अगर मुझसे पूछा जाये कि सबसे ज्यादा राहत कब मिलती है तो ज्यादातर बार मेरा जवाब होगा जब कोई मुझे लिखने के काम से कोई थोड़ी सी मोहलत दे दे! मजेदार बात यह है कि लिखने का काम उन कामों में से है जो मैं सबसे कम किया करता हूं लेकिन जिनके बारे में सबसे ज्यादा सोचता हूं …मुझे हमेशा लगता है कि हर वक्त एक लम्बी कहानी लिखे जा रहा हूं जो खत्म होने का नाम नहीं ले रही है बल्कि अभी तो कायदे से शुरू भी नहीं हुई! यह जो शुरूआत  में कुछ वक्य लिख दिये हैं इनमें कहीं कोई चीज छूट गयी है जो है अभी तक पकड़ में नहीं आयी है। जब तक वह पकड़ में आ जाये तब तक मैं इस कहानी के पीछे क्यों वक्त खराब करूं? एक दूसरी अधूरी कहानी मेरा पीछा कर रही है जरा देर उसकी गिरफ्त में आ जाऊं… ।

तो यह बार–बार कैद होना और कैद से रिहाई की मासूम उम्मीद में जीना… मुख्तसर में मेरे लिखने की कुल कहानी इतनी सी है…भाई सूरज प्रकाश का प्यार, उत्साह और वेब मैगजीन के लिए समर्पण के आगे बेबस होकर फिर से गिरफ्तार हो गया हूं … मुझसे कहा गया है कि मैं अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में कुछ लिखूं। मुझ जैसा आदमी जो ठीक से यह भी नहीं जानता कि वह क्या लिखेगा। भला रचना-प्रक्रिया के बारे में कैसे कुछ कह पायेगा…फिर भी कुछ चीजें साझा करने के लिये हैं।

सबसे पहले तो यही कि मुझे खुद पता नहीं होता कि क्या लिखूंगा…मेरे लिये कहानी लिखना उस यात्रा में निकलने की तरह है जहां गन्तव्य निश्चित नहीं है, मौसम बहुत साफ नहीं है और रास्ते बने हुए नहीं हैं… हालांकि मेरी बहुत सारी कहानियां एक खास जगह सौरी से होकर गुजरती हैं लेकिन यह भी सच है कि खुद सौरी ने इन कहानियों में आने के बाद ही अपने को बसाया! यह जितना बाहर का सच है उतना ही भीतर का भी। शुरूआत में तो वह महज एक नाम के तौर पर कहानी के भीतर चली  आयी.. फिर दूसरी कहानी में। अगली कहानी तक आते–आते सौरी एक काल्पनिक गांव का नाम भर नहीं रह गया …वह अपने आप में एक मुकम्मल गांव बन गया जहां मनुष्य की मूल संवेदनायें अभी तक बची रह गयी हैं। जो यथार्थ में कहीं है नहीं, पर जिसे होना जरूर चाहिये। ये कहानियां एक लम्बे अन्तराल में लिखी गयी हैं। मुझे लगता है कि मैं कहानीकारों की उस बिरादरी का सदस्य हूं जो कहानियां नहीं लिखते बल्कि जिनको माध्यम बना कर कहानियां खुद को लिखवाती हैं।

सबसे खतरनाक और मारक यह इन्तजार है कि कोई कहानी कब अपने को लिखवा ले जायेगी? यह इन्तजार एक बैठक से लेकर कई सालों तक फैला हो सकता है… मसलन एक हत्यारे की आत्मस्वीकृति मैंने एक बैठक में पूरी की लेकिन पारस को लिखने में तीन साल से ज्यदा वक्त लगा… पाठकों को यह थोड़ा विरोधाभासी बात लग सकती है। इस बात को थोड़ा साफ करता हूं।

सबसे पहले तो मुझे कहानी का पहला वाक्य परेशान करता है और कभी कभी पहला पैरा… हां पहले वाक्य की बाधा पारकर मैं इस नतीजे पर तो पहुंच ही जाता हूं कि यह कहानी पूरी जरूर हो जायेगी - भले ही कुछ दिन लगें या कुछ साल! जब पहला पैरा पूरा हो जाता है तो मुझे बहुत आनन्द आता है कि अब एक कहानी पूरी होने वाली है… और इस आनन्द में धीरे धीरे कुछ दिन बीतने लगते हैं कि मैं भूल जाता हूं कि कोई कहानी लिख रहा था! अब यह कहानी के ऊपर है कि याद दिलाये कि उठ और मुझे लिख! अब जिस कहानी ने अभी ठीक से आकार भी ग्रहण नहीं किया है वह भला कहां से मुझे याद दिलाने चली आयेगी! पता नहीं वे कहानियां कौन से तत्वों से बनी हैं जो इस बात के बावजूद याद दिला देती हैं… बस दरवाजा ठकठका देंगी… मैं भी उनके सब्र का भरपूर इम्तहान लेता हूं… जानता हूं बाद में ये मेरे पसीने छुटवाने का पूरा इन्तजाम करने वाली हैं… अभी तो मना रही हैं, बहला रही हैं, फुसला रही हैं… कि बस सब कुछ बहुत आसान है – इस तरह से अभी तक किसी ने भी नही कहा है, कि नया सा विचार है, कि ऐसा पात्र ढूंढे नहीं मिलेगा! लेकिन अब तो मैं तजुर्बे से जान गया हूं कि यह सब धोखा है। जब लिखने बैठूंगा तो एकदम तुनक जायेगी - भला इस तरह मुझे लिखोगे, मुझे नहीं पता था कि एक अनपढ़ लेखक मेरे हिस्से पड़ा है! अगर इसने उस्तादों को पढ़ा होता तो इस तरह से मुझे नहीं उठाता! और लिखने का तरीका तो क्या कहें! अपने आप को दोहराये जा रहा है! वाक्यों को कैसे लिखना चाहिये नहीं जानता! फिर सहायक क्रियाओं का हमला! भूतकाल में लिखने से बच… अगर लिखना है तो यह हर वाक्य के अन्त में था का प्रयोग तो कतई नहीं चाहिये…

इस तरह की कई जिरह तो यह लिखवाते वक्त करेंगी यह जानते हुए भी कई बार मैं इनके फुसलाने में आ जाता हूं। बस मैं उठकर बैठा नहीं कि ये बैताल के जिन्न की तरह मेरे सर पे सवार हो लेती हैं। अब होता यह है कि मैं सोचते हुए नहीं लिखता बल्कि लिखते हुए सोचता हूं तो कहानी के घुमाव परेशान करने लगते हैं। आगे क्या? लिख तो सामने का रहा होता हूं पर ध्यान आगे पर टिका रहता है…जैसे ही सामने कुछ दिख जाता है लिखना स्थगित! अब कुछ दिन तक जो दिखा वह थोड़ा और समय मांगता है… अब कहानी की जगह वह हिस्सा ले लेता है जिसे लिखा जाना है और यह जिम्मेदारी भी उसी की है कि वह मुझे याद दिलाये कि उसे लिखा जाना है… यानि जो शुरूआत में कहानी के साथ होता है वह अब कहानी के दीगर हिस्सों के साथ होने लगता है…कई मर्तबा तो यह खेल पैरा दर पैरा चलता रहता है … यह खेल तब तक चलता है जब तक कहानी पूरी नहीं हो जाती। एक कहानी के साथ तो यह खेल इस कदर थका कर पस्त कर देने वाला था कि मुझे न अपना पता था न जमाने की खबर। कुछ दिनों बाद कहानी को देखा तो लगा कि यह तो पूरी हो गयी!

 यहां मैंने जो कुछ भी कहा है वह वास्तव में मेरी रचना-प्रक्रिया है भी या नहीं  मैं ठीक से इस बात को नहीं जानता। हां इतना जरूर तय है कि यह एक खेल तो है ही जो मैं लिखते वक्त अपनी कहानियों के साथ खेलता हूं। जाहिर है यह बेहद खतरनाक खेल है…इस खेल का तकाजा है कि मुझे चित होना है, अगर मैं चित नहीं हुआ तो कहानी पूरी हो ही नहीं पायेगी।

नवीन कुमार नैथानी

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