प्रसंग - 1
फ्रांज काफ्का बेहद गरीब थे। एक दिन उनकी मां ने उन्हें। एक शिलिंग का सिक्का दिया। उनके हाथ में आज तक इतनी बड़ी रकम कभी नहीं आयी थी। यह शिलिंग उनके लिए बहुत बड़ी चीज़ थी। ये रकम उन्होंने खुद कमायी थी, इसलिए इन पैसों का महत्व और भी बढ़ गया था।

अपने इन पैसों से कुछ खरीदने की नीयत से वे गली में बाहर निकले। उन्होंने वहां पर एक भिखारिन बुढि़या को देखा। वह इतनी ज्यादा गरीब लग रही थी कि उन्हें लगा, उन्हें इस दुनिया में और कुछ भी नहीं चाहिये, बस, अपना ये शिलिंग उस बुढि़या को दे दें। लेकिन जिन दिनों की ये बात है, उन दिनों किसी बुढि़या भिखारिन को या किसी नन्हें बच्चे के लिए एक शिलिंग का मतलब छोटा मोटा खज़ाना हाथ लग जाने की तरह था। वे उन दुआओं और आसीसों से भी डर रहे थे जो वह बुढि़या उन पर बरसाती और उन्हें इस बात का भी डर था कि वे सबके ध्यान का केन्द्र बन जायेंगे।

वे आगे गये और वह शिलिंग भुनवा लिया। जब वापिस आये तो उन्होंने चलते चलते भिखारिन को एक पैनी दे दी और लपकते हुए आगे निकल गये। इस बार वे विपरीत दिशा से आये और उसे दूसरी पैनी दी। उन्होंने यही क्रिया बार बार दोहरायी और ईमानदारी के साथ बारह की बारह पैनी उसे सौंप दीं। अपने लिए कुछ भी नहीं रखा। इसके बाद वे फूट फूट कर रोये।
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प्रसंग -2

शायद ये घटना चेखव के जीवन की है।

रात का वक्ता था। बेहद सर्दी पड़ रही थी। कोहरे में हाथ को हाथ नहीं सूझता था। तभी अंधेरे में एक भिखारी ने कुछ पाने की उम्मीद में उनकी तरफ हाथ बढ़ाया। भिखारी को देख कर उनका दिल पसीज गया और उसे कुछ देने की नीयत से चेखव ने अपनी जेबें टटोलनी शुरू कीं। सारी जेबें खंगाल मारी लेकिन एक फूटी कौड़ी भी नहीं निकली। भिखारी उनकी परेशानी देख रहा था। हताश हो कर चेखव ने भिखारी के दोनों हाथ थामें और कहा- मेरे भाई तुम्हें देने के लिए आज मेरे पास कुछ भी नहीं है।

भिखारी रो पड़ा और बोला- साब आपने तो मुझे इतना कुछ दे दिया। आपने मेरे हाथ थाम कर मुझे अपनी बराबरी पर ला खड़ा किया। अब मुझे और कुछ भी नहीं चाहिये। कुछ भी नहीं चाहिये।

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