पर्वतांचल के धूसर क्षेत्रों का अमिश्रित यथार्थ - जीनकाठी तथा अन्य कहानियाँ


प्रस्तुति:- श्रीनिवास श्रीकांत

एस. आर. हरनोट उन कतिपय कहानीकारों में हैं, जो शहर में जीवनयापन करते हुए भी अपने जीवन के स्त्रोतस्थल को नहीं भूले हैं। लेखक और गांव से निर्गमन कर गये व्यक्ति का दोहरापन उनकी कहानियों में बड़ी ही खूबसूरती और लोकोत्तर व्यथा के साथ उभरा है।
हरनोट की अब तक की अधिकांश कहानियाँ ग्रामाधारित हैं, जिनमें ग्रामांचल के असल जीवन को अधूसर प्रतिबिंबित देखा जा सकता है। ये कहानियाँ उस आम आदमी के बारे में हैं, जो हमारे जैसे जनतंत्र में भी अपने सांघातिक और दुखद यथार्थ से अभी तक पूरी तरह उबरा नहीं है। इन कथाओं से यह मालूम होता है कि इनमें कथाकार का मूलभूत लक्ष्य है देहात में सर्वहारा की वस्तुस्थिति को 'अनएडल्टरेटेड' (अमिश्रित) रूप में सामने लाना और यह भी कि ग्रामांचलों में सवर्ण वर्ग द्वारा जातिगत रूप से निम्न माने जाने वाले दुर्बल समुदायों का आज भी किस प्रकार शोषण किया जा रहा है।
इस ग्रामोन्मुखी पहाड़ी लेखक की कुछेक कहानियाँ गत एक दशक से मेरे अंदर के शोधित्सु पाठक को बराबर आन्दोलित करती रही हैं। इनमें जो लोक-तत्व व्यवहार्य होकर सामने आया है, वह सैलानी आँखों द्वारा देखा गया महज भौतिक और 'फोटोग्राफिक' सत्य नहीं। वह देहात के आदमी का जिया हुआ रोमांचक सत्य है, जिसे इन कथाओं का लिपिकार पात्रों के अन्दर उतरकर बाहर लाया है। उसके सभी अनुभव साक्षात् अनुभव हैं, जिन्हें उसने यथाक्षम अपने द्वारा रचे गये गैर-मोजेइक गल्प में उतारा है।
'जीनकाठी', 'सवर्ण देवता दलित देवता' और 'देवताओं के बहाने' ग्राम देवताओं को संदर्भ बनाकर लिखी गयी हैं। हिमाचल में कुल और ग्राम देवताओं की एक सुदीर्घ परम्परा है। देवताओं में ज्यादातर 'नाइट' (शूर-सामंत) की हैसियत रखते थे, जो दुर्बोध अतीत में अनुश्रुतियों के अनुसार अपनी प्रतिष्‍ठा  की रक्षा और प्रजा के कल्याण के लिए आने शत्रुओं से य़़ुद्धरत रहे। कालांतर में उन्हें स्‍थानीय प्रजा द्वारा देवशक्ति के रूप  में अपना लिया गया। वे अंत तक अपने पुजारी के माध्यम से आपसी कलहों का निपटारा, जन-सौभाग्य की रक्षा और भविष्‍यवाणी भी करते हैं, जिसके लिए विशेष मौकों पर देवोत्सव आयोजित किये जाते हैं, जिन्हें गाँव के 'बड़े' जरूरत पड़ने पर तय करते हैं।
'जीनकाठी' प्रस्तुत संकलन की एक अतिगंभीर और आपात मानवीय संकट की कहानी है। पहाड़ों में प्राचीनकाल से कुलीन समाज के सौख्य के लिए नरबलि की अति नाटकीय और आडंबरपूर्ण आसुरी प्रथाएँ प्रचलित रही हैं। ये हैं काहिका और भुंडा। यह बड़े दुख की बात है कि जनतंत्र के इस युग में भी ऐसी प्रथाओं का आयोजन बराबर प्रश्रय पाये हुए है। 'जीनकाठी', 'सवर्ण देवता दलित देवता', 'कालिख', 'चष्मदीद', 'मोबाइल' इत्यादि कुछ ऐसी कहानियाँ हैं, जो देश में आजादी के बाद हुए जनतंत्रीकरण और सामाजिक परिवर्तन के बावजूद प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से अब भी मौजूद जातिभेद की ओर इशारा करती हैं। इनमें जातिवंश का दुर्दमनीय भाव अनेक स्थलों पर अपने अलग-अलग रूपों में उभरकर सामने आता है।
'जीनकाठी' की कहानियों में गाँव के आम आदमी के सुख-दुःख को कथाकार ने बड़े ही सलीके से अपने पाठकों को परोसा है। इनमें तात्कालिकता और चौंकाने का लक्ष्य नहीं है। जातिदाह और यत्र-तत्र निम्न समुदाय के लोगों के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ इन कथाओं में फूहड़ आक्रोश भी कहीं नजर नहीं आता। ये कहानियाँ बड़ी शिष्‍टता के साथ गल्प के गुणग्राहकों के अंदर उतरने का प्रयास करती हैं और दोषी वर्ग के लोगों को 'सेग्रीगेट' (वियोजित) कर उन पर गहन प्रहार करती हैं। लेखक समाज के द्वंद्व को बलपूर्वक नहीं लड़ना चाहता, बल्कि समकालीन विसंगतियों और अन्याय के प्रति पूरे समाज को जागरूक बनाना चाहता है, ताकि सकारात्मक बदलाव के पक्ष में वह न सिर्फ हामी भरे, अपितु सामाजिक रूप से प्रताड़ित लोगों के प्रति अपने आचरण को भी दुरुस्त करे।
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9/ए, पूजा हाउसिंग सोसायटी,
सदलहिल, कामनानगर (चक्कर),
शिमला-171005
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जीनकाठी तथा अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह): एस. आर. हरनोट, प्रकाषक: आधार प्रकाषन प्रा. लि., एस. सी. एफ. 267, सेक्टर-16, पंजकूला-134113 (हरियाणा), पृश्ठ: 139, मूल्यः 200 रूपये।

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