[देस-परदेस] - हेनरिख सेन्केविच - विश्व कथाकार -पोलैंड  (1848-1916)

उपन्यासकार और लघु कथाकार हेनरिख सेन्केविच का जन्म एक कुलीन परिवार में पोलैंड में 'वोला ऑकरेजेस्का' नामक स्थान में हुआ था. पोलैंड उन दिनों रूसी आधिपत्य में था. आर्थिक परेशानियों के चलते उनका परिवार वारसा में रहने लगा. वहीं वारसा विश्वविद्यालय में सेन्केविच ने शिक्षा प्राप्त की. छात्र जीवन में ही वे अखबारों में  लिखने लगे थे. पैसे की तंगी के चलते हेनरिख को पढ़ाई बीच में छोड़ कर स्वतंत्र  पत्रकार के रूप में जीविका चलानी पड़ी. 1863 में पोलंड में राज्यक्रांति के दौरान उनका परिवार रूस चला गया.

हेनरिख सेन्केविच के मन मे दुनिया भर की यात्रा करने की तीव्र इच्छा थी इसलिए एक जगह पर टिकने की बजाय वे जिप्सी शैली का जीवन जीते, कमाते-खाते एक देश से दूसरे देश भटकते रहे. वे अफीका में रहे. अपने प्रसिद्ध उपन्यास "को वेडिस " को लिखने के  लिए वे इटली गये. "को वेडिस" उनका एक बहुचर्चित ऐतिहासिक उपन्यास है. इसमें पहली सदी के रोमन साम्राज्य में सम्राट नीरो के निरकुंश शासनकाल में ईसाइयों पर हुए उत्पीड़न की कथा है, लेकिन इसे प्रतीकात्मक रूप से आधुनिक युग में पोल जनता के दमन और उनके प्रतिराध की कथा के रूप में भी पढ़ा जा सकता है. "को वेडिस " की कथा जो मनुष्य की आस्था और विश्वास को रेखांकित करती है, आधुनिक युग की एक अत्यंत सफल रचना मानी जाती है. सेन्केविच की तुलना तोलस्ताय से की गयी है.

सेन्केविच ने वॉल्टर स्कॉट और एलेक्सजेंडर ड्यूमा के उपन्यासों से प्ररित होकर ऐतिहासिक उपन्यासों की एक त्रयी रची है. इनमें 'दि फायर एन्ड स्वार्ड ' (1882) में पोलैंड की 1647 से 1691 तक की घटनाओं का विशद और अलंकारपूर्ण वर्णन है. दूसरे उपन्यास "दि डिल्यूज" (1886) में 1652 से 1657 तक की ऐतिहासिक घटनाओं का समावेश है और तीसरे उपन्यास "पैन माइकल " ( 1888) में तुर्कों के आक्रमण का चित्रण किया गया है. इन सभी उपन्यासों में पोलैंड का जीवन, उनके संघर्ष, आशा, अभिलाषाआंट का ज्वलंत चित्रण है. सहज सरल शैली और संवेदना की गहराई सेन्केविच के उपन्यासों और लघु कथाओं का उल्लेखनीय गुण है. उनकी कहानियां उनके जन्म स्थान पोलैंड तथा सर्बिया, क्रोशिया जैसे मध्य पूर्वी यूरोप देशों में लंबे समय तक झेली गयी विदेशी दासता की यातनाओं को अभिव्यक्त करती हैं. कज्जाकों, स्वीडिश आक्रमणकारियों और तुर्कों के हमलों से पोलैंड की जो दशा हुई थी उसका भी उनके उपन्यासों में बखूबी वर्णन हुआ है. ऐतिहासिक उपन्यासों के बाद सेन्केविच समकालीन विषयों की ओर लौटे. 1891 में लिखे अपने उपन्यास 'विदाउट डोग्मा ' में अभिजात वर्ग के एक पतनशील चरित्र का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया गया है. ' चिल्डन ऑफ द सॉइल ' (1894) किसानों के जीवन पर आधरित उपन्यास है.

अपनी कथाकृतियों में सेन्केविच जिस कौशल से चरित्रों का निर्माण करते हैं वह पोलैंड के बाहर के पाठकों को भी आकृर्षित करता है. सहज और सरल शैली में छोटे-छोटे विचारशील भाव उनकी वर्णनात्मकता के अभिन्न अंग हैं जो पाठक पर जाने-अनजाने अप्रकट सा प्रभाव छोड़ते हैं. पश्चिमी यूरोप के साहित्यिक परिदृश्य में पोलैंड की ओर अन्य देशों के लोगों का ध्यान हेनरिख सेन्केविच की वजह से गया.

1905 में सेन्केविच को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला तो यूरोप के समालोचकों और रूसी साहित्यकारों को कुछ आश्चर्य हुआ पर उनकी रचनाएंं पढ़ने के बाद सभी शांत हो गये. उन्हें सर्वाधिक ख्याति अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ कृति "को वेडिस"( 1896) से ही मिली है. यह उपन्यास आधुनिक समय की युग प्रर्वतक रचनाओं में से माना जाता है. इसका दुनिया की 50 भाषाओं में अनुवाद हुआ है और यह उन शुरूआती उपन्यासों में से है जिन्हें फिल्माया गया है. इस उपन्यास पर फ्रेंच और इटली में भी फिल्में बनायी गयीं.

"लेट अस फालो हिम एन्ड अदर स्टारिज", "हेनिया", "फॉर डेली ब्रेड", "सीलेन्का", "सो रन्स द वर्ल्ड", "नाइट्स ऑफ दी क्रास", "लाइफ एंंड डेथ एंंड अदर स्टारिज्", "ऑन दि फील्ड ऑफ ग्लोरी", "इन डिसर्ट एंंड वाइडरनेस", "पिसमा", आदि हेनरिख सेन्केविच की अन्य महत्वपूर्ण कृतियां हैं.

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नन्हा संगीतकार - हेनरिख सेन्केविच

जब वह इस दुनिया में आया तो बेहद कमज़ोर और दुर्बल था.  पड़ोसी पालने के इर्द-गिर्द इकट्ठे हो गये. मां और बच्चे को देख आपस में अफसोस जाहिर करने लगे. उनमें लुहार की पत्नी सबसे तजुर्बेकार थी, सो अपने अंदाज़ में बीमार स्त्रा को दिलासा देने लगी - "तुम चुपचाप लेटी रहो, मै पवित्र मोमबत्ती जलाती हूं, तुम्हारे पास ज्यादा वक्त नहीं है, दूसरी दुनिया में जाने की तैयारी करो. बेहतर होगा गर कोई जल्दी से जाए और अंतिम क्रिया-कर्म के लिए पादरी को बुला लाए."

"बच्चे का भी पठरन नामकरण करना होगा," दूसरी एक स्त्रा बोली, "मेरे ख्याल से तो यह पादरी के आने तक भी नहीं बचेगा. बेहतर हो कि जल्दी नामकरण हो जाए वरना इसकी बेनाम आत्मा यहां-वहां भटकेगी."

यह बोलते-बोलते उसने पवित्र मोमबत्ती जलायी. शिशु को गोद में उठाया. उस पर पवित्र जल का छिड़काव करती रही, जब तक शिशु ने आंखे झपकनी शुरू नहीं कर दीं. साथ में पवित्र पाठ का जाप करती जा रही थी

"परम पूज्य पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से मैं तेरा नामकरण करती हूं. तेरा नाम होगा `जेन`, पि?र वह मृत्यु के वक्त की जानेवाली प्रार्थना को याद करते हुए जल्दी-जल्दी कुछ बुदबुदाने लगी :
"हे ईसाई आत्मा!  इस दुनिया से अब विदा ले और जहां से जन्म लिया है वहीं शरण ले, आमीन!"

पर इस ईसाई आत्मा का इस दुनिया से विदा लेने का कोई इरादा नहीं था. उलटे वह जोर-जोर से लातें चलाने लगा और उसने रोना शुरू कर दिया. बहरहाल, उसके रोने का स्वर इतना क्षीण और मंद था, जैसे बिल्ली का कोई बच्चा हौले-हौले मिमिया रहा हो.

पादरी को बुलाया गया था. उसने आकर पूजा-पाठ किया और चला गया. मरने की बजाए मां पूरी तरह भली-चंगी हो गयी. हप्ते भर में काम-काज में भी जुट गयी.

शिशु की सांसें नाजुक डोर से लटकी हुई थीं. लगता जैसे बड़ी मुश्किल से सांस ले पा रहा है, बेहद दुर्बल व कमजोर जो था. पर जब वह चार बरस का था तो एक दिन कुटिया की छत पर पपीहे ने तीन बार कुहू-कुहू की तान छेड़ी. पोलिश लोक विश्वास के अनुसार यह एक शुभ शकुन माना जाता है. उसके बाद शिशु की हालत सुधरने लगी. दिन बीतते गये और वह दस बरस का हो गया. पर हमेशा दुबला-पतला और नाजुक ही बना रहा. झुकी देह और पिचके गाल! उसके धूसर बाल हमेशा उसकी उजली चमकदार आंखो पर गिरते रहते. उन आंखो में सदैव एक ख्वाब अंगड़ाई लेता रहता. आंखें हमेशा दूर, बहुत दूर कहीं टिकी रहतीं मानो कुछ ऐसा देख रही हों जो दूसरों से अनदेखा है.

जाड़े के दिनों में वह सिगड़ी के पीछे दुबककर बैठ जाता और ठंड के मारे रोने लगता. अक्सर वह भूख से भी बिलखता, क्योंकि मां कई बार अल्मारी या डिब्बे में खाने के लिए कुछ नहीं रख पाती थी. गर्मियों में छोटे सपे?द झबले में यहां-वहां दौड-भाग लगाता रहता, जो रुमाल से उसकी कमर में बंधा रहता था. सिर पर पुआल की पुरानी टोपी रहती, जिसके सूराखों से उसके भूरे बाल बाहर झांकते रहते. उत्सुक निगाहें पक्षी की भांति यहां-वहां भटकती रहतीं. बेचारी मां क्या करती, मुश्किल से  दो जून की रोटी जुटा पाती थी. हालांकि जेन से उसे बेइंतहा प्यार था पर पिटाई भी खूब करती, अक्सर उसे `चेंजलिग` कहकर बुलाती. जब वह महज आठ बरस का था, तभी से उसने अपने बूते जीना और अपनी देखभाल खुद करना शुरू कर दिया था. कभी भेड़ें चराने ले जाता, कभी जब घर पर खाने के लिए कुछ नहीं होता तो मशरुम खोजने घने जंगल में घुस जाता. खुदा का शुक्र था कि ऐसी दिलेरी के वक्त कभी किसी भेड़िये ने उसे अपना शिकार नहीं बनाया. वह एहतियात बरतने वाले बच्चों में से नही था. देहाती बच्चों की तरह बातचीत के वक्त मुंह में अंगुली रख लेता. उसे देख पड़ोसी भविष्यवाणी करने से बाज नहीं आते कि यह बच्चा ज्यादा दिन जी नहीं पायेगा. अगर जीवित रहा भी तो मां को कभी सुख नहीं दे पाएगा क्योंकि उसका शरीर कभी इस लायक नहीं बन पाएगा कि कड़ी मेहनत कर सके.

उसमें एक अनोखी खूबी थी. कुदरत की जाने यह कैसी लीला थी कि उसे यह नियामत बक्शी थी. संगीत से उसे बेइंतहा मुहब्बत थी और यह मुहब्बत ही उसका जुनून थी. हर किस्म की आवाज में उसे संगीत सुनायी देता. हर आवाज वह डूबकर सुनता. जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया, लय और सुर में उसकी दिलचस्पी बढ़ती गयी. वह भेड़-बकरियां चराने जाता या साथियों के साथ जंगल में बेर चुनने, खाली हाथ ही घर लौटता और मां से तुतलाकर बोलता, "ओह माँ कैसा खूबसूरत संगीत था! कैसी मधुर तान थी - ला sss ला sss !"

"चल हट, बंदर कहीं का! अब मैं तेरा बाजा बजाऊंगी, न काम का न काज का," उसकी मां गुस्से से चिल्लाती और कलछी से उसकी पिटाई कर देती.

बेचारा नन्हा  सा बालक, चीखता और दोबारा कभी संगीत न सुनने का वादा करताः मगर उसका मन तो जंगल में ही बसता था. वह सोचता रहता कि वहां कितने मधुर स्वर हैं, जो गूंजते और बजते रहते हैं, पूरा जंगल गाता है और उसकी प्रतिध्वनि से जंगल गूंज उठता है. मेड़ें पर घास की पत्तियां गाती हैं, घर के पीछे बगिया में चिड़िया चहचहाती है. चेरी का वृक्ष सरसराता और कंपकंपाता है. शाम ढलते ही उसे हर तरह की आवाजें सुनायी देतीं. देहात मे सुनायी देने वाले एक से एक स्वर उसके ज़ेहन में बजने लगते. लगता जैसे समूचे गांव में मधुर स्वर लहरी गूंज उठी है. उसके संगी-साथी आश्चर्य जताते क्योंकि उन्हे तो ऐसा कोई भी स्वर सुनायी नहीं देता था. काम के वक्त जब वह खेतों में सूखी घास साप? करने जाता तो हवा की सरसराहट में खो जाता. दूर खड़ा निरीक्षक जब उसे यू ही निठल्ला, बाल पीछे की ओर खिसकाये, हवा के संगीत में खोया हुआ देखता तो फुटपट्टी उठाकर दो-तीन सटाक से दे मारता जिससे इस स्वप्नदृष्टा को होश में लाया जा सके. पर सब बेकार| आखिरकार पड़ोसियों ने उसका नाम ही रख दिया संगीतकार जेन्को.

रात में जब मेंढ़क टर्राते, चरागाहों पर कुक्कुट चीत्कार करते, दलदल में तितलौवे धमाचौकड़ी मचाते और बाड़ें के पीछे मुर्गे बांग देते तो यह बालक सो नहीं पाता था, वह चरम आनंद की अनुभूति से भर उठता और इन स्वरों में खो जाता. उसे इन तमाम मिले-जुले स्वरों में एक अद्भूत सुरसंगति सुनायी देती, गनीमत थी कि मां उसे गिरजाघर नहीं ले जाती, क्योंकि वहां जब वाद्ययंत्र और घंटियें की झंकार गूंजती तो बालक की आंखे धुंधली और नम हो उठती और एक ऐसीचमक से दमकने लगतीं मानो वे किसी दूसरी ही दुनिया की रोशनी से प्रदीप्त हो उठी हों. रात के वक्त गांव में पहरा देने वाला चौकीदार कभी-कभार यूं ही खुद को जगाए रखने के लिए तारे गिनने लगता या बेहद धीमे-धीमे किसी कुत्ते से गपियाने लगता.  ऐसे वक्त कई बार उसने शराबखाने की धुंधली रोशनी में छोटे सफेद झबले में जेन्को को यहां-वहां दौड़ते देखा था.  हालांकि वह बालक कभी शराबखाने के भीतर नहीं जाता था, दीवार से सटकर बैठ जाता और भीतर का संगीत सुनने की कोशिश करता.  भीतर जब कई युगल संगीत की मधुर धुन पर थिरकते और झूमते तो पैरों की थाप और बालाओं के मस्ती भरे स्वर सुनायी देते.  हौले-हौले वायलिन बजता रहता.  पियानों का तेज स्वर गूंजता रहता, खिड़कियां रोशनी में नहा उठतीं, डांस फ्लोर का काठ चरमराने, गाने और झूमने लगता. जेन्को तल्लीन होकर यह सब सुनता.  ऐसी मधुर धुन वाले वायलिन को पाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था.  मगर अफसोस!  उसके नसीब में यह कहां?  वह इसे कैसे पा सकता था?  काश वे उसे एक बार वायलिन हाथ में लेने भर देते तो वह धन्य हो उठता..... पर नहीं! उसकी किस्मत में तो बस सुनना लिखा था. वह देर तक बुत बना सुनता रहता, जब तक दूर से अंधेरे को चीरती चौकीदार की आवाज न आ जाती-"चलो अब जाओ, सोने का वक्त हो गया है!"

तब वह नन्हा सा बालक नंगे पांव रात के अंधेरे में भागते हुए कुटिया की ओर जाता, पर वायलिन के स्वर देर तक उसका पीछा नहीं छोड़ते.

जब फसल कटने या शादी-ब्याह के मौकों पर बाजे व सारंगी बजतीं तो उसे खूब आनंद आता.  ऐसे वक्त वह सिगड़ी के पीछे दुबककर बैठ जाता और कई-कई दिनों तक एक लफ़्ज़ तक नहीं बोलता.  दमकती चमकदार आंखें सामने की ओर यूं टिकी रहतीं जैसे रात के वक्त बिल्ली की आंखें  दिखती हैं.

आखिरकार उसने काठ के फलक से अपने लिए एक सारंगी बना ही डाली.  घोड़े के बाल का तार के रूप में इस्तेमाल किया, पर उसके स्वर मयखाने में बजनेवाले वायलिन से मधुर नहीं थे. तारों से बेहद महीन स्वर निकलता मानो मक्खियां या कीड़े-मकोड़े भिनभिन कर रहे हों. फिर भी सुबह से देर रात तक वह उसे बजाता रहता.  हालांकि उसे अपनी इस लत के लिए बहुत मार खानी पड़ती थी पर यह सब छोड़ना उसके बस में नहीं था.  यह उसकी फितरत में था.

बालक दिनोंदिन कमजोर और दुर्बल होता जाता और बालों का गुच्छा पहले से घना!  आंखें हर वक्त चौकन्नी और आंसुओं से भरी रहतीं.  छाती और गाल घंसते जा रहे थे.  वह कभी भी आम बच्चों की तरह तंदुरूस्त नहीं हो पाया, उसका वही हाल था, जो उसकी बेचारी गरीब सारंगी का था, जो मुश्किल से ही बज पाती थी.  फसलों की कटाई के वक्त तो वह लगभग फाके ही करता था. क्योंकि ऐसे वक्त वह महज कच्चे शलजम खाकर जीवित रहता था. बस उसकी एक ही चाहत थी कि किसी तरह एक वायलिन उसे मिल जाए.  मगर अफसोस उसकी इस चाहत ने उस बदनसीब की जान ही ले ली.

ऊपर बंगले का मालिक बैरन और उसका पूरा परिवार अरसे से इटली में रह रहा था.  बंगले की देख- भाल करनेवाले वर्दीधारी सिपाही के पास एक वायलिन था जो कभी-कभार वह अपनी खूबसूरत प्रेमिका या फिर नौकरों को खुश करने के लिए बजाता था.  जेन्को अक्सर ऊंचे-ऊंचे पौधों के बीच नौकरों के हॉल के दरवाजे के पास दुबककर बैठा रहता.  उस पर एक ही धुन सवार रहती कि किसी तरह उस संगीत को सुन सके या फिर कम से कम वायलिन की एक झलक भर पा सके.  वायलिन हमेशा दरवाजे के सामने दीवार पर टंगा रहता था.  बालक हसरत भरी नजरों से उसे निहारता.  ऐसे वक्त उसकी समूची आत्मा आंखों में उतर आती.  यह उसके लिए एक ऐसी नायाब चीज़ थी, जिसे हासिल करने की हैसियत उसमें नहीं थी. हालांकि उसके लिए यह दुनिया की सबसे कीमती चीज थी. अचानक एक मूक चाहत ने उसे जकड़ लिया. काश!  किसी तरह एक बार वह उसे अपने हाथों से छूकर या बहुत नजदीक से जाकर देखे.  इस ख्याल मात्र से उसका दिल बल्लियों उछलने लगा.

एक शाम उसने देखा कि नौकरों के कमरे में कोई नहीं था.  पूरा परिवार यूं भी से इटली में ही रह रहा था. घर खाली था. वर्दीधारी सिपाही भी अपनी प्रेमिका के साथ कहीं घूमने निकल गया था. झाड़ियों के बीच छिपा जेन्को दरवाजे की झिर्री में से बहुत देर से अपने लक्ष्य पर नजरें टिकाए बैठा था.

चद्रमा अपने पूरे शबाब के साथ आसमान में दमक रहा था.  कमरे के भीतर भी उसकी किरणों से एक घेरा बन गया था जो सामने की दीवार पर पड़ रहा था.  फिर धीरे-धीरे रोशनी का यह घेरा वायलिन पर सिमट आया और वायलिन रोशनी में नहा उठा.  बालक ने देखा कि घने अंधेरे के बीच दूधिया रोशनी में वायलिन चमक रहा था.  इस कदर उज्ज्वल कि उसकी चकाचौंध से वह बौरा गया.  उसके तार, गर्दन, किनारे सब कुछ साफ दिखायी दे रहे थे.  खूंटियां जुगनु की मानिंद चमक रही थीं और वायलिन का गज़ भी एकदम जादू की छड़ी के माफिक था.

वाह! कितना खूबसूरत है, एकदम जादुई!  जेन्को ललचाई नज़रों से उसे ताकने लगा. वह लताओं के बीच दुबककर बैठा था. उसकी कोहनियां, कमजोर घुटनों पर टिकी हुई थीं.  अवाक्, निश्चल, उस एक चीज पर टकटकी बांधे!  वह मायूसी से भर उठा. अगले ही पल उत्कट आकांक्षा ने उसे घेर लिया. क्या यह कोई जादू है या कुछ और? वायलिन का जुनून उस पर मंडरा रहा था. क्षण भर के लिए वायलिन अंधेरे में डूब गया.  पर फिर दुगनी आभा से बह चमक उठा. जादू.... वाकई यह जादू ही था.  इसी बीच हवा सरसराने लगी, पेड़ डोलने लगे, लताएंं मंद-मंद फुसफुसाने लगीं और ये सभी मानो उस बालक को उकसाते हुए रहे थे- "चलो, जेन्को, आगे बढ़ो, वहां कोई भी नहीं है.... जाओ, जेन्को."

रात उजली और निर्मल थी.  बगीचे में तालाब के किनारे बुलबुल ने कुहुकना शुरू कर दिया.  कभी हौले-हौले तो कभी जोर से!  उसके गीत के बोल थे, "आगे बढ़ो, हिम्मत करो, जाकर छू लो प्यारे!" एक ईमानदार काला कौआ बालक के सिर पर मंडराने लगा और कांव-कांव कर बोला  "नहीं, जेन्को, नहीं." कौआ उड़ गया पर बुलबुल अभी भी गा रही थी.  लताएंं दुगने वेग से फुसफुसाने लगीं.  "जाओ, वहां कोई नहीं है.

वायलिन अभी भी चद्रमा की रोशनी के घेरे में टंगा हुआ था. अब वह घनी लताओं के पीछे से उठ खड़ा हुआ.  दहलीज पर उस नाजुक बालक की धौंकनी की तरह चल रही सांसों को साफ सुना जा सकता था.  क्षण भर बाद ही सफेद झबला ओझल हो चुका था.  केवल एक नन्हा नंगा पैर सीढ़ियों पर दिख रहा था.  दोस्त कौए ने एक बार फिर व्यर्थ ही चक्कर काटकर आगाह किया, "नहीं, नहीं" पर जेन्को भीतर घुस चुका था.  तालाब में मेंढ़क अचानक टर्राने लगे मानो किसी ने उन्हें डरा दिया हो.  फिर अचानक शांत हो गये.  बुलबुल ने गाना बंद कर दिया.  बेलों की फुसफुसाहट भी थम गयी.  इस बीच जेन्को अपने बेशकीमती लक्ष्य के और करीब पहुंच गया था पर भय ने उसे जकड़ लिया. घर के भीतर लताओं की छाया पड़ रही थी.  झुरमुट में वह एक जंगली जीव की भांति दिख रहा था.  वह तेज चल रहा था पर सांस धीमे-धीमे चल रही थी.

पूर्व से पश्चिम की ओर गर्मियों की कंपकपाती लपकती बिजली से पूरा कमरा क्षण भर के लिए रोशन हो उठा.  उसी एक पल में दोनों हाथों और पैरों पर झुका बेचारा जेन्को कांपता दिखायी दिया. वायलिन के पास सिर को आगे की ओर फैलाकर वह पालथी मारकर बैठा था.  फिर बिजली कड़कनी बंद हो गयी. चद्रमा को बादलों ने ढक लिया. चारों ओर निस्तब्धता पसर गयी. 

एक विराम के बाद अंधेरे में से हल्के क्रन्दन सी आवाज आयी मानो किसी ने अनजाने में तारों को छेड़ दिया हो.  उसी वक्त कमरे के कोने से कर्कश मगर उनींदी आवाज फूट पड़ी. 

"कौन है वहां?"

दीवार से माचिस की तीली रगड़ने की आवाज सुनायी दी.  एकाएक रोशनी की लहर फूट पड़ी और फिर हाय राम! गालियों, घूसों, मुक्कों की बरसात होने लगी.  बच्चा रोने, बिलखने, याचना करने लगा "ईश्वर के वास्ते!"

कुत्तों का भौंकना, रोशनी लेकर लोगों की भगदड़ शुरू हो गई.  पूरे घर में खलबली मच गयी.

दो दिन बाद अभागा जेन्को मेजिस्ट्रेट के सामने था, क्या चोरी के जुर्म में उस पर मुकदमा चलाया जाए? बेशक, न्यायाधीश और मकान मालिक ने कटघरे में खड़े अपराधी को देखा.  मुंह में ऊंगली डाले, फटी भयभीत आंखे, बेहद दुर्बल, छोटा, गंदा, चोटों से भरा वह बालक चुपचाप खड़ा था.  इस बात से पूरी तरह अनजान  कि क्यों और कैसे उसे यहां लाया गया है और वे लोग उसके साथ क्या करने वाले हैं?  न्यायाधीश सोच में पड़ गया कि इस कदर दुर्बल, महज दस वर्ष के इस अभागे को क्या दंड दिया जा सकता है, जो अपने पैरों पर ढंग से खड़ा भी नहीं हो पा रहा है?  क्या इसे कैदखाने भेजा जा सकता है? यूं भी बच्चों के साथ इतना बेरहम नहीं हुआ जा सकता.  क्या यह बेहतर नहीं होगा कि चौकीदार इसे ले जाकर बेंत से थोड़ी पिटाई कर दे जिससे उसे दोबारा चोरी न करने का सबक मिल जाये.  इस तरह मामला भी निपट जाएगा?

"हां, यहीं बढ़िया रहेगा!" चौकीदार को बुलवाया गया.

"इसे ले जाओ, चेतावनी के बतौर बेंत से पिटाई करो"

मोटी बुद्धिवाले चौकीदार ने अपना सिर हिलाया.  जेन्को को किसी बिल्ली के बच्चे की माफिक बगल में दुबकाकर अस्तबल में ल गया.

या तो उस बालक को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था अथवा वह इस कदर भयभीत था कि उसने मुंह नहीं खोला.  मामला चाहे जो हो वह एक शब्द तक नहीं बोला.  भयभीत नन्हें परिदें की भांति चारों ओर देखने लगा.  उसे तब जाकर अहसास हुआ जब चौकीदार ने पकड़कर फर्श पर लिटा दिया और  हाथ से पकड़कर बेंत से पीटने लगा. 

 बेचारा जेन्को चींख पड़ा "माँ SSSS!" हर वार के साथ उसकी आवाज क्षीण और कमजोर होती जाती थी.  कुछ देर बाद वह चुप हो गया, फिर उसने मां को पुकारना बंद कर दिया.

बेचारा टूटा हुआ वायलिन!

क्रूर चौकीदार ने बड़ी बेरहमी से बालक को पीटा था.  यूं भी अभागा नन्हा जेन्को हमेशा से ही दुबला-पतला और कमजोर था.  बड़ी मुश्किल से सांस ले पाता था.  आखिर उसकी मां आयी और बच्चे को अपने साथ ले गयी.  पर उसे गोद में उठाकर ले जाना पड़ा.  अगले रोज जेन्को उठ नहीं सका.  तीसरे रोज उसने आखिरी सांस ली.  घोड़े की जीन के कपड़े से ढके बिस्तर पर वह हमेशा की नींद में सो गया.  जब वह इस तरह मृत्यु के आगोश में था तो खिड़की के पास चेरी के वृक्ष पर अबाबील पक्षी चहकने लगे, सूरज की किरणें भीतर झांकने लगीं और बालक के लच्छेदार बाल और रक्तहीन सूखे चेहरे के चारों ओर ज्योति का एक पुंज दमकने लगा.  मानो किरणों ने इस नन्हें से बालक की आत्मा को स्वर्ग में ले जाने का मार्ग बना दिया था.

इस बदनसीब बालक को कम से कम मृत्यु की इस घड़ी में सूरज की रोशनी से भरा एक उज्ज्वल और चौड़ा मार्ग नसीब हुआ था वरना जीवन भर उसे कंटीले रास्ते पर ही चलना पडा था.  बेजान छाती अभी भी हल्के-हल्के हिल रही थी.  बालक अभी भी बाहरी दुनिया की आवाजों के प्रति सचेत था जो खिड़की के मार्फत भीतर आ रही थी.

शाम का वक्त था.  खेतिहर बालाएं काम से लौट रही थीं और गाते हुए जा रही थीं.  पास से ही नदी की कलकल सुनाई दे रही थी.  जेन्को ने आखिरी मर्तबा देहात के संगीत को सुना.  घोड़े की जीन के कपड़े पर उसके पास ही वह सारंगी भी रखी थी जो उसने काठ के टुकड़े से बनायी थी.  मरणासन्न बालक का चेहरा अचानक चमक उठा और उसके सफेद होंठ फुसफुसाए :

"मां!"

"क्या बात है मेरे लाडले?" मां ने पूछा.  उसकी आवाज सिसकियों में दब गयी.

"मां, भगवान मुझे स्वर्ग में तो असली वायलिन देगा"

"हां, मेरे बच्चे"  वह इससे ज्यादा कुछ नहीं बोल पायी.  भीतर जज्ब आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा था. वह केवल बुदबुदायी.

"ओ जीसस!" फिर मेज पर सिर रखकर फूट-फूटकर विलाप करने लगी.

सब खत्म हो चुका था.  जब उसने सिर उठाया तो देखा कि नन्हें संगीतकार की आंखें खुली पर निश्चल थीं, मुख पर शांति, गंभीरता और दृढ़निश्चय झलक रहा था.  सूरज डूब चुका था.  "नन्हे जेन्को, ईश्वर तुम्हें शांति दे!"

*****
अगले रोज बैरन और उसके परिवार वाले इटली से अपने बंगले में लौट आए.  घर के दूसरे सदस्यों के साथ बेटी और उसका मंगेतर भी था.

"इटली वाकई कितना दिलकश देश है", वह युवक बोला.

"हां, वहां के लोग भी शानदार हैं! कलाकारों का देश है! वाकई उनकी कला को देखने और उसे प्रोत्साहित करने में कितना आनंद मिलता है," नवयुवती ने जवाब दिया.

*****
जेन्को की कब्र पर कितने ही कीड़े-मकौड़े भिनभिना रहे थे! 


रूपांतर- अनुराधा महेंद्र
A-143, ट्विन टॉवर्स
प्रभादेवी, मुंबई – 400025

[चित्र साभार - readthehook.com दे} 

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साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
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