गली रामनाथ में वह एकलौता बरगद का पेड़ था जो एक वीरान पड़ी मस्ज़िद की दरारों से होकर निकल आया था ------ और एक छोटे से बालक अली की पतंग उसकी टहनियों में फँस गई थी। बालक नंगे पाँव, फटी कमीज़ पहने सँकरी-सी पथरीली गली में दौड़ रहा था जहाँ एक अहाते के पिछले हिस्से में उसका दादा धूप में गर्दन झुकाए दिवा स्वप्न देख रहा था।
दादाजी, मेरी पतंग गई --- बच्चा चिल्लाया।

बुड्ढा एक झटके के साथ सपने से जागा, सिर ऊपर उठाते हुए उसकी दाढ़ी नज़र आई जो अगर मेंहदी से न रंगी गई होती तो लाल के बजाय सफेद होती।

मांझा टूट गया क्या?-- अच्छा मांझा क्यों नहीं बांधा, उसने पूछा।

नहीं, दादा जी, पतंग बरगद के पेड़ में फँस गई है।

बुड्ढा ज़रा-सा हँसा -- बच्चे, पतंग कैसे उड़ाई जाती है, तुम्हें सीखना होगा। ज़रूर सिखाता तुम्हें अगर मैं शरीर-से थक न गया होता। कोई बात नहीं तुम्हें दूसरी पतंग देता हूँ।

उसने बाँस, कागज़ और कपड़े से एक नई पतंग बनाई थी जो धूप में सूखते हुए कड़क हो रही थी। एक पीली गुलाबी पतंग, हरी पूँछ के साथ। बुड्ढे ने पतंग अली को दी, बच्चे ने अपने तलवों पर उचक कर बुड्ढे के पोपले गालों को चूम लिया।

ये नहीं खोएगी, ये तो चिड़िया की तरह उड़ेगी, कहते हुए बच्चाी अपनी एड़ियों पर घूमा और अहाते से बाहर भाग गया।

बुड्ढा धूप में सपने देखता रहा। उसकी पतंगों की दुकान बन्द हो गई। खाली दुकान एक कबाड़ी को बेच दी पर पतंग वह अब भी बनाता है, अपने शौक़ के लिए, अपने पोते अली के लिए।

इन दिनों ज़्यादा लोग पतंग नहीं खरीदते। बड़े उन्हें हिकारत के साथ देखते हैं और छोटों को लगता है कि इससे तो सिनेमा देखने पर खर्च करना अच्छा है। और क्या कहें, शहर में पतंग उड़ाने के लिए खुले मैदान ही अब कहाँ बचे हैं। पुराने किले से नदी के किनारे तक का सारा खुला हरा-भरा मैदान शहर ही तो निगल गया है।

बुड्ढे को याद आया वह ज़माना जब भले लोग पतंग उड़ाते थे। आसमान में लचकती, झपटती, उलझती, फँसती पतंगों का युद्ध तब तह चलता था जब तक उन में से किसी एक का माँझा न कट गया होता। तब वह हारी हुई मगर मुक्त पतंग अनजाने नीले आकाश में कहीं ओझल हो जाती। ऐसी जगहों पर खूब शर्तें लगाई जातीं और रुपयों की अच्छी खासा अदला-बदली होती।
उस ज़माने में पतंगबाज़ी राजाओं का खेल था, बुड्ढे को याद आया कि नवाब स्वयं किस तरह से अपने परिजनों के साथ नदी की तरफ के इलाके में इस नेक खेल में भागीदारी करने के लिए आया करते थे। वह समय था जब वे खुशी से अपने खाली समय को कागज़ के एक नाचते हुए टुकड़े के साथ गुज़ारते थे। अब तो उम्मीदों के फेर में, हर आदमी जल्दी में है और पतंग तथा दिवास्वप्न जैसी नाज़ुक चीज़ों को पाँव तले रौंद दिया गया है।

वह, पतंगसाज़ महमूद अपनी जवानी के दिनों में सारे शहर में जाना जाता था। उस की कुछ खास पतंगें तो काफी मंहगी ---- तीन या चार रुपये में भी बिकीं। नवाब के आग्रह पर एक बार उसने एक बहुत खास तरह की पतंग बनाई थी, ऐसी कि किसी ने भी उस इलाके में वैसी पतंग तब तक नहीं देखी थी। इसके बाँस के फ्रेम में पुछ्ल्ले के पास छोटी-छोटी, बहुत हल्की कागज़ की चकलियाँ डाली गई थीं। हर चकली के अंत में उसने घास की टहनियों को इस तरह से लगाया था कि दोनों तरफ संतुलन बन जाए। आगे वाली चकली थोड़ी सी उभरी हुई थी और उस पर एक अद्भुत चेहरा पेंट किया गया था जिसकी दिनों आँखों में दर्पण लगे थे। ये चकलियाँ जिनका आकार आगे से पीछे की ओर घट रहा था दिखने में किसी लहर-सी थीं और इनकी वजह से ये पतंग किसी कुलबुलाते हुए साँप जैसी लगती थी। इस भारी भरकम पतंग को आसमान तक पहुँचाना आसान नहीं था और ऐसा केवल महमूद ही कर सकता था।

महमूद की बनाई इस दैत्याकार पतंग के चर्चे आम थे, लोग तो कहने लगे थे कि इस पतंग में कोई अलौकिक शक्ति है। इसकी पहली सार्वजनिक उड़ान देखने के लिए खुले में भारी भीड़ जमा थी और यहाँ तक कि वहाँ नवाब भी मौजूद थे।

पहली कोशिश में पतंग नहीं उड़ी। चकलियों से हल्की खड़-खड़ाहट की आवाज़ आई, सूरज दो दर्पणों में फँस कर रह गया था, लगा जैसे पतंग कोई सजीव वस्तु हो और न उड़ने की ज़िद कर रही हो। उसी वक्त दाहिनी ओर की दिशा से हवा का झोंका आया और दैत्याकार पतंग हिचकोले खाती हुई आसमान में ऊँचे से ऊँचे चढ़ती चली गई। दैत्य की आँखों में सूरज अब भी चमक रहा था। जब यह बहुत ऊँची चली गई तो बहुत तेज़ी से मांझा खींचने लगी, उसमें इतनी ताकत आ गई कि महमूद के छोटे लड़के को माँझा छुड़वाने में बाप की मदद करनी पड़ी। पतंग लगातार ऊपर जा रही थी, मानो उसे मुक्त होकर अपना कोई अलग ही जीवन जीना हो। और उसने अंततः ऐसा ही किया। मांझा टूट गया, स्वर्ग की और दौड़ती पतंग सूरज की और बढ़ते हुए अनंत में खो गई। वह कभी नहीं लौटी। महमूद को बाद में बहुत अचम्भा हुआ कि उसने एक पतंग को इतना चमकदार और जीवंत कैसे बना दिया था। उसने ऐसी पतंग फिर कभी नहीं बनाई। हाँ, उसने नवाब को एक ऐसी संगीतमय पतंग बना कर ज़रूर भेंट की थी जो हवा में उड़ने पर वायलिन की सी आवाज़ करती थी।

वे बड़ी फुर्सत के और बहुत लम्बे दिन थे। अब, नवाब को मरे बहुत बरस हो गए हैं, नवाब के वंशज अब महमूद जैसे ही गरीब हैं। एक ज़माने में कवियों की तरह पतंगसाज़ों के शरणदाता भी हुआ करते थे लेकिन अब महमूद को कोई नहीं पहचानता, एक कारण यह भी था कि गली में इतने सारे लोग रहते थे कि किसी के पास अपने पड़ोसियों को पहचानने की फुर्सत नहीं थी।
महमूद जव जवान था और एक बार बीमार पड़ गया था तो सभी पड़ोसी उसकी मिजाज़पुर्सी करने आए थे लेकिन अब जबकि वह अपना एक-एक दिन गिन रहा है किसी को उसकी परवाह नहीं है। उसके लगभग सभी पुराने दोस्त अल्लाह को प्यारे हो चुके हैं, लड़के बड़े हो चुके हैं। एक लड़का पड़ोस के मोटर गराज़ में काम करता है और दूसरा जो बंटवारे के वक्त पाकिस्तान में था, आज तक अपने रिश्तेदारों के पास नहीं लौटा है। दस बरस पहले जो बच्चे उससे पतंग खरीदते थे अब बड़े हो गए हैं। वे अपनी ज़िन्दगी बसर करने का जुगाड़ करें या उस बुड्ढे के बारे में सोचें। वे सब तेज़ी से बदलते गलाकाट समय में बड़े हुए हैं और उनकी नज़र में बूढ़ा पतंगसाज़ और बरगद का पेड़ अब कोई मायने नहीं रखता। दोनों कुछ ऐसे सामानों की तरह मान लिया गया है जिनका भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में कोई वज़ूद नहीं है। अब बरगद के पेड़ तले लोग अपने इरादों या तकलीफों पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा नहीं होते, कोई इक्का-दुक्का गर्मी के मौसम में तेज़ धूप से बचने के लिए आ जाता हो तो अलग बात है।

लेकिन एक लड़का था, बूढ़े का पोता। वह भी इस लिए कि महमूद का लड़का पास ही काम करता था। बूढ़े के दिल में खुशी होती थी जब वह जाड़े की धूप में इस छोटे बच्चेा को खेलते हुए देखता था, उसे लगता जैसे उसके लगाए किसी छोटे-से पौधे पर हर दिन नई पत्तियाँ निकल रही हों। आदमी और पेड़ों में बहुत समानता पाई जाती है। हम भी वैसे ही बड़े होते हैं अगर हमें कुचला या काट न दिया जाए। हमें याद आता है, अपनी जवानी में हम चमकदार सितारे की तरह होते हैं, उम्र बढ़ती है और हम थोड़ा-सा झुकने लगते हैं, सूरज की रोशनी में चरमराते अंगों को खींचते हुए और आह भरते हुए हमारे अंतिम पात झड़ जाते हैं।

महमूद बरगद की ही तरह था उसके हाथ बरगद की पुरानी जड़ों की ही तरह गठीले होकर मुड़ गए थे। अली छुई-मुई के उस पौधे की तरह था जो अहाते के अंत में लगा था। दो सालों में अली और ये पौधा दोनों, अल्हड़ जवानी का बल और आत्मविश्वास पा लेंगे।

गली में शोर का स्वर धुंधलाने लगा। हैरान होते हुए महमूद को लगा कि उसे नींद में सपना आ रहा है जो कि उसे अक्सर आया करता था ---- उसे एक पतंग नज़र आ रही थी, बेहद ताकतवर और खूबसूरत जो हिन्दुओं के देवता विष्णु के वाहन, श्वेत गरुड़ से मिलती थी। वह अपने पोते अली के लिए नई और अद्भुत पतंग बनाना चाहेगा। बच्चे को देने के लिए और कुछ भी तो नहीं है उसके पास।

उसने दूर से आती अली की आवाज़ को सुना लेकिन उसे लगा नहीं कि अली उसे बुला रहा है। उसे लगा जैसे आवाज़ बहुत दूर से आ रही है।

अली अहाते के दरवाज़े पर था, वह पूछ रहा था कि क्या उसकी माँ बाज़ार से लौट आई है। जब महमूद ने उत्तर नहीं दिया तो लड़का सवाल दोहराता हुआ आगे बढ़ा।

बुड्ढे आदमी के सिर पर धूप तिरछी हो गई थी और एक छोटी सी सफेद तितली उसकी दाढ़ी पर आराम फरमा रही थी। महमूद शांत था, जब अली ने अपने छोटे, भूरे हाथों से उसके कंधे को छुआ तो कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। लड़के को एक हल्की सी आवाज़ सुनाई दी जैसे जेब में कंचे टकराते हैं।

अचानक, घबराकर अली घूमा और दरवाज़े की तरफ दौड़ा। वह अपनी माँ को बुलाने के लिए गली में चिल्लाते हुए दौड़ रहा था। तितली बूढ़े आदमी की दाढ़ी से उड़ी और छुई-मुई के पेड़ की और बढ़ चली। हवा का तेज़ झोंका आया, उसने फटी पतंग को पकड़ा और हवा में ऊँचे उठा दिया। पतंग चली जा रही थी एक संघर्षरत शहर से नीले अनंत आकाश की ओर।

अनुवाद  :  राजेश्वर वशिष्ठ
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