1990 में लिखी गयी और बाद के बरसों में कई बार संशोधित की गयी दलाई लामा (मूल नाम तेन्जि़न ग्यात्सो) की आत्मकथा इस मायने में एक पठनीय कृति है कि यह पुस्तक हमें एक ऐसे संत के जीवन में लगातार आते रहे संघर्षों की लोमहर्षक कहानियां बताती है जो वैसे तो अपने देश का सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु और उस तरह से देश का राजनैतिक सर्वेसर्वा भी है और इस तरह से उसे अपने खूबसूरत देश की साठ लाख जनता का भरपूर प्यार, असीम आदर, सम्मान और श्रद्धा मिलने चाहिये थे, लेकिन हुआ क्या? वह पिछले 53 बरस से अपने देश के एक लाख से भी अधिक शरणार्थियों के साथ दूसरे देश के रहमो-करम पर पड़ा हुआ है और अपने देश की तरफ हसरत भरी निगाहों से देख रहा है और उम्मीद कर रहा है कि वो सुबह कभी तो आयेगी जब वह अपने देश वापिस जा पायेगा और उसके विकास के लिए कुछ कर पायेगा।

1938 में तिब्बत के सभी पूर्ववर्ती आध्यात्मिक गुरुओं, दलाई लामाओं के अवतार के रूप में दो बरस के एक बच्चे की पहचान की जाती है। उसे उसके मा‍ता पिता से अलग कर दिया जाता है और उसे ल्हा्सा में धर्मगुरुओं के कड़े अनुशासन और धार्मिक परम्‍पराओं के पवित्र लेकिन लगभग एकांत वातावरण में दीक्षा दी जाती है। सात बरस की आयु में उसे देश का सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु बना दिया जाता है ओर पंद्रह बरस की आयु में तो वह वह अपने देश का सम्राट बना दिया जाता है।

तभी उस पर और उसके शांतिप्रिय देश पर संकट के बादल मंडराने शुरू हो जाते हैं। कम्यूनिस्ट चीन की दखलंदाजी, हमले, मासूम जनता पर अत्याचार के जो सिलसिले शुरू होते हैं, उनका अंत दलाई लामा के अपने देश को छोड़ कर भारत की शरण मांगने से होता है। लेकिन अंत कहां होता है अत्याचारों का। वे मूक दर्शक बने अपने देश की जनता को चीनियों की ज्यादतियों का शिकार होते हुऐ देखते रहते हैं और पूरी दुनिया से गुहार करते रहते हैं कि कोई तो उनके देश की हालत पर तरस खाये औार आततायी चीनियों के शिकंजे से उसे मुक्तु कराये।

ये आत्मकथा हमें दलाई लामा के जीवन में आये सभी उतार चढ़ावों से रू-ब-रू कराती है। वे इसे कोई बहुत सम्मानजनक स्थिति नहीं मानते कि वे अपने देश के एक लाख शरणार्थियों के साथ आधी सदी से अपने पड़ोसी देश के द्वारे पड़े हुए हैं और यहीं से अपनी सरकार चलाने को मजबूर हैं लेकिन वे भी क्या करें। चीन में कितनी सरकारें आयीं और गयीं, कितनी बार नीतियों में भारी उलट-फेर हुए लेकिन जो नहीं बदला वो है तिब्बत के प्रति दमनकारी रवैया। हर बार नये चीन नये आश्वासनों की पोटली खोलता है और दलाई लामा को वापिस तिब्बत में बुलाने के लिए नये चुग्गे डालता है, लेकिन होते वही ढाक के तीन पात हैं। बेशक पूरी दुनिया के दबाव में स्थिति कुछ बेहतर हुई होगी लेकिन इतनी बेहतर भी नहीं हुई कि दलाई लामा अपने देश, अपने बिछुड़े देश में सुरक्षित वापिस जाने के बारे में सोच सकें।

अपनी आत्मकथा में दलाई लामा अपने निजी सुखों दुखों की, अधूरे सपनों की बात तो करते ही हैं, वे एक पल के लिए भी अपने देश की बदहाल जनता के दुखों को भूल नहीं पाते। उनके मन से किसी के लिए, यहां तक कि चीनी शासन के लिए भी अपशब्द नहीं निकलते, वे अपने देश के सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु के रूप में अपने उत्त‍दायित्व को समझते हैं और सबका हौसला बनाये रखते हैं कि घबराओ नहीं, बेहतर दिन, बस अब आते ही होंगे।

बेहद आसान, रोचक और आत्मीय शैली में लिखी गयी ये आत्मकथा इस मायने में भी पठनीय है कि इसके जरिये हम एक साथ बौद्धधर्म, तिब्बतत और दलाई लामा के बारे में बेहतर तरीके से जान सकते हैं और उस धर्म गुरू के दर्द से परिचित हो सकते हैं जो 53 बरसों से चाह कर भी अपने देश वापिस नहीं जा पाया है।

संयोग से मेरे पास ब्रैड पिट की एक फिल्म है seven years in Tibet. इस खूबसूरत फिल्म में दलाई लामा के बचपन, उसके मासूम सपनों, बाहरी दुनिया से कुछ नया सीखने की चाह को बेहद खूबसूरती से दिखाया गया है।

2 comments:

  1. क्या इस किताब का हिन्दी में अनुवाद हुआ है? इसे पढने की इच्छा समीक्षा को पढ कर हो गयी है।

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