पाठक मेरे लेखन की शक्ति हैं। 
सृजनात्मेक लेखन अंत:स्फूशर्त अभिव्य क्ति है। इसमें सृजन श्रम के साथ शरीर का श्रम भी निहित होता है। एक ही रचना के कई बार तीन चार ड्राफ्ट भी बन जाते हैं। परंतु इसमें कोई भौतिक लाभ नहीं। रचनात्म क अभिव्येक्ति का दूसरा सिरा है सम्प्रेयषण। रचना की सार्थकता उसका सही पाठकों तक पहुंचना होता है।

आज के इस विसंगत समय में जब साहित्या के माफिया विचारधारा और वर्गवाद के अंधेरों में पुस्त कों पर निर्णय लेते हैं तो बहुत सी महत्ववपूर्ण रचनाएं हाशिये पर चली जाती हैं। मीडिया के इस विस्फोीटक समय में पाठक और श्रोता वही पढ़ते और सुनते हैं जो उन्हें  पढ़ाया और सुनाया जाता है। विज्ञापनवाद से कलाओं और साहित्ये के भी उत्पारद बनने का खतरा पैदा हो गया है।

पाठक ही लेखक की शक्ति होते हैं। जब कोई पाठक रचना पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया देता है तो एक सार्थकता का अहसास होता है। साहित्य  के सबसे ज्या दा पाठक बिहार के होते हैं। बिहार राज्यह की एक विडंबना है। एक ओर वहां पिछड़ापन है, वहीं सबसे अधिक प्रबुद्ध और तेजस्वी पाठक भी वहीं हैं। आइएएस की परीक्षा में उत्तीकर्ण होने वाले विद्यार्थियों की संख्‍या का 70 प्रतिशत बिहार से है। इसमें भी सुख्द स्थिति यह है कि वे सब  साहित्य  प्रेमी भी हैं। वे जब दिल्लीा कोचिंग के लिए आते हैं तो मुझसे मिलने भी आते हैं। कुछ छात्र उच्चज शिक्षा के लिए जेएनयू या दिल्ली  विश्व विद्यालय में प्रवेश के लिए आते हैं तो वे मिलने आते हैं।

दूसरी ओर मैं एक मीटिंग के लिए पटना गयी थी। मुझे एक चमत्काओर दिखाया गया। चाय के ढाबे पर मुझे एक चाय वाले से मिलवाया गया जो मेरे लेखन का फैन था। उसने मेरी बहुत सी किताबें पढ़ रखी थीं। मुझसे मिलना चाहता था। मुझे सामने देख वह नहीं, मैं कृतार्थ हुई थी। 

अभी हाल ही में मुख्य। न्या यिक मजिस्ट्रेीट वैशाली ने पाखी में मेरी कहानी पढ़ कर फोन किया। उन्हेंज मैंने अपना एक कहानी संग्रह भेजा जिसे पढ़ कर उन्होंने उस पर मुझे अपनी गंभीर प्रतिक्रिया दी। पाठक जब आपके पात्रों के साथ परसोनीफाई करते हैं तो उसका सुख अलग ही होता है। गांधी प्रतिष्ठाहन मुंबई की सुशीला गुप्ताी ने अपनी पत्रिका के संपादकीय में मेरी अपराजेय कहानी को लिया था। इस पर पाठकों की प्रतिक्रियाएं दी थीं। सुशीला गुप्ताल ने मुझे लेखक से मिलिये कार्यक्रम के लिए मुंबई बुलवाया। मैंने वहां जीवन की बहुत ही साधारण मनस्थितियों की कहानी नालायक पढ़ी। मेरे कहानी पढ़ने के बाद मुख्यण अति‍थि जो एक सम्माकनित चार्टर्डे एकांउटैंट थे, उठ कर मेरे पास आये थे। उनकी आंखें गीली थीं। वे बोले थे, यह कहानी मेरी कहानी है। मैं तुम्हें आशीर्वाद कैसे दूं। मेरे पास फूल भी नहीं हैं। उन्होंहने अपनी  जेब से दो  हजार रुपये निकाल कर मुझे दिये थे। मैं शर्म से गढ़ गयी थी। पर संस्थाेपक सुशीला गुप्ता  ने पैसे ले लिये थे। उन पैसों को मैं वहीं एक संस्था  को दे आयी थी। 

बाद में यह बात मैंने कन्हैसयालाल नंदन को बतायी तो उन्होंनने डांटा था। कहा था- आज से बीस पच्ी्न  स बरस पहले जब मैं कविता पढ़ कर मंच से नीचे आया तो एक बुजुर्ग व्य्क्ति ने मुझे रोक कर एक रुपये का सिक्का  दिया था। जिसे  मैंने आज तक संभाल कर रखा है। 

पाठकों के साथ हमारे अनुभव हमारे लेखन की शक्ति होते हैं और उसे सार्थकता भी देते हैं। 

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