तीन दिन पहले ही तो हम आए हैं मुंबई। मैं और मेरे पति। उम्र के इस मुक़ाम पर जब हम दोनों ही रिटायर हो चुके हैं, केवल एक ही जगह आना होता है, वो भी साल में एक बार-शुभी के यहां! शुभी हमारी इकलौती बेटी है। बेटी-दामाद मुंबई में रहते हैं। इनके छोटे से परिवार को देखकर आंखें आशीष देती नहीं थकतीं। इनके परिवार में दो और सदस्य हैं-मेरी नातिन सान्या और नाती सौय। सान्या ने इसी साल कॉलेज में दाख़िला लिया है और सौय ने नवीं की परीक्षा दी है। दामाद सुमित एक बड़ी कंपनी में मैनेजिंग डायरेक्टर हैं और शुभी ख़ुद एक स्कूल में इतिहास की लेक्चरर।

यहां आकर शुभी के पापा तो बच्चों के साथ बच्चे हो जाते हैं। सुमित के साथ भी बहुत घुटती है इनकी। पॉलिटिक्स पर एक बार चर्चा शुरू हो जाए तो रात के दो बजा लेते हैं दोनों। और मैं... मेरी हमेशा से ही विश्लेषण की आदत रही है सो आज तक बरक़रार है। शुभी कहती भी है,‘‘मां, तुम तो हर बात की बखिया उधेड़ डालती हो!’’ क्या करूं, अपने ऑफ़िस में भी तो यही काम किया है। अपनी छोटी-सी फ़र्म में ऑफ़िस ऐडमिनिस्ट्रेशन ही तो संभालती थी। वही आदत जीवन का हिस्सा बन गई है।

आज शनिवार है फिर भी किसी ख़ास काम से सुमित ऑफ़िस गए हैं। आज के दिन सान्याो साढ़े बारह बजे तक कॉलेज से आ जाती है और सौय दो बजे तक आ जाएगा। शुभी की छुट्टी है और वो किचन में खाना बनाने की तैयारी कर रही है। शुभी के पापा हमेशा की तरह ही अख़बार में डूबे हुए हैं। नई जगह की यही समस्या है-समय काटे नहीं कटता है। हमारा इंदौर होता तो बगीचे के पौधों को संभालते-संभालते ही समय कट जाता है, लेकिन यहां? यहां तो फ्लैट कल्चर है ना, पौधे हैं ही नहीं! शुभी किचन का काम करने नहीं देगी और मेरा उपन्यास कल ही ख़त्म हो गया है। अब? शुभी के किचन का काम ख़त्म हो गया है और अब वह अपने स्कूल की कॉपियां जांचने बैठ गई है। उसे टेबल पर सर झुकाए काम करते देख मैं अतीत में पहुंच गई। पांच साल की शुभी, जो नाच-गाने के साथ-साथ क्लास में भी अव्वल आती थी, परीक्षा के दिनों में यूं ही सर झुकाए पढ़ती रहती थी। 10-15 साल की शुभी याद आती है, जो हर बार सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जीते प्रमाण-पत्रों की झड़ियां लिए घर लौटती थी और अपने पापा के गले में झूम जाती थी। परीक्षाओं में बिना मां को रातभर जगाए पढ़ ही नहीं सकनेवाली शुभी। अपने अच्छे नंबरों के लिए हमेशा मुझसे कहती,‘‘मां, तुम अगर रातभर मेरे पास नहीं बैठतीं तो थोड़े ही मेरे इतने नंबर आते! मां, ये मेरे नहीं, तुहारे नंबर हैं!’’

अब झूठ क्या बोलना, जब शुभी हुई तो मैं ख़ुश थी, पहली संतान थी मेरी, पर लड़का हो यह चाह मन में कहीं दबी तो थी ही।

इनसे कहा, तो हंसकर बोले,‘‘एक दिन अपनी इस लड़की पर नाज़ करोगी!’’ फिर एक बार ही नहीं, कई-कई बार शुभी ने मुझे उसकी मां होनेपर नाज़ कराया भी। पर मां और वो भी लड़की की मां, एक चिंता से छूटी तो दूसरी चिंता! आए दिन अकारण ही चिंतित रहती थी मैं। शुभी बड़ी जो हो रही थी। कहीं किसी लड़के-वड़के के चक्कर में न फंस जाए। वैसे तो शुभी से मेरी दोस्ती थी। हम मां-बेटी कम और दोस्त ज़्यादा थे। फिर भी दुनिया का क्या भरोसा, कोई मेरी फूल-सी बच्ची को बहला-फुसला ले। इन्हें अपनी चिंता के बारे में बताया तो इन्होंने बड़ी सहजता से मुझे समझाया,‘‘देखो, एक तो शुभी ऐसा करेगी नहीं और यदि ऐसा कुछ हुआ तो हम परिस्थिति देखकर उचित निर्णय ले लेंगे। घबराने से कुछ होगा? ऐसे तो तुम अपनी तबियत ख़राब कर बैठोगी।’’

लो मैं भी कहां खो गई! 

‘‘शुभी, चाय पियोगी क्या?’’ मैंने उसे दुलारते हुए पूछा। उसके ‘हां’ कहने पर चाय बनाने चली आई। ख्यालों का सिलसिला फिर जुड़ गया। इसके बाद फिर कुछ डगमगाई भी थी शुभी। उसके कॉलेज की एक दोस्त ने मुझे बताया कि इन दिनों वो एक लड़के से ज़्यादा घुलमिल रही है। कितने टेंशन में आ गई थी मैं! दो रोज़ इन्हें बिना बताए, ऑफ़िस से छुट्टी लेकर पीछा भी किया था मैंने शुभी का। बात सच भी निकली। तीसरी रात इन्हें बताया। ये धीर-गंभीर हैं। बोले,‘‘मैं अपनी तरह से शुभी से बात करूंगा। तुम इस मामले में उससे कुछ नहीं बोलना।’’

अगली शाम देखती क्या हूं कि इन्होंने उस लड़के को घर पर बुला लिया और वो भी शुभी के साथ। मुझसे परिचय कराते हुए बोले,‘‘सुधा, ये कॉलेज में शुभी का सबसे प्यारा दोस्त है। तुम कॉफ़ी बना लाओ फिर हमसब मिलकर गपशप करेंगे।’’ कॉफ़ी बनाते-बनाते मैंने महसूस किया कि बाहर हंसी-मज़ाक का दौर चल रहा है। बाहर आई तो ये उन दोनों से उनके करियर प्लान्स के बारे में बात कर रहे थे। बातचीत से तो लड़का भला ही लगा, पर ये उम्र प्यार की तो नहीं होती, मैं मन ही मन सोच रही थी। ख़ुद को इन लोगों की बातों में शामिल करने का प्रयास किया, लेकिन रह-रह कर मन होता कि शुभी से सबकुछ पूछूं और इस लड़के को भगा दूं यहां से। पर इनकी बात जो रखनी थी! जबरन ही मुस्कान ओढ़े बात करती रही। उसके जाने के बाद भी बाप-बेटी रात को बहुत देर तक बातें करते रहे। इस घटना के बाद से मैंने महसूस किया कि शुभी पढ़ाई में और ज़्यादा दिलचस्पी लेने लगी है। इनसे पूछा तो ये हंस पड़े,‘‘पिता के स्नेह का जादू चलाया है मैंने! अब देखना, तुहारी शुभी वही करेगी जो तुम चाहोगी।’’

शुभी का कॉलेज ख़त्म होने के सालभर बाद ही हमने शुभी की शादी सुमित से कर दी।

चाय बन गई तो एक प्याला इन्हें और दूसरा शुभी को थमाकर मैं गैलरी में लगे झूले पर बैठ गई। अचानक घड़ी पर नज़र गई तो मैंने शुभी को आवाज़ लगाते हुए कहा,‘‘शुभी, डेढ़ बज रहे हैं।’’

‘‘मां, सान्या अभी तक नहीं आई! मुझे चिंता हो रही है,’’ शुभी टेबल से उठती हुई बोली।

‘‘आती होगी,’’ पर मेरे जवाब को अनसुना कर शुभी फटाफट फ़ोन के पास पहुंची और सान्या का मोबाइल नंबर लगाया। 

‘‘रिंग जा रही है, पर बार-बार इंगेज टोन आने लगती है,’’ कहती हुई शुभी के माथे पर चिंता की लकीरें देखीं तो मुझे ख़ुद पर बीता ऐसा ही समय याद आने लगा। जब शुभी को आने में 15-20 मिनट की भी देर हो जाती थी तो मैं अंदर-बाहर होने लगती थी। ये कहते भी थे,‘‘बच्ची को थोड़ी देर हो गई तो क्या हुआ? कहीं सहेलियों से बात करने में लग गई होगी।’’ मैं खीझ जाती। सोचती ये मां नहीं हैं ना, कैसे समझेंगे?

शुभी इस वक़्त मुझे बिल्कुल मेरे जैसी लगी, मां लगी!

ढाई बज गए। सौय भी आ गया, पर सान्या नहीं आई। अब तो मुझे भी चिंता होने लगी थी। शुभी ने खाना मेज पर लगाया और बोली,‘‘मां, मैं ज़रा नीचे तक देख आऊं सान्या को। तुम लोग खाना खा लो।’’

सौय मुझे अपने स्कूल की बातें सुनाने लगा और हम तीनों ने खाना खा लिया। थोड़ी देर बाद शुभी ऊपर आई और उसने सान्या के कॉलेज फ़ोन लगाया तो पता चला कि कॉलेज की छुट्टी तो 12 बजे ही हो चुकी है। शुभी की चिंता और बढ़ गई। मुझे शुभी को इस हाल में देखकर महसूस हो रहा है कि जैसे ये मैं ही हूं। वही मैं, जो अपनी बच्ची के देर से आने पर किसी अनिष्ट की आशंका को लेकर घबरा जाती हूं!!

खाना खाकर शुभी के पापा खिड़की के पास ही खड़े थे। अचानक बोले,‘‘शुभी, सान्या आ गई।’’

सान्या के घर में घुसते ही शुभी ने प्रश्नों की बौछार कर दी, बिल्कुल मेरी तरह। ‘‘बारह बजे छुट्टी हो गई थी तो तुम इतनी देर तक कहां थी? मोबाइल क्यों इंगेज आ रहा था? तुमने मुझे फ़ोन क्यों नहीं किया?’’ वगैरह।।।वगैरह।।।

सान्या ने कोई जवाब नहीं दिया। फ्रिज से निकालकर पानी पीते हुए मुझसे लिपट गई और बोली,‘‘मां, आप ज़रा-सी भी देर से आने पर नाराज़ होने लगती हो। जानती हो, आज मेरे स्कूटर के कार्बोरेटर में कचरा आ गया था। पैदल एक किलोमीटर चली, तब जाकर दुकान मिली। स्कूटर ठीक करा रही थो सोचा घर फ़ोन कर दूं, वरना आप चिंता करोगी, पर मोबाइल की बैटरी ख़त्म हो गई थी। तो मैं फ़ोन भी नहीं कर पाई।’’

सान्या का जवाब सुनकर शुभी के चेहरे से चिंता की लकीरें छंट गईं। लेकिन कल और परसों और आनेवाले दिनों में भी जब तक सान्या अच्छे-से घर में पहुंच नहीं जाती, चिंता का, मां होने का यह सिलसिला तो चलता ही रहेगा! कल मेरे घर में, आज शुभी के घर में और आगे सान्या के घर में...अनवरत !!
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shilpa_shm@rediffmail.com

2 comments:

  1. एक माँ की भावनाओं और बेटी के prati जिम्मेदारियों का सटीक तथा सुन्दर चित्रण

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  2. माँ तो आखिर माँ है...अच्छी कहानी

    उत्तर देंहटाएं

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