क्रांतिकारी सोच वाले सआदत हसन मंटो की बेटी कहती हैं कि वो मज़हबी बिल्कुल नहीं थे, लेकिन कहानी शुरू करने से पहले उनका 786 लिखना दिलचस्प लगता था। लेकिन उनकी क्रांतिकारी सोच और अतिसंवेदनशील लेखनी से 'मंटो' के रूप में उन्हें पूरी दुनिया में शोहरत मिली।

पैदाइशी अफसानानिगार मंटो अगर आज जीवित होते तो उनकी उम्र 97 साल (ये बात 2009 में की गयी थी) होती। पेश है उनकी बड़ी बेटी निकहत पटेल से हुई बातचीत के अंशः

किस तरह की यादें जुड़ी हैं अब्बा जान मंटो की आपके साथ?

बेहद अच्छी यादें हैं उनकी, हालांकि उनके साथ हमारा बहुत कम वक़्त गुज़रा। लेकिन मुझे याद है, वो बहुत प्यार करने वाले खुशमिजा़ज इंसान थे। वो हमें ही नहीं हमारे रिश्तेदारों के बच्चों को भी लाड़-दुलार किया करते थे। धुंधली सी याद है मुझे, बावर्चीखाने में खड़े हुए अपनी पसंद की डिश या पकोड़े अक्सर बनाया करते थे। तो इस तरह उनके साथ जो भी वक्त गुजरा ज़हन में आज भी है।

उनकी ऐसी कोई बात जो आपको दिलचस्प लगती हो, जिसे आप भूल नही़ पाती हों?

मैंने उन्हें कभी नमाज़ पढते नहीं देखा था। क्योंकि वह उस मायने में मज़हबी बिल्कुल नहीं थे। लेकिन उनका हर कहानी या मज़मून शुरू करने से पहले सफेह पर 786 लिखना दिलचस्प लगता था।

मंटो साहब की कौन सी कहानियां आपको ज़्यादा अच्छी लगती हैं?

यूँ तो उनकी सभी कहानियां अच्छी हैं लेकिन खासतौर से 'काली शलवार', 'हादसे का खात्मा' और 'बू' कहानियां अच्छी लगती हैं। 'बू' मेरी पसंदीदा कहानी है।

मंटो का व्यक्तित्व और कहानियाँ दोनों ही विवादों में रहे हैं, लोगों की प्रतिक्रियाओं का आप पर कितना असर हुआ?

देखिए जिस वक़्त कहानी 'बू" पर मुकदमा चल रहा था उस वक्त मैं बहुत छोटी थी। रही बात लोगों की प्रतिक्रियाओं का हम पर असर होने की तो मैंने देखा कि उनके विरोधी कम और चाहने वाले ज़्यादा थे। इसलिए विरेधियों की बातों पर कभी गौ़र ही नहीं किया।

विवादों को आपकी अम्मी जान ने किस तरह लिया?

बहुत सहजता से। क्योंकि घर में मामू और फूफियों के अलावा पूरी साहित्यिक बिरादरी उनके साथ थी। इसलिए विरोध से वह कभी परेशान नहीं हुईं।

मंटो साहब के लेखन के बारे में वह क्या सोचती थीं?

अम्मी बताती थीं कि अब्बाजान अपनी हर कहानी और मजमून सबसे पहले उन्हें ही सुनाया करते थे। और बताते थे कि इस कहानी या मजमून का मक़सद क्या है।

अम्मी से किस तरह का रिश्ता था मंटो साहब का?

होश आने पर जो घर के लोगों से जाना, वह यह कि रिश्तेदारों से उनका रिश्ता मोहब्बत और दोस्ती का था। बस अम्मी से उनकी झड़प शराबनोशी को लेकर हुआ करती थी। और उस वक्त भी वह अपनी कमज़ोरी और गलतियों को मान लेते थे।

'मनो मिट्टी के नीचे दफन सआदत हसन मंटो आज भी यह सोचता है कि सबसे बड़ा अफसाना निगार वह है या ख़ुदा।' मंटो की इस इबारत में आपको आत्मविश्वास और चुनौती नज़र आती है या ग़ुरूर?

मुझे तो सौ फीसदी आत्मविश्वास और साथ में चुनौती भी नज़र आती है। गुरूर तो उनमें था ही नहीं।

अगर अब्बा जान मंटो से कोई एक बात कहनी हो, तो वो क्या होगी?

यही कि.. 'काश आपने शराबनोशी न की होती तो....... हमें आपके साथ ज़्यादा रहने का मौका मिला होता....." बस इतना ही।

3 comments:

  1. मंटो तो मजहबो के बीच की धुरी थे वे मजहबी हर्गिज नही थे

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  2. मंटो तो मजहबो के बीच की धुरी थे वे मजहबी हर्गिज नही थे

    - अनन्या

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  3. मंटो तो मजहबो के बीच की धुरी थे वे मजहबी हर्गिज नही थे

    - अनन्या

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