कविता मेरे मन काआईना है ...उन अंधेरों में रौशनी की तरह है जब मैं निराश हो जाऊं ..या खोने लगूं अपने आप को ...इस महानगर में अपने आप को बचा लेने की कोशिश है मेरी कविता ...यही है वो शांत समंदर जहाँ बैठ  कर सुनती हूं मैं अपने मन की वो आवाजें जो अक्सर शोर में खो जाती हैं मुझसे।
...
 
शाम की निराशा

शाम सहमी सी उतर
रही है
उसके गहराते ही
उड़ जायेंगे परिंदे
अपने अपने घोसलों को
दिन ने भर दिए होंगे
उनके जरा से गोदाम
जिस पर करेंगे उसके
बच्चे गुजारा
या बड़े गोदामों में
सड़ गए होंगे दाने
या पानी ना भर गया हो
या फेंक ना दिए गए हों
रेल की पटरी पर
नहीं चुग पाई है
चिड़िया आज भी
रंग दानों का काला पड़ गया
और मर चुका है
आँख का पानी
शाम गुनाहगार सी
उतर रही है
रात घोसलों से
भूखे बच्चों की
आवाजें बहुत आती हैं

तरक्की .......

मुझे तरक्की का
प्रलोभन देकर
अपने गरिमामय ओहदे से
मुझे अपनी कुत्सित सोच
से
कितनी ईमानदारी से
वाकिफ कराते हो
मुझे तरक्की देने वाले
मेरी नजर में
तुम कितना नीचे गिर जाते हो.......
क्या अपनी नजर में भी?....

चंदामामा ....

आओगे तो आज भी
क्या लाओगे कुछ
मुनिया
के भूखे पेट क लिए
एक बार नहीं सोचा कि
वो मुंह में जाने वाला
कौर
जो रोज उसकी माँ
तुम्हारी ओर देख कर
मुनियाँ के मुंह में डालती है
कितना खाली होता है
लगातार तुम्हारी ओर देखते
देखते मुनिया सो जाती है मीठी नींद
आओ आना है तो चंदा मामा
पर माँ के विश्वास को
कब तक झूठा ठहराओगे
कभी तो लेके आ जाओ चांदी का कटोरा
जो दूध भात से भरा हो ......

सहभागी ......

मैं रही सहभागी
तुम्हारी जिंदगी के
सभी उतार चढ़ावों में
और तुम भागीदार बने
उन साजिशों के
जब मेरा ख़रीदा बेचा जाना
तय किया तुमने .....

सब अकेले हो गए बस .....

कुछ नहीं ठहरा
सिवा इस वक्त के
तू गया बातें गईं
वो गुनगुनाती धूप में
जब साथ हों कुछ देर को
कहते से हम
सुनते से तुम
वो रास्ते ही गुम हुए
ओस सी वो बूंद थी
जो झिलमिलाती थी कभी
मुझको मिली एक रात वो
बस आँख भर कहने लगी
अब ख्वाब ही आते नहीं
यूं गए तुम नींद मेरी ले गए
वक्त से कितनी शिकायत मैं करूं
सुबह सवेरे शाम, है ठहरा हुआ
ये गुजरते ही नहीं जब से गए तुम ..
मोड़ का वो पेड़ भी रूठा हुआ
मुड़ गए तुम जिस जगह से राह अपनी
पतझड़ों का दौर है अब
और मौसम भूल कर भी
छू नहीं पाए हैं इसको
यूं गए तुम
सब अकेले हो गए हैं .......

अब मुझे तय करने दो .....

तुमने हमेशा तय कीं
मेरी सीमाएं
मेरा होना नहीं होना भी

तुमने तय कीं
मेरे अंदर बाहर की
जिंदगी

मेरे तौर तरीके
बातचीत
मेरे दोस्त, मेरा परिवार भी
तय कर दिया तुमने

अब मुझे तय
करने दो

कि तुम्हें क्या

तय करना चाहिए, क्या नहीं ........

परिधि के बाहर ..
     
तुम्हारी बनाई इस खूबसूरत
बावड़ी में
मेरी दिशाओं के सभी
कोने
किनारों से टकरा कर
आहत हो रहे हैं

एक बार मैं समंदर छूना चाहती हूं ...

3 comments:

  1. sundar kavitan ban padi hai, bahut achha laga padhkar, visheshkar chanda mama, sub akele ho gaye bas, sham ki nirasha, ab mujhe tay karne do, paridhi ke bahar. en sabhi shandar kavitaon ke liye badhai ho.

    उत्तर देंहटाएं
  2. कवयित्री शैलजा पाठक जी की उपरोक्त लाघुकविताएं संजीदगी से ओतप्रोत है. 'परिधि के बाहर...' और 'अब मुझे तय करने दो' बहुत ही मर्म- स्पर्शी लगीं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहूत सुंदर कविताये

    उत्तर देंहटाएं

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