और मूर्त-प्रतीकों में उपस्थित होती है तो लिखे हुए शब्द का अर्थ-विस्तार होता है, एक ही शब्द की कई-कई ध्वनियाँ और नाट्य-रचना में मौजूद सवालों और मुद्दों का तेवर कुछ तीखा होकर दर्शक तक पहुँचता है। कई बार ऐसा भी देखने में आया है कि नाट्यालेख के मूल मंतव्य कमज़ोर प्रस्तुति के कारण संकट में आ जाते हैं।
नाटक के दर्शक/पाठक को लेकर मेरे विविध अनुभव हैं। इन्हीं अनुभवों को केन्द्रित करते हुए कुछ समय पहले मैंने एक लंबा आलेख लिखा था ‘शब्द को मंच पर उतरते हुए देखना’ जो पाण्डुलिपि के एक अंक के प्रकाशित हो चुका है। इसलिये इस बात की चर्चा यहाँ विस्तार से नहीं करूँगा। इन अनुभवों के लिए मेरा उक्त लेख देखा जा सकता है।

अपनी रचनाओं के पाठकों को दो हिस्सों में बाँट कर देखना चाहता हूँ। पहले वे पाठक जो आलोचक, लेखक, संपादक, अध्यापक या समीक्षक के रूप में साहित्य से निरंतर जुड़े रहते हैं। इन पाठकों के अपने-अपने आग्रह, पूर्वाग्रह, दुराग्रह, विचारधारात्मक प्रतिबद्धताएँ होती हैं और इन सबके चलते एक ही रचना पर विभिन्न आशयों वाली विपरीत टिप्पणियाँ सुनने-पढ़ने को मिलती हैं। और दूसरे वे पाठक जो साहित्य को कई तरह के मंतव्यों, खेमों, गुटबंदियों या विचारधाराओं की प्रतिबद्धता से परे हो कर खुले मन से पढ़ते हैं। इन दोनों तरह के पाठकों की प्रतिक्रियाएँ अपनी-अपनी तरह से महत्वपूर्ण होते हुए भी अलग-अलग होती हैं। निंदा, आलोचना या प्रशंसा दोनों ही उत्साह का सबब बनती हैं। दोनों ही तरह के पाठकों से मैं आशंकित रहता हूँ। पहले मैं अपने नाटकों के पाठकों को लेकर कुछ बातें करना चाहता हूँ। नाटक का मंचन होने की स्थिति में दर्शकों की प्रतिक्रिया तत्काल मिल जाती है और नाट्य-समीक्षकों की अख़बारों या पत्रिकाओं में छपी समीक्षा द्वारा।

यहाँ इस छोटे से आलेख में सभी तरह की पाठकीय प्रतिक्रियाओं को समेटना संभव नहीं होगा लेकिन कुछ दिलचस्प प्रतिक्रियाओं को आपके साथ साँझा करना चाहता हूँ। इनमें से भी सबसे दिलचस्प प्रतिक्रिया बिहार के एक पाठक की थी। मेरा नाटक ‘अन्वेषक’ पढ़ने के बाद उसने एक पत्र में लिखा कि नाटक पढ़ने के बाद उसे एहसास हुआ कि वास्तव में नाटक का मुख्य पात्र आर्यभट वही है। मैंने उस पत्र का कोई जवाब नहीं दिया। एक महीने बाद फ़िर उसका पत्र और फ़िर मेरी ओर से कोई जवाब ना मिलने पर हर हफ़्ते एक पत्र आने लगा कि वह दिल्ली आकर मुझसे मिलना चाहता है ताकि मैं वास्तविक आर्यभट को देख सकूँ। मैं मन ही मन उस पाठक की सादगी के बारे में सोच रहा था कि शायद आर्यभट के चरित्र और नाटक मे अंकित उसकी अन्वेषणाओं और संघर्षों का उसके दिमाग पर इतना असर हुआ है कि वह स्वयं को आर्यभट का अवतार समझने लगा है। मेरे उत्तर देने के बाद भी उसके पत्र कई महीनों तक आते रहे। अन्तत: मैंने उसे लिखा कि आप दिल्ली आकर मुझसे मिल लीजिए और आर्यभट के बारे में कुछ और बताइए ताकि इस नाटक के अगले संस्करण में उन बातों को शामिल कर सकूँ। उसके बाद भी एक पत्र तो मिला लेकिन वह आर्यभट कभी मुझे नहीं मिला। ऐसे ही बिहार के ही एक युवा ने लिखा कि वह भी आर्यभट की तरह से भी अंधविश्वासों और पाखंडों से लड़ता है लेकिन आसपास के लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं। अब वह उन सभी को ‘अन्वेषक’ पढ़ने की सलाह देता है। या फ़िर मुझे कालीकट में वे लड़के याद आते हैं जो आर्यभट से तादात्म्य कर चुके थे या तिरुवनंतपुरम में खड़ी वह लड़की जो अपनी तुलना ‘अन्वेषक’ की केतकी से कर रही थी। इसी तरह से ‘रंग-बसंती’ नाटक पढ़ने के बाद दो युवाओं ने यह कहा कि यह नाटक पढ़ने के बाद उनके मन में भगत सिंह की छवि साफ हुई है। वे भगत सिंह को अच्छी तरह से समझने लगे हैं।

एक रात मैं खाना खाने की तैयारी में था कि मुंबई से एक साहब का फ़ोन आया। वह एक नाट्य-निर्देशक भी थे और उन्हों ने संभवत: अभी ताज़ा-ताज़ा ‘कोई और रास्ता तथा अन्य लघु नाटक’ के नाटक पढ़े थे। “क्या मैं सहगल साहब से मुख़ातिब हूँ” उधर से एक ज़हीन आवाज़ सुनाई दी।

“जी, फ़रमाएँ” मैंने कहा।

“जनाब आप मेरे सामने होते तो मैं आपके हाथों को चूम लेता…मैंने आपके सारे लघु नाटक पढ़े हैं…नौ लघु नाटक और कोई और रास्ता भी…आपकी क़लम में बड़ी जान है”

मैं थोड़ा सा एम्बैरस हो रहा था। बात को जल्दी निपटाने की ग़रज़ से पूछा –“आप करते क्या हैं जनाब”

“मैं नाटक खेलता हूँ और मौका मिला तो आपके इसी नाटक पर एक दिन फ़िल्म भी बनाऊँगा”

“जी” मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अभिभूत हुए ऐसे व्यक्ति से क्या बात करूँ।

लगभग इन्हीं शब्दों को दोहराने वाली एक राय मुझे तब मिली जब मेरी कहानी ‘बाब’ समावर्तन में छपी – कि “आपकी कलम में जान है और बाब ने मुझे परेशान कर दिया है” इस आशय का फ़ोन रतलाम से आया था। इस तरह की प्रतिक्रियाएँ आम हैं। कई सामान्य पाठक इसी तरह से अपने मन की बात कह सकते हैं।

अपने उपन्यासों पर मिली पाठकीय प्रतिक्रियाओं में से मुझे दो प्रतिक्रियाओं ने अभिभूत किया। एक दिन हिन्दू कालिज में हरीश नवल ने एक कार्यक्रम में बुलाया था। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद कालिज के गलियारे से निकल रहा था तो मैंने महसूस किया कि कोई नौजवान एकदम मेरे पीछे-पीछे चल रहा है। वह इतना करीब था कि मुझे उसकी आहट महसूस हुई और मैंने आदतन पलट कर देखा। “सर मैंने ‘अनहद नाद’ पढ़ा है”। सुनकर मेरी चाल थोड़ी धीमी हो गई। मैं एक प्रश्नवाचक खामोशी के साथ आगे बढ़ रहा था। उसी नौजवान ने फ़िर कहा- “सर ‘अनहद नाद’ ने मुझे बहुत शक्ति दी है”। मैं रुक गया और उस नौजवान को सिर से पाँव तक देखने लगा। मुझे समझ नहीं आ रहा थी कि मैं क्या कहूँ। फ़िर उसी लड़के ने कहा –“ सर मैं बहुत टूट चुका था…शायद घर से भाग जाता या आत्महत्या कर लेता, लेकिन शिवा के संघर्ष ने मुझे बहुत शक्ति दी है”। मैं उसे देख रहा था और मेरी आँखें नम हो रही थीं। मैं उसे कहता भी क्या। सिर्फ़ उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा –“मेरी नज़र में आत्महत्या कायरता है, मुश्किलें तो सबकी ज़िन्दगी में होती हैं…जीने का मज़ा उनसे लड़ने में है उनसे भागने में नहीं” मुझे नहीं पता कि आज वह नौजवान कहाँ होगा लेकिन मन में यह विश्वास ज़रूर है कि उसने फ़िर कभी आत्महत्या करने की बात सोची भी नहीं होगी।

इसी तरह से एक उत्साह-वर्द्धक प्रतिक्रिया ‘प्रियकांत’ पर मिली। उस दिन संयोग से रामजी यादव मेरे घर पर ही थे और हम दोनों साहित्यिक दुनिया की गप्प मारते हुए रस-रंजन कर रहे थे कि मोबाइल बजा। मैंने सुना। उधर से आवाज़ थी –“ मैं प्रताप सहगल जी से बात करना चाहता हूँ”। यह बताने पर कि मैं प्रताप सहगल ही बोल रहा हूँ, वे साहब बोले- “ सहगल जी, आपके प्रियकांत नावेल ने मेरी आँखें खोल दीं……लोग हज़ार-हज़ार पेज लिख कर अपनी बात प्रभावशाली तरीके से नहीं कह पाते जो आपने अपने इस छोटे से नावेल में कह दी है…धर्म-गुरुओं पर इससे अच्छा भंडाफोड़ मैंने कहीं नहीं पढ़ा, अब मैं इनके चक्कर में आने वाला नहीं”

मैंने उनका धन्यवाद करते हुए पूछा कि आप क्या करते हैं और कहाँ रहते हैं। उनका जवाब था –“ रिटायर्ड हूँ, मैं उम्र में आपसे दो साल छोटा हूँ…समझिये हम एक ही उम्र के हैं…मेरा बेटा यहीं दिल्ली में पोस्टेड है…आजकल यहाँ हूँ” और फ़िर वह साहब ‘प्रियकांत’ की प्रशंसा करने लगे। उस समय शायद वह बहुत अभिभूत लग रहे थे। मैंने यह कह कर कि आप मेरी दूसरी रचनाएँ भी पढ़िए और बताइए कि वे आपको कैसी लगीं, फ़ोन काट दिया।

समकालीन भारतीय साहित्य में मेरी एक कहानी ‘क्रास रोड’ छपने के बाद दो पत्र अलग-अलग दिशाओं से अलग-अलग पाठकों के मिले और उन दोनों ने कहानी में निहित आत्महत्या के दर्शन को मेरे जीवन में खोजने की कोशिश की। ‘वीणा’ और फ़िर बाद में ‘साहित्य-अमृत’ के कहानी अंक में प्रकाशित ‘अंडा’ कहानी पर विचलित करने वाली प्रतिक्रियाएँ मिलीं। मोबाइल और ई-मेल के ज़माने में पत्र लिखने का चलन कम हो गया है, लेकिन कुछ लोग अभी भी पत्र लिख कर अपनी राय देने में विश्वास करते हैं। इनमें से मैं तीन लोगों के नाम लेना चाहता हूँ। वे हैं विजयेन्द्र स्नातक, रामदरश मिश्र और कमलकिशोर गोयनका। यह तीनों लेखक/आलोचक/पाठक एक साथ हैं, इसलिए इनकी राय पर मैंने हमेशा महत्त्व दिया है।

कादंबिनी में मेरी प्रकाशित कहानी ‘चलो कहीं घूम लेते हैं’ पढ़ने के बाद एक प्रौढ़ व्यक्ति और एक युवती मेरे घर ही पहुँच गए। संयोग से मैं घर में था। शाम का वक़्त था। उस प्रौढ़ व्यक्ति का कहना था “आजकल बहुत सी कहानियाँ तो ऐसी लिखी जा रही हैं कि समझ में नहीं आती और ज़्यादातर कहानियों में गाँव की ज़िन्दगी झाँकती नज़र आती है। शहरी जीवन पर लोगों ने लिखना छोड़ दिया है क्या? मुझे तो आपकी यह कहानी बहुत पसंद आई। बिल्कुल शहर के जीवन से जुड़ी हुई और भाषा ऐसी कि सबकी समझ में आए” और फ़िर एक सवाल –“आपने शहरी जीवन पर और कहानियाँ भी लिखी हैं क्या…आज की शहरी प्राब्लम्स पर” वो युवती अपनी खामोशी से ही अपनी सहमति दर्ज कर रही थी। मैंने उन्हें अपनी कुछ कहानियों के नाम बताते हुए कहा कि ‘मैं शहर का आदमी हूँ, गाँव की ज़िन्दगी के अनुभव मेरे पास न के बराबर हैं, तब कैसे लिख सकता हूँ वह जो मैंने देखा नहीं, जो मेरे अनुभवों का हिस्सा नहीं”

जनसत्ता में प्रकाशित कहानी ‘वह आदमी’ पर एक पाठक ने बताया कि इस कहानी ने उसे अकेलेपन और एकांत का फ़र्क़ समझा दिया है। अनेक तरह की टिप्पणियाँ सुनने को मिलती हैं और हर पाठक अपने अनुभवों और अपनी समझ से बात करता है, लेकिन उनकी बात में मुझे खोट नज़र नहीं आती।

पहले भी मैंने कहा है कि मेरी रचनाओं के पाठक देश-विदेश में फैले हुए हैं, लेकिन सर्वाधिक पाठकीय प्रतिक्रियाएँ दिल्ली के बाद या तो बिहार से मिलती हैं या केरल से। इन दोनों प्रदेशों में कुछ खास है जो इन्हें हिन्दी और हिन्दी साहित्य के बारे में अन्य प्रदेशों से अलग करती है।

अंत में एक अजीबो-ग़रीब पाठक की बात करके मैं फ़िलहाल अपनी बात स्थगित करना चाहता हूँ। हुआ यूँ कि एक दोपहर कोई तीस-बत्तीस साल के एक लड़के ने घर की घंटी बजाई और शशि ने बिना यह जाने कि वह कौन है, दरवाज़ा खोल दिया। वह लड़का सीधे दनदनाते हुए हमारे ड्राइंग रूम में आ गया। मैं उस समय वहीं बैठा था। उस लड़के के हाथ में एक फ़ाइल थी। चेहरे पर थकान थी या हमें नज़र आ रही थी। शशि ने पानी पिलाया और उसने अपनी बात शुरू की –“सर मैं पंजाब से आया हूँ…मैं आपका एक पाठक हूँ” और उसके बाद उसने मेरी कई कविताओं और नाटकों के नाम गिनवा दिए और कुछ संदर्भ भी बताए। मैं आश्वस्त हो गया कि शशि ने बिना जान-पहचान वाले किसी व्यक्ति को दरवाज़ा खोल कर कोई खतरा मोल नहीं लिया। लगभग दस मिनिट तक मेरी रचनाओं पर वह बोलता रहा। मैंने उसका नाम, पता और चाय के लिए पूछा।

“नहीं सर, इस वक़्त मैं बहुत मुसीबत में हूँ और जल्दी में हूँ” कहते हुए उसने अपनी फ़ाइल में से कुछ मेडिकल पेपर्स निकाल-निकाल कर दिखाने शुरू कर दिये और कहना शुरू किया-“सर मेरी माँ लोहिया अस्पताल में भरती है और मेरे पास दवाओं के पैसे नहीं है” मैं जानता था कि दवा और इलाज के नाम पर दिल्ली में धोखा-धड़ी बहुत होती है लेकिन उस लड़के को देख कर यही लग रहा था कि वह एक जैनुइन केस है और सबसे बड़ी बात कि वह मेरा पाठक है। वह लगातार बोले जा रहा था –“सर, मैं दवाओं के लिए पैसे नहीं माँग रहा, आप मुझे सिर्फ़ दौ सौ तिहत्तर रूपए दे दीजिए, मेरे गाँव तक जाने का इतना ही किराया लगता है…लौटते ही आपके पैसे सबसे पहले लौटाऊँगा” अब वास्तविकता चाहे जो भी हो आखिर वह था तो मेरा पाठक! मैंने उसके हाथ में तीन सौ रूपए रखे और वह खुशी-खुशी चला गया। आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि वह लौटा कि नहीं लौटा? जवाब है नहीँ।

अपनी कविताओं के पाठकों की बात छूटी जा रही है। एक बार अहमदाबाद जाना हुआ। ललित शुक्ल साथ थे। वहाँ एक बंधु ने मेरी छोटी-छोटी कविताएँ मुझे सुना दीं। तभी मैंने ललित शुक्ल से पूछा भी था कि लोग कहते हैं आज की कविता ज़बान पर नहीं चढ़ती तो फ़िर यह क्या है? इसी तरह से एक ट्रेन में सफ़र करते हुए एक पाठक टकरा गया और उसने भी मेरी कई कविताओं के हवाले से दिलचस्प बातें बताईं और मेरी कई कविताएँ मुझे सुनाईं।

हिन्दी में आज अधिकतर लेखक लेखकों या आलोचकों/समीक्षकों द्वारा ही पढ़े जा रहे हैं और पाठक की चिन्ता लगभग छोड़ दी गई है। ऐसे माहौल में पाठक की उपस्थिति स्वयं पाठक ही रेखांकित कर रहा है। और इस माहौल में लेखक को भी यह तय करना है कि वह मात्र आलोचकों/समीक्षकों का लेखक होना चाहता है या वह अपना रिश्ता सीधे पाठक के साथ जोड़ना चाहता है। और ऐसे में उसे तुलसी, कबीर, नानक, मंटो, बच्चन, नीरज आदि अनेक उन कवियों/लेखकों को याद कर लेना चाहिए जिन्हें पाठक ने हमेशा ज़िन्दा रखा है। ज़ाहिर है कि मैं स्वयं को सीधे पाठक तक पहुँचने वाला लेखक मानता हूँ। 

5 comments:

  1. साहित्य शिल्पी मेरी सबसे प्रिय पत्रिका पिछले तीन सालों से है। आज का अंक अलग है तथा एसे स्तम्भों से भरा हुआ है जो अगर नीयमित चलाये गये तो इसकी हर रचना का प्रिंट ले कर रखना होगा। यह एक पाठक की टिप्पणी है जो सहगल जी की बात से सहमत है कि तुलसी, कबीर, नानक, मंटो, बच्चन, नीरज आदि अनेक उन कवियों/लेखकों को याद कर लेना चाहिए जिन्हें पाठक ने हमेशा ज़िन्दा रखा है।

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  2. अच्छा विचार प्रधान और शिक्षित करने वाला आलेख है , इससे न केवल प्रताप के पाठकों और उनके बारे में प्रताप की राय का पता चलता है साथ ही मेरे जैसे नौसिखिओं के यह सिखाता है की इस विषय पर यदि मुझे भविष्य में लेख लिखना हो तो कैसे लिखूं

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  3. Prem Janmejai ka aabhaari hoon ki unhone mere aalekh ko is yogya samjha. Veh svaym ek samarth rachnakaar hain. main bhala unhen kya sikha sakta hoon. Unki vinamrata ke aage natmastak hoon.

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  4. एक पाठक होने के नाते यह जानना अच्छा लगा कि आखिर एक लेखक अपने पाठक के विषय में क्या सोचता है.

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