'' बस, दो मिनट और लगेंगे भैन जी, तब तक आप ठंडा पियो। नहीं जी, तकल्लुफ की क्या बात है इसमें, ये तो हमारा फ़र्ज़ है! अच्छा, ठंडा नहीं तो चाय चलेगी ? अभी हाज़िर कर देते हैं! .....ओय मंगू, जरा भाप्पे के होटल से पैशलवाली चाय पकड़ ला! जी, ठीक फरमाया आपने, कोकाकोला बंद होने के बाद से ये जितने ठंडे निकले हैं, सब फ़िज़ूल! किसी का टेस्ट ही नहीं चढ़ता ज़बान पर ! क्या क्रेज़ था जी, उस चीज़ का भी, आधी दुनिया तबाह कर रखी थी! अपने जॉरज भाई को भी बस चढ़ गई सनक! बंद करवा के छोड़ी जी! ........बस , हो गया सिस्टर ! 


रामदीना, ज़रा जल्दी करवा दे भई, इनको देर हो रही है !.........आप कुछ महसूस न करें भैन जी! यह कैंची और कपड़े का मामला है। जरा सा हाथ कांपा या आंख फड़की, तो र्क्वार्टर आधा इंच का तो कटाई सिलाई में फर्क पड़ ही जाता है वैसे हमारे कारीगर पुराने हैं - अच्छी तनखा, मीठी ज़ुबान - ये दो ही नुस्खे हैं , फिर तो इनसे सिर के बल काम करवा लो, काम में नुक्स निकालने का मौका नहीं देते। ..... अब ये सौ-डेढ़ सौ ब्लाउज़ों में एकाध में तो कुछ उन्नीस बीस हो ही जाता है। होना उतना भी नहीं चाहिये वैसे।  आखिर हमें भी रहना है कनॉट प्लेस पर ! कम्पटीशन बड़ा सख़त है जी आजकल। हमसे टक्कर लेने के चक्कर में दूसरों ने रेट आधे कर दिये। ये और बात है कि हमें कोई फर्क नहीं पड़ा। हमारे ग्राहक कहीं नहीं जाते। बस, जी सब ऊपरवाले और आप जैसों की दुआ है .... वरना हम किस काबिल हैं .....कोई ग़लत कहा मैंने? 

'' लो जी , गरमागरम चाय आ गई ! इस साल दिल्ली में ठंड कड़ाके की पड़ी है। चलो, यह 'अंगूठा ऊपर' मैं ही पी लेता हूं। अब बताओ, ये थम्स अप भी कोई नाम हुआ भला ? ....... सौ की सीधी बात कही आपने सिस्टर, ठंड के दिनों में जो बात एक प्याली चाय में है, वह किसी कोल्ड ड्रिंक में कहां। ...... पहले मैं चाय ही ऑफर करता था सिस्टर, पर मैंने देखा - सर्दी हो या ओले पड़ते हों - लड़कियां कोल्ड ड्रिंक के अलावा नाम ही नहीं लेतीं किसी चीज़ का!...... आप चाय के लिये पूछ लो तो यूं नाक चढ़ जायेगी जैसे तौहीन हो गयी हो! बस, जी, फ़ैशन की मार है और क्या! ...... आपकी तो बात ही और है जी, क्या घर डेकोरेट किया है आपने, दरवाज़ा खुलते ही आपकी सादगी और सलीके की दाद देनी पड़ती है। एं जी? मैंने कब देखा आपका घर, .....आपको याद नहीं जी, आपकी सिस्टर-इन-लॉ की शादी में उनके कपड़ों का बंडल मैं खुद पहुंचाने गया था आपके घर! नहीं जी, अंदर नहीं गया, पर हम तो बाहर से ही भांप लेते हैं लिफाफे का मजमून! वो कोई शेर है ना ...... ख़त का मजमून ..... अब जो भी वो है ..... आप मेरी बात समझ गईं ना?    

'' ओए मंगू ....... कहां चला गया ....चल रामदीना, तू ही जरा गाड़ी में रखवा दे! ..... हां जी, आप देख लीजिये पहले - ट्रायल रूम ये रहा सामने! देर हो रही है? चलो घर जाके देख लेना। ठीक हो ही गया होगा। शिकायत का मौका नहीं देंगे आपको सिस्टर ! ये आपने कितने दिये? आपको याद नहीं हमने पहले ही कहा था कि ब्लाउज की सिलाई हमने बढ़ा दी है। स्लीवलेस और बांहोंवाले का सवाल नहीं है जी! आधे मीटर का ब्लाउज़ हो या सवा मीटर ..... मेहनत तो उतनी ही करनी पड़ती है बल्कि जितना छोटा ब्लाउज़ होता है, प्लीट्स डालने में उतना ज़्यादा ख्याल रखना पड़ता है। आप बेशक पूरे कनॉट प्लेस में पूछ आइये मैडम - साठ सेंटीमीटर में स्लीवलेस ब्लाउज़ बनाने वाला कोई दूसरा नहीं मिलेगा। हम तो मेहनत की कमाई में यकीन रखते हैं मैडम। यह क्या कि दो रुपये कम लिये और दस रुपये की लीर हड़प ली! दूसरे दर्ज़ियों की तरह हम यह कमीनापन नहीं करते! बिना पैसे लिये आपके तो कपड़े भी डिलिवर कर देते हैं जी, आप पहन कर देख लो, फिर देना। भरोसा तो करना ही पड़ता है जी अपने कस्टमर पर! अब वही तो अपना खुदा है! थैंक्यू मैडम! मुंबई में तो ब्लाउज़ की सिलाई पता है कितनी हो गई है पर हम जैसी फिटिंग कोई हमसे दूनी सिलाई लेकर भी कर दे तो कैलाश टेलर का नाम बदल देना! जी, छुट्टे नहीं मेरे पास। चलो, फिर एडजस्ट कर लेंगे। हम तो कहीं जाने वाले नहीं, फिर आना जी! 

'' ..........शुक्र है परमात्मा का ! जान बची !  ....... अरे अरे अरे .... आओ भाईसाब, बैठो। बहुत दिनों बाद दर्शन दिये? सब राजी खुशी है? अपना भी बस चल ही रहा है। दुआ है आपकी ! जरा एक मिनट, मैं पानी पी लूं। आप भी पियो जी। नहीं?.......... अभी अभी आपने एक मैडम को बाहर जाते देखा होगा। मुझसे कोई पूछे तो मैं यही कहूं कि किसी को पागल कुत्ते ने काटा हो, तो औरतों के कपड़ों का धंधा करे। सामनेवाले के मगज का तो मलीदा बनाके रख देती हैं। कोई गलत कहा मैंने? आपको तो पता ही होगा। आपके बड़े भाईसाब की तो चांदनी चौक में साड़ियों की दूकान है। उस दिन देखा नहीं था? एक मैडम पधारीं, सौ साड़ियां खुलवाई और मुंह तिरछा कर बिना खरीदे चल दीं। अंदर से दांत पीसने का मन होता है पर दांत निपोरकर हंसना पड़ जाता है - फिर आना जी! बता रहे थे आपके भाई साब कि अच्छा हुआ, नहीं लेकर गई। अगर कोई औरत तीन साड़ियों के बीच डांवाडोल हो रही हो तो यह पक्का समझ लो कि अगर उसने एक पसंद कर भी ली तो दूसरे तीसरे दिन, चेहरे पर शराफत का मुलम्मा चढ़ाये, आवाज़ में मिश्री घोले साड़ी बदलने ज़रूर आयेगी। बड़े धीरज और सबर (सब्र) की ज़रूरत है भाईसाब! औरतों के कपड़ों का, या कपड़ों की सिलाई का या ज्वेलरी का या कॉस्मेटिक्स का - गरज ये कि औरतों के इस्तेमाल की किसी चीज़ का धंधा करो, तो अकल और दिमाग़ - दोनों ताक पर रख दो! 

........ अब मैं आपको आज की बात बताऊं! अभी अभी जो मैडम नीले रंग की फिएट खुद ड्राइव करके ले गयीं ना, आठ ब्लाउज़ सीने के लिये दे गईं थीं। बोलीं - अर्जेन्ट हैं। नाप का ब्लाउज़ साथ लाना भूल गई़ थीं सो इस्माइल ने नाप ले लिया। अब कहती हैं कि सारे ब्लाउज़ आधा इंच ढीले हैं। अब उन्हें कैसे समझाऊं कि मैडम, उस दिन आपने नाप दिया था ''पीटर पैन'' पहनकर और आज आपने ब्रैंड चेंज कर लिया है तो ब्लाउज़ की फिटिंग में तो फर्क पड़ेगा ही। 

...... नहीं जी, मज़ाक नहीं, मगर औरतों के शरीर का कोई भरोसा नहीं - घड़ी में माशा, घड़ी में रत्ती! बित्ते भर का ब्लाउज़ और सौ नखरे! .....

ओए रामदीना, ट्रायल रूम में रूम फ्रेशनर स्प्रे कर दिया था ना? हां ...... , और कोई काम भूल जाये, ये ना भूलियो। इन मैडमों की नाक बड़ी तेज़ होती है! अपना लेडीज़ टेलरिंग तो इनके नाक के सहारे ही चलता है! क्यों भाईसाब ....... गलत कहा मैंने? .....

'' लो, व्वो तो मैं भूल ही गया। पिछले महीने आपकी भरजाई के बर्थ डे पर साड़ी ली थी आपके भ्राजी की दूकान से, उसके पैसे देने रह गये। नहीं जी, आपने क्यों मांगने थे। यही तो आपकी शराफत है। मेरा भी उस तरफ कोई काम नहीं पड़ा इसलिये बात दिमाग़ से उतर गई। मैं तो सबसे कहता हूं कि भई - कपड़ा, साड़ी कुछ भी लेना हो तो जान - पहचानवाली दूकान से लो। वापस करने - बदलने में थोड़ा लिहाज़ रहता है।  

अच्छा जी, तो कितने देने हैं आपको साड़ी के? चार सौ? लेकिन जी, वो तो कॉटन की साड़ी थी। आजकल तो सूती हैंडलूम के कपड़ों को आखर आई हुई है। कपड़ों की कीमत को तो आग लगी हुई है। आप कुछ तो रियायत करो जी। दूसरी जगहों में तो हम अड़कर भी कम करवा सकते थे पर यहां तो घर की बात है।

ये लो जी, मुझे तो याद ही नहीं रहा, सारा कैश तो मैं कल ही इकट्ठा करके ले गया था। परसों ज़रूर मैं आ जाऊंगा भुगतान करने के लिये। या आपकी भरजाई को भेज दूंगा। आप तो अपने भाई से बढ़कर हैं ...... 

'' बस जी, और क्या बताना है! हम तो जी लेडीज़ टेलरिंग खोलकर फंस गये। अच्छी भली दुकानदारी चलती थी। अब यह आपस की बात है - ब्याह शादी के सीज़न में अच्छा खासा पैसा बना लेते हैं - सिरफ कोट पतलून की सिलाई में। वो तो आपकी भरजाई मेरे पीछे लग गईं कि ये क्या बात हुई भला - अपनी टेलरिंग की शॉप है और उसे कपड़े बाहर से सिलवाने पड़ते हैं। बस जी, आपने औरतों की बात मान ली बिज़नेस में तो हो गई आपकी ऐसी की तैसी ...... लेकिन उस वक्त हमने भी सोचा कि अपना लगता क्या है - न हींग, न फिटकरी, मशीनें हैं ही अपने पास, क्यों ना 'दिहाड़ी' पर एक दर्ज़ी रख लें - एक ब्लाउज सीने के वो जितने लेगा, उससे चार गुने हमें बच जाएंगे।  

बस जी, इस मुनाफे के चक्कर में हम तो मारे गये। यह लेडीज़ टेलरिंग डिपार्टमेंट खोला तो शगल के लिये था। आते जाते खूबसूरत लड़कियां दिखेंगी, महीन आवाज़ें सुनने को मिलेंगी, चुस्त जिस्म देखकर हमारे कारीगरों का भी, वो क्या कहते हैं -एंटरटेनमेंट होगा, आंखें ठंडी होंगी, धंधे में रंगीनी आएगी .....पर यहां तो मुसीबत ही मोल ले ली ! एड्डा औक्खा काम्म होर कोई नई जी! 

''क्या पिओगे भाईसाब, चाय? माफ करना, बातों के चक्कर में चाय पूछना तो भूल ही गया। इस बार दिल्ली में सर्दी कड़ाके की पड़ी है वाकई! यह 'अगूंठा ऊपर' पीकर हमारी तो अंदर तक कुल्फियां जम गईं। पीनी पड़ गई जी। मंगवाई तो उन मैडम के लिये थी। बहुत तगड़ी पार्टी है। उनकी बहन की शादी में सबके सूट यहीं से सिले थे, साल भर का जुगाड़ हो गया था। फिर इतना लिहाज़ तो रखना ही पड़ता है। क्यों जी,ग़लत कहा हमने?
         ओए रामदीने, यह मंगू कहां मर गया? हत्तेरे की .... ठंड के दिनों में दस बार पिशाब करने के बहाने ही गायब होगा और क्या! अब मैं भी तो हूं ना! सुबह से हिला नहीं कुर्सी से। कहने को हम मालक हैं! बड़े नमकहराम हो गए हैं जी आजकल के नौकर! साले ....कामचोर!

जा, ओए रामदीन, तू ही पकड़ ला जरा पेशल चाय! दो कप! ज़्यादा दूध वाली! कहना, मैंने मंगाई है! श शाब्बाश, ये पैसे ले, दौड़ जा! 

उधर क्या देख रहे हो भाईसाब? अपना पुराना कारीगर है रामदीन तो! आपने पहले कभी देखा नहीं इसे! अच्छा, अच्छा, वो कोट? है न देखने लायक चीज़! आप क्या, दूकान पर हर आने जाने वाला इसके कोट को घूरता है! बेगानों से नहीं रहा जाता पूछे बग़ैर, फिर आप तो अपने हैं। बिल्कुल जी, हर कोई यही कहता है कि साले ने किसी ग्राहक का तो नहीं पहन रखा यह कोट!

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''इस कोट का किस्सा भी बड़ा मजेदार है जी! आप ज़रा इत्मीनान से बैठो। चा-शा पियो! मैं बताता हूं ......

''ओए इस्माइल, मिस्टर चोपड़ा एंड फैमिली के कपड़े बिल्कुल रेडी रखना!  शाम चार बजे आने वाले हैं! बस जी , यही तो हमारी सिफत है - वक्त की पाबंदी! चार बजे आने का समय दिया तो साढ़े तीन बजे कपड़े तैयार होकर मेरे काउंटर पर! ......इस्त्री हो गये हैं कि नहीं, इस्माइल?........ यह रामदीन का डिपार्टमेंट है! वैसे तो जी, वह हमारी दूकान का पीर-बावर्ची-भिश्ती सबकुछ है! सुबह दूकान खोलकर झाड़ू लगाने से लेकर रात को हमारे घर के बरतन मांजने तक, वो हमारी उंगली के इशारे पर रहता है! यह मंगू-शंगू तो साले सब ऐवेंई है। नमक हराम! रामदीन जैसा आदमी तो आज के ज़माने में मुश्किल से ही मिलता है!

'' हां जी, तो मैं आपको सुना रहा था किस्सा कोट का! हुआ ये कि एक दुबले पतले गुजराती साहब अमरीका से आये! शादी करवाने आये थे हिंदुस्तान! एक सूट सीने को दे गये! बड़ा नफ़ीस कपड़ा। मुलायम इतना कि हाथ ना ठहरे ! मेड इन डेनमार्क! सौ फीसदी इंपोर्टेड! बोले - अर्जेण्ट डिलीवरी चाहिये। हमने कहा - जी, डबल सिलाई लगेगी। मान गये जी! तीन दिन बाद उनकी शादी थी, सो दो दिन बाद ही सूट लेने आ गये। तैयार रखा था। उतारा हैंगर से कोट! एक जगह थोड़ी सलवट दिखी। मैंने रामदीन से कहा - बेटा, ज़रा ये ज़रा कपड़ा सीधा कर दे! इस्त्री गरम की उसने।  बस जी, इस्त्री को कोट पर रखने की देर थी कि बेड़ा ग़र्क! कोट का कपड़ा तो इस्त्री के लगते ही सिकुड़ गया। अजब डेनमार्की कपड़ा था साहब - ज़रा सी गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सका! एक सलवट निकालने के चक्कर में दस निशान पड़ गये। अब उस गुजराती साहब ने अपने कोट का यह हाल देखा तो उनका पारा सातवें आसमान पर, जैसे शादी तो उनकी उस कोट से ही होनी थी। 

''मैंने बथेरे (बहुतेरे) हाथ पैर जोड़े कि साहब इस्त्री वाले कारीगर से गलती हो गयी। हम सिलाई के आधे पैसे छोड़ देते हैं और उसी कपड़े का पैच लगा देते हैं! लेकिन जी, पैच कहां लगता! साले कपड़े का डिज़ाइन ही ऐसा कि अपना उस्ताद रफूगर भी हिम्मत हार गया - कैसा भी पैच लगा लो, पैबंद छिपाये न छिपे। और ऐसा पैबंद शादी वाले कोट पर लगाकर इंपोर्टेड दूल्हा घोड़ी पर कैसे चढ़े? अपनी शक्ल चाहे सिकुड़ी हुई थी पर कोट के कपड़े की सिकुड़न बर्दाश्त नहीं हुई। लगे गाली गलौज करने कि ऐसा कपड़ा तो यहां किसी कीमत पर नहीं मिलेगा। ज़बान पर तो आया कि भले आदमी, अमरीका से ही सिलवा लाना था, यहां तक उठाकर क्यों लाये ....? वही तो मैं कहूं, अमरीका में सिलाई बड़ी महंगी है - यहां से बीस गुनी। वो तो हमारे ही मुल्क में दर्जियों की कोई क़द्र नहीं जी! 

ख़ैर, मैंने उससे कहा कुछ नहीं। सोचा, ग़लती अपनी है, दो ऊंची बातें कह दीं, तो चार आदमियों में इश्तहार करता फिरेगा कि कैलाश टेलर की दूकान में मत घुसना, उसने मेरा सूट खराब कर दिया। दर्ज़ियों का तो धंधा आपको पता है, सिफ़ारिश से चलता है। एक कपड़ा ग़लत हुआ, दस ग्राहक टूट जाएंगे। सो मैंने कहा - चल भाई, पैंट उठा ले, कोट के पैसे हम दे देते हैं, पर वह तो अड़ गया - पूरे कपड़े के पैसे वापस करो। हमने कहा - भाईसाब, ऊंची आवाज़ में ना बोलो, इस तरह का यह पहला केस है, हमारी दूकान की रेपुटेशन खराब होती है! 

बस जी, सुनकर तो वह फिरंट हो गया। बात पुलिस तक पहुंच गई कि मेन रोड की कैलाश टेलर की दूकान में जोर जोर की झड़प हो रही है। हमने रो-पीट कर सात सौ रुपये उसके पलले पकड़ाए और उसकी पैंट उसके हाथ थमायी। साथ में इतने लंबे हाथ जोड़े कि माफ करना ब्रदर, ग़लती हो गई। और क्या हो सकता था भला?

''अब जी, वह साला अमरीका रिटर्न्ड तो सात सौ रुपये लेकर चलता हुआ पर हमारी तो नींद हराम हो गई। सात सौ का कोट हमारे खीस पड़ गया। गरीब आदमी हैं जी, सात सौ की रकम कोई छोटी नहीं होती। ऐसा लगे जैसे बीच बाज़ार किसी ने जेब काट ली हो। इस रामदीन की ओर देखूं तो मेरा खून गरम हो कि इज़्ज़त की इज़्ज़त गयी और सात सौ की करारी चपत लगी सो अलग! और कोट ऐसा जी कि न मेरे काम का, न किसी और के! जैसा सींक- सलाई आदमी, वैसा कोट!  

बस, जैसे बिजली की तरह यह बात ज़ेहन में आई कि यह कोट तो रामदीन को ही आ सकता है। वैसा ही दुबला-पतला, वैसी ही क़द-काठी! मैंने भी सोच लिया कि काक्का रामदीना, तूने कोट जलाया है तो मैं भी हलवाई का पुत्तर हूं ......! मेरा बाप अजमल खां रोड पर बरफी टुकड़े तोड़कर तोलता था सोने की तरह! हलवाई था न! बारह पन्द्रह कारीगर थे लेकिन मजाल किसी की कि एक समोसा या एक गुलाबजामुन उनकी आंख बचाकर मुंह में डाल ले .... वो तो हमारा ही जी नहीं लगा उस धंधे में - कौन भट्टी के आगे खड़े होकर समोसे कचौड़ियां तलवाये, कौन भिन भिन करती मक्खियों मच्छरों में खड़ा होकर गुलाब जामुन, बरफी, रसमलाई का हिसाब करे .....और फिर टेलरिंग का काम ज़रा साफ सुथरा लगा, सो जी हमने तो मिठाई का पुश्तैनी धंधा छोड़कर इधर का रुख कर लिया .....                                 

अब आपसे क्या छिपाना ....घर की बात है सो बता रहा हूं ! एक शादी का घर हाथ आ जाये तो आधे साल की कमाई एक मुश्त मिल जाती है, क्या बुरा है!  

''माफ करना, मैं भटक गया अपनी बात से। खैर जी, तो सात सौ की चपेड़ खाने वाला मैं भी नहीं था। दूसरे दिन सुबह दूकान का शटर खोला ही था कि रामदीन हाज़िर! साला वक्त का बड़ा पाबंद है। मैं चुप रहा। कुछ नहीं बोला। वो समझ रहा था कि मालक कल से नाराज़ हैं। चुप चाप मेरी ओर कनखियों से ताकता काम करता रहा।

फिर जब सब लोग आ गये, मुझे लगा, अब सही मौका है! गरीब को अकेले में डांट डपट दो, उस पर कोई असर नहीं होगा मगर उसके जातभाइयो के सामने उसे ज़लील कर दो तो वो पानी पानी हो जायेगा, मुंह ऊंचा नहीं करेगा। सो जी, मैं सबके सामने तवे की तरह गरम हो गया - रामदीने, तेरी जरा सी लापरवाही से मेरे सात सौ रुपये उड़ गये। कितनी बार तुझे समझाया है कि कोट पर रूमाल रख कर इस्त्री किया कर! इस्माइल इससे खार खाता है, कहने लगा - साहब, इसकी आयरन टेबल के सामने आपका काउंटर पड़ता है, बच्चू देखने लग गये होंगे कोई परी, बस, इस्त्री कोट पर धरी की धरी!  

 मैंने ज़रा सख्त आवाज़ में कहा - रामदीन, तू आज से अपना दूसरा बंदोबस्त कर ले, यहां अब मैं एक पल भी तुझे रहने नहीं दूंगा। अब जी, वह तो लगा रोने गिड़गिड़ाने, पैरों पर लोटने - इस शहर में तो जो हैं सो आप हैं माई बाप! और कौन अपना है! आप मेरी तनखा में से दस रुपये महीना काट लो!........तनखा में से काट लो - बस जी, मैंने पकड़ ली उसकी ज़बान! मैंने कहा - वाह दस रुपये महीने काटने लगा तो छह साल लग जाएंगे। मैंने दस साल टेलरिंग की शॉप चलाकर कोई घास नहीं छीली है। साफ कह दिया कि कोट तू ले ले, इन सर्दियों में पहन लेना और पचास रुपये महीना कटवाना है तो नौकरी कर वरना इसी वक्त रफा दफा हो जा! इतना सुनना था कि वो तो ज़मीन पर लोट गया - माई बाप, सौ रुपये में से पचास तो मेरे खाने पर खर्च हो जाता है, पचास घर भेजता हूं। घर पर औरत है, बूढ़े मां-बाप हैं। उनका क्या होगा! 

आखिर बड़ा रो-धो कर दस रुपये हफ्ता मतलब महीने में चालीस रुपये कटवाने पर राजी हुआ। मैंने उसे समझाया कि देख, तू तो तब भी रहा फायदे में ही, मुफ्त में तुझे कोट मिल गया। दो सौ रुपये तो इसकी सिलाई ही हो जाती है। ..... और इस सात सौ पर सूद कितना हो जाएगा! कम से कम पचास रुपये सालाना - वो भी मैं छोड़ रहा हूं। वरना गांव में तुम लोगों का क्या हाल होता है, मुझे सब पता है। गांव का साहूकार तो एक पैसा नहीं छोड़ता, चाहे घर-बार, खेत-खलिहान, बीवी-बच्चे सब बिक जायें। क्यों जी, ग़लत कहा मैंने? फिर दिल्ली में ठंड क्या कम पड़ती है! मैंने कहा उससे - हर साल तू ठिठुरते हुए ठंड काटता है, इस बार शान से काटना। अरे, ऐसा कोट तो तेरी क्या, मेरी सात पुश्तों में भी किसी ने पहनकर नहीं देखा! 

''नहीं जी, मार्च के पहले हफ्ते की बात है यह तो! सर्दियां खतम होने पर थीं। आठ महीने हो गये इसे तनखा कटवाते! बीच में एक बार फिर बिदक गया जी। बड़ी मुश्किल से रास्ते पर लाये। दो महीने पैसे कटवाये और लगा रोने कलपने - गांव से चिट्ठियां आ रही हैं, पैसा भेजो! मैंने कहा - ''देख, तू तो ऐसा कर, मां -बाप को तो पैसे भेज दिया कर पर अपनी औरत को यहां बुला ले, यहां घर पर काम करेगी, तू भी बाहर खाने की जगह उसके साथ घर पर ही खा लिया करना, रात को भंडारेवाली कोठरी में सो रहना! ये भी कोई ज़िन्दगी है भला - वो वहां ,तू यहां! ''..... बस जी , बात इसको जंच गई। बुलवा लिया इसने अपनी औरत को! ....  

 ''बस, जब से आयी है, आपकी भरजाई को तो इतना आराम हो गया है कि पूछो मत! इसकी औरत ने सारा घर संभाल लिया है। पंजाबी खाना बनाने में तो बिल्कुल एक्सपर्ट हो गई है। ............ एक दिन घर आ जाओ भाईसाब, फिर देखो! ऐसे छोले-भटूरे बनाती है कि उंगलियां चाटते रह जाओ! धेले की चीज़ इधर से उधर नहीं होने देती, इतनी भरोसेवाली है! सारा घर खुला छोड़ देते हैं उस पर! बच्चों को भी बड़े लाड़ से रखती है। ऊपर से पैसा धेला कुछ नहीं देना पड़ता। आजकल तो दिल्ली में ऐसी कामवाली माई किसी कीमत ना मिले। आप तो जानते हैं, कैसी किल्लत है भरोसे के बंदों की दिल्ली जैसे शहर में! क्यों जी, ग़लत कहा मैंने? बड़ा सुख है जी, महीने में एकाध दिन वो बीमार पड़ती है तो रामदीन कपड़े, बर्तन, झाड़-पोंछ सब कर देता है। बस, इनके खाने में कोई रोक-टोक नहीं हमारी। पेट भर के खाते हैं। अपने बाप की बात हमेशा याद रखता हूं कि इन लोगों की तनखा दस रुपये कम करनी हो तो दो रुपये का खाना खिला दो। भूखे पेट को भर दो, फिर तो ये आपके ताज़िन्दगी गुलाम हो जाएंगे। हलवाई था न मेरा बाप, कभी तबीयत होती तो खुद सारे कारीगरों को लाइन से खड़ा करके बचे हुए समोसे-रसगुल्ले बांट देता। ना बांटे तो अगले दिन खराब हो जायें। तो घूरे पे फेंकने से तो बेहतर है किसी के पेट में जायें। बस जी, नौकर - चाकर उसमें ही खुश!

पर वो ज़माना और था भाईसाब - वो मेरे बाप का ज़माना - लोगों के हाजमे दुरुस्त थे। ये रामदीन तो ज़्यादा खा भी नहीं सकता। शुरु से फाका झेलते झेलते अंतड़ियां ऐसी सूख गई हैं कि ज़्यादा खाना हजम ही नहीं होता इसे, उल्टियां करने लगता है। हम भी कहते हैं - रामदीना, लालच किस बात का? जितना हजम हो, उतना ही खाओ .. क्यों जी, ग़लत कहा मैंने? 

नहीं जी, पूरे पैसे अभी कहां। अभी तो मुश्किल से चार सौ कटवाये हैं। वो तो मैंने ही कहा - एतबार का आदमी है, पैसे आते रहेंगे। तू सूट पहन, मौज कर! अब कुछ तो लिहाज़ करना ही पड़ता है न जी, इन लोगों का .....

''हो-हो-हो! क्या लाख टके की बात कही है आपने भी! .........जवाब नहीं आपका भी भाईसाब ..... कि कोट तो बढ़िया है ..... लेकिन रामदीन की शकल ही कोट के साथ मैच नहीं करती, इसकी सूरत को रेनोवेट करना चाहिये। मगर भाईसाब, एक बात बता दूं आपको, यह मखौल रामदीन के साथ मत करना। आजकल हर कोई इससे मखौल करता है कि तेरी किस्मत अच्छी है वरना इतना महंगा कोट तुझे कहां पहनने को मिलना था! मखौल के जवाब में हंसने की जगह इसका चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है। एक बार तो लगा, जैसे कोट उतारकर फेंक ही देगा ..... मगर इसने सिर्फ़ घूर कर देखा और चुप हो गया! सात सौ बड़ी रकम होती है जी, और इन लोगों के लिये तो और भी .......  है कि नहीं? ....पर आपको सच बताऊं तो इसकी शकल को देखकर कभी कभी तो मुझे डर लगने लगता है। वैसे तो रामदीन मेरा पुराना आदमी है, मेरा क्या बिगाड़ सकता है भला! बहुत होगा तो घर जाकर अपनी औरत को आंखें दिखा लेगा ..... लेकिन किसी दिन किसी राह चलते ने कोट को लेकर ज़्यादा छेड़ दिया और इसने कोट सचमुच उतार फेंका तो बात आगे भी बढ़ सकती है। आखिर इन भुक्खड़ों की जात का भरोसा भी क्या है! इनकी कौन सी इज़्जत आबरू है ...... क्यों जी, ग़लत कहा मैंने?
          
नहीं - नहीं जी, ऐसा हुआ तो नहीं है भाईसाब, मगर मैं आपसे अपना वहम बयान कर रहा हूं। ..... वैसे जानता ये भी है कि पूरे दिल्ली शहर में, मुझ जैसा फर्राख दिल मालिक चिराग़ लेकर ढूंढने से नहीं मिलेगा -- दिल्ली जैसे महंगे शहर में दो बंदों को सर पर छत .... रहना-खाना-सोना ...सब फ्री ...... पर मैंने कहा न - इन भुक्खड़ों की जात का क्या भरोसा ..... इनकी कौन सी इज़्जत आबरू है ...... क्यों जी, ग़लत कहा मैंने? कही ना, सौ टक्के खरी बात ! ''

5 comments:

  1. वाह, मान गए सुधा जी.....
    मैंने इस कहानी को बहुत एंजॉय किया। समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूं। कुल मिलाकर एक ही सिंटिंग में धाराप्रवाह टेलर मास्टर की गाथा पढ़ ली, वही भी बिना अंगूठा ऊपर उठाए इस तल्ख़ गर्मी में।

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  2. अर्चना यादव31 मई 2012 को 6:51 pm

    सुधा जी ,क्या खूब मजेदार कहानी लिखी है आपने ,आपको बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूब सुधा जी ! औरते बेचारी तो बोलने के लिए यूं ही बदनाम है - यदि 'सात सौ के कोट' को कुछ पल के लिए परे सरका दें तो, आपकी यह कहानी सिद्ध करती है कि पुरुष अगर बोलने पे आए तो कहानी के टेलर मास्टर की तरह'टर्र टर्र' लगातार कितना बोल सकता है....! इतना की एक पूरी कहानी ही उसके संवाद से शुरू होकर और उसी के संवाद पे खत्म हो सकती है ! साथ ही नारी को उसकी मुखरता से काम्प्लेक्स भी हो सकता है, ईर्ष्या भी हो सकती है ! आपकी कहानी का मुख्य चरित्र 'टेलर मास्टर' एक ऐसा जीवंत अनोखा पात्र है, जो अपने रुचिकर संवादों और विशिष्ट विचित्रताओं से पाठक-मन को ऐसा पकडता है - बल्कि 'जकडता है' कि कहानी खत्म होने के बाद भी वह अपने लटके-झटको के साथ आसपास बोलता नज़र आता है ! मुझे तो कहानी के मूलाधार 'सात सौ का कोट' से अधिक 'सात सौ की चपत खाया टेलर मास्टर' कहानी का मुख्य विषय नज़र आया !
    खैर, कहानी बहुत ही रुचिकर और उत्कृष्ट बन पड़ी है ! वातावरण रच देने में, पात्र को अद्भुत ढंग से गढ़ देने में आपकी सानी नहीं !
    सादर,
    दीप्ति (पूना)

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुधा जी बहुत ही खूबसूरत कहानी. इसकी चर्चा सुनी थी...अद्भुत.

    बधाई.

    चन्देल

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साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
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