घर

खाली मकान को घर कहते हो
ना बच्चों की किलकारियाँ
न सास की दुलार भरी फटकार
न ननद से तकरार व मुनहार
न ससुर व जेठ के खखारने
का संकेत
न बहु के पायल की मीठी
झुन-झुन सी आवाज
न देवर भाभी का मीठा परिहास
न शाम को पड़ोसिनों की बैठक
न मोहल्ले के बच्चों की धूम-धड़ाका
यह सब ना होते हुए भी
मकान अब घर कहलाते है
फर्नीचर व सजावट से होता है
घर के व्यक्तियों का आँकलन
लोगों के रहने की जगह में
रहते हैं अब लग्जरी सामान
ऐसा ही होता है आज का मकान
नहीं-नहीं आज का घर....आज का घर

बसंत

आया बसंत - आया बसंत
रंग हजार लाया बसंत
कुछ फूलों में कुछ कलियों में
कुछ मधुबन की गलियों में
कुछ पलाष में
कुछ गुलमोहर की कलियों में
कुछ कोयल की कूक में
कुछ आमों के बौर में
कुछ सुंदर नये पत्तों में
कुछ अच्छे मौसम में
कुछ प्यार में
कुछ मुनहार में
प्रेम रस लाया बसंत
आया बसंत आया बसंत
रंग हजार लाया बसंत

सावधान

सावधान ओ जंगलवासी
बना रहे हैं तुम्हें जो साथी
बहला-फुसला तुम्हें  रहे हैं
सब्ज-बाग वो दिखा रहे हैं
जिनका खुद ईमान नहीं है
ईमान-धरम तुम्हें सिखा रहे हैं
डाल मुसीबत में वो तुमको
अपना धंधा चला रहे है
सांठ-गांठ है पहुंचे हुओं से
तुमको मोहरा बना रहे है
समझो अब तो समझ भी जाओ
इनके झांसे में न आओ
तुम स्वतंत्र हो स्वतंत्र रहोगे
अपने पर से जाल हटाओ
सावधान ओ जंगलवासी
इनके झांसे में न आओे

बदलाव

लाना चाहती हूं मैं बदलाव
गंदी राजनीति में
सड़े गले रीति-रिवाजों वें
संकीर्ण विचारों में
टूटते परिवारों में
लोगों की नैतिकता में
नौनिहालों की सोच में
किसानो के हल में
सेना के बल में
विदेश की नकल में
युवतियों की पोषाक में
युवकों के आचार में
व्याप्त भ्रश्टाचार में
वैष्विक संबंधों में
पर मैं अकेली
खदे दी जाति हूँ
हर देश हर शहर
गली कूचों से
फिर भी लगी हूँ
संघर्श में बदलाव के
....

5 comments:

  1. अच्छी रचनायें हैं कविता जी बहुत दिनो बाद नजर आयीं आप साहित्य शिल्पी पर कहाँ हैं?

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  2. सुन्दर कवितायेँ हैं बिलकुल आपकी तरह. - सुनीता कुमार

    उत्तर देंहटाएं
  3. aap sabhi ko meri kavitai achchhi lagi dhanyawad...aur achchha likhane ka praya karungi_
    Mrs Kavita Gaur , Jagadalpur, District Bastar ,Chhattisgarh.

    उत्तर देंहटाएं
  4. mere pass likhne ke liye shabd nahi hai. Bahut achcha.

    उत्तर देंहटाएं

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