जैन तीर्थंकर महावीर की माँ रानी त्रिशला ने गर्भावस्था के समय चौदह सपने देखें थे| कहते हैं कि हर तीर्थंकर के जन्म के समय उसकी माँ को चौदह सपने आते हैं, जिनमें उसे ऐरावत हाथी, चाँद, सूरज, ध्वजा, कलश, पद्म सरोवर, क्षीर समंदर, रत्न और धूएं रहित अग्नि दिखाई देती है|

यह जाना गया है कि जब बच्चा माँ के पेट में हो, तो माँ का गुण-धर्म बदल जाता है, जो बच्चा माँ के पेट में स्वप्न में रहेगा, उस बच्चे के कारण माँ के मन में अनेक स्वप्न पैदा होंगे| बुद्ध और महावीर विशेषकर चौदह तीर्थंकरों के संबंध में कथा है कि जब भी वे माँ के पेट में आए, तो माँ ने विशेष सपनें देखें| चौबीस तार्थंकर की माँ ने एक से ही सपने देखें, सैकड़ों हज़ारों साल के फासलें पर| तो जैनों ने उसका पूरा विज्ञान निर्मित किया| तब निश्चित हुआ कि इस तरह के सपने जब किसी माँ को आएं, तो उसके पेट से तीर्थंकर पैदा होगा| वे सपने निश्चित हो गए| बुद्धों के सपने भी तय है कि जब बुद्ध की चेतना का व्यक्ति कहीं पैदा होगा, तो उसके सपने क्या होंगे| वे सपने तभी पैदा हो सकते हैं, जब भीतर आया हुआ व्यक्ति स्वप्न की अवस्था में हो| यह तभी होता है जब पूर्व जन्म में भी उसकी मृत्यु स्वप्न की अवस्था में हुई हो......

जाने कितना कुछ हमारे सब के अचेतन में होता है, सोया हुआ मूर्च्छित पड़ा हुआ, जिसे साधना में उतरने वाले अपनी साधना से जगाते है|

कहते हैं जब गुरु नानक माँ तृप्ता की कोख में थे, तब माँ तृप्ता ने अपने गर्भ के नौ महीनों में नौ सपने देखें थे|

पहले सपने में माँ उस नदी पर जाती है, जहां चाँद तैरता हुआ दिखता है| माँ हथेलियों से चाँद लेकर नदी का पानी पीती है, और फिर उसे लगता है, वही चाँद का पानी उसकी कोख में उतर गया है.....

दूसरे सपने में माँ को लगता है, किसी ने उसकी कोख में एक नीड़ बना लिया है, और जब वह अंतर में देखती है, हैरान देखती रह जाती है- "क्या माँ को ईश्वर का दीदार कोख में से होता है?"

तीसरे सपने में माँ दूध बिलौने बैठती है, तो चाटी में से मक्खन-सा सूरज निकाल आता है|

चौथे सपने में माँ गेहूँ फटकती है, तो छाज सितारों से भर जाता है|
पाँचवे सपने में माँ एक ध्वनि सुनती है, जो जल-थल से उठ रही है, सोचती है, क्या यह ममता का गीत है या ईश्वर की काया का गीत है? और उसे एक हिरणी की तरह अपनी नाभि से कस्तूरी की-सी सुगंध आती है.....

छठे सपने में माँ जल का एक स्त्रोत देखती है, जहाँ एक हंस उड़ता हुआ आता है, और जागने पर उसे लगता है कि हंस का पंख उसकी कोख में हिलता है........

सातवें सपने में माँ की झोली में एक नारियल आ जाता है, और घर के दरवाजे पर लोग-ही-लोग दिखाई देते हैं, जो नारियल की गिरि का प्रसाद लेने आए हैं......

आठवें सपने में माँ को अंतर-दृष्टि मिलती है, और बच्चे को पहनाने के लिए वह जो किरनों का कपड़ा बुन रही है, उसे लगता है, यह तो सच-सी वस्तु है, चाँद सूरज की किरणें भी इसके लिए कोई ओढन नहीं बुन सकतीं.....

और नौवें सपने में माँ उसकी कोख के सामने माथा नव देती है कि जो भी कोख में है, वह न अपना है, ना पराया है, यह तो अजल का योगी है, जो घड़ी भर के लिए मेरी कोख की आग तापने आया है.......

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