एक अजीब से डर के साथ मैं अपने जीवन की कहानी लिखना शुरू कर रही हूं। अपने बचपन के चारों ओर एक सुनहरे कुहासे की तरह लिपटे इस पर्दे को उठाने के लिए मेरे मन में एक अंधविश्वास-भरी झिझक रही है। आत्मकथा लिखना एक बहुत ही मुश्किल काम होता है। जब मैं अपने शुरुआती अनुभवों को खानों में बांटने की कोशिश करती हूं तो मैं पाती हूं कि बीते हुए कल को आज से जोड़ने वाले बरसों में वास्तविकता और कल्पना एक जैसी ही दिखलाई पड़ती हैं। बच्चे के अनुभवों को एक औरत अपने ही स्वप्न-चित्र में चित्रित करती है। मेरे जीवन के शुरुआती बरसों के कुछ अनुभव तो जीवंत हैं जबकि बाकी सब पर बंदीगृह की-सी छायाएं हैं। इसके अलावा बचपन की बहुत-सी खुशियां और उतने ही दु:ख अपनी मार्मिकता खो चुके हैं और ऐसा भी हुआ कि बड़ी खोजों की उत्तेजना ने मेरी शुरुआती शिक्षा से बहुत ज्यादा महत्व की कई घटनाओं को बिसरा दिया है। इस  कहानी को उबाऊ न बनाते हुए मैं केवल उन्हीं घटनाओं को सामने रखना चाहूंगी जो कि मुझे बेहद ही रोचक और महत्वपूर्ण लगती हैं।

मेरा जन्म 27 जून, 1880 को उत्तरी अलाबामा के छोटे-से कस्बे टुस्कुम्बिया में हुआ।

मेरे पिता के परिवार के लोग स्विटज़रलैंड के मूल निवासी कस्पर केलर का वंशज थे। वे लोग मैरीलैंड में आ बसे थे। मेरे एक स्विस पूर्वज ज्यूरिख में मूक बधिरों के पहले अध्यापक हुए और यह भी एकमात्र संजोग ही था कि उन्होंने मूक बधिरों की शिक्षा-दीक्षा के बारे में एक किताब भी लिखी थी। हालांकि यह सही है कि ऐसा कोई राजा नहीं हुआ जिसके पूर्वजों में कोई दास न हुआ हो और ऐसे कोई दास भी नहीं हुए जिनमें कोई राजा न हुआ हो।  

कस्पर केलर के पुत्र, मेरे दादा अलाबामा में एक बहुत बड़े मैदानी इलाके में जा पहुंचे और फिर वहीं बस गए। मुझे बताया गया था कि वे बागान का साज-सामान खरीदने के सिलसिले में हर बरस एक बार घोड़े पर सवार होकर टुस्कुम्बिया से फिलेडेल्फिया जाया करते थे। मेरी चाची के पास उनके अपने परिवार के नाम लिखे गये कई खत हैं, जो इन यात्राओं के रोमांच और जीवंतता के किस्से बताते हैं।

मेरी दादी केलर, लाफायेते के सहायकों में से एक, एलेक्जेंडर मूर की बेटी थी और वर्जिनिया के शुरुआती कोलोनिअल गवर्नर एलेक्जेंडर स्पोर्ट्सवुड की पोती थीं। वह रोबर्ट ई. ली की चचेरी बहन भी थीं।

मेरे पिता ऑर्थर एच. केलर कॉन्फे्डेरेट आर्मी में कैप्ट न थे और मेरी मां कैट एडम्स, उनकी दूसरी पत्नी थीं। मेरी मां उम्र में मेरे पिता से काफी छोटी थीं। उनके दादा बेंजामिन एडम्स की शादी सुसन्ना ई. गुडह्यु से हुई थी और वे कई बरस मैसेच्यूसेट्स, न्यूब्युरी में रहते रहे। उनके बेटे चार्ल्सई एडम्स का जन्म न्यूब्युरी पोर्ट में हुआ था और वह हेलेना अर्कानसास में रहने चला गया था। जब गृह युद्ध हुआ तो वह दक्षिण की ओर से लड़ा था और ब्रिगेडियर जनरल बना। उसकी शादी लूसी हेलेन इवेरेट से हुई थी। लूसी एडवर्ड इवेरेट और डॉ. एडवर्ड एवरेट हेल के परिवार से नाता रखती थी। युद्ध निपटने पर परिवार मेम्फिंस, टेनेस्सी में रहने चला गया था।

मैं, अपनी उस बीमारी तक, जिसने मुझे देखने और सुनने से वंचित कर दिया था, एक छोटे-से घर में रही। इस घर में एक बड़ा चौकोर कमरा और एक छोटा-सा कमरा था। इस छोटे कमरे में नौकर सोया करता था। दक्षिण की तरफ रिहायशी जमीन के पास एक छोटा घर उपभवन के रूप में बनाने का रिवाज था। यह खास अवसरों पर काम में लाया जाता था। गृह युद्ध के बाद मेरे पिता ने ऐसा ही एक घर बनाया और जब मेरी मां से उनकी शादी हुई तो वे उसमें रहने चले गए। वह लताओं, बेलदार गुलाबों और भवरों तथा मधुमालती की लताओं से पूरी तरह ढका हुआ था। बगीचे से वह एक कुंज की तरह दिखता था। पीले गुलाबों और दक्षिणी स्मिलैक्स से ढका छोटा पोर्च दिखायी नहीं देता था। यह हमिंगबर्डस और मधुमक्खियों का पसंदीदा बसेरा था।

केलर परिवार जिस रिहायशी ज़मीन पर रहता था, हमारे छोटे गुलाब कुंज से कुछ ही कदम दूर थी। वह जगह "लता कुंज, "आइवी ग्रीन" कहलाती थी क्योंकि घर और आसपास के पेड़ तथा बाड़ें सुंदर अंग्रेजी लता कुंजों से ढके हुए थे। पुराने फैशन का वह बगीचा मेरे बचपन का स्वर्ग था। 

अपनी टीचर के आने के पहले के दिनों में भी, मैं अपने आपको सख्त चौकोर लकड़ी की घेरेबंदी में ही महसूस किया करती थी और वहां मौजूद गंध ही मेरी गाइड हुआ करती थी। यहीं मैने सबसे पहले नीलपुष्प और लिली के फूलों को खोजा था। गुस्से के आवेश के बाद आराम करने और गुस्से से लाल अपने चेहरे को छिपाने के लिए मैं इन्हीं ठंडी पत्तियों और घास में पहुंच जाती थी। फूलों की उस बगिया में अपने गुस्से को शांत करने की भी अपनी खुशी हुआ करती थी। उस बगीचे में एक जगह से दूसरी जगह तब तक घूमना जब तक कि अचानक वह सुंदर बेल ना आ जाए। बेल को मैं उसकी पत्तियों और खुशबू से ही पहचानती थी और वहीं मैंने जाना कि यह वही बेल थी जिसने बगीचे के अंतिम छोर पर बने उस टूटे-फूटे "समर हाउस" को ढक रखा था। यहां केलमॅटिस नाम की लताएं फैली थीं, लटकते हुए जैसमिन के फूल थे और मिठास लिये कुछ विरल सुंदर फूल थे। ये फूल "बटरफ्लाई लिली" कहलाते हैं क्योंकि इनकी कोमल पंखुडियां तितलियों के पंखों जैसी होती हैं। लेकिन गुलाब – उनका तो कहना ही क्या। मैंने उत्तर के ग्रीन हाउस में ऐसे दिलखुश गुलाब नहीं देखे जैसे कि मेरे दक्षिणी घर में थे। वे लंबी बंदनवार की तरह हमारे पोर्च से लटका करते थे। पूरी हवा को अपनी खुशबू से सराबोर कर देते थे, मिट्टी की खुशबू से वे अछूते थे और अलसुबह ओस में धुले इतने कोमल और पवित्र लगते थे कि मैं ये सोचने से अपने आपको रोक नहीं पाती थी कि ईश्वर के बगीचे के रंग-बिरंगे खूबसूरत लिली के फूलों से ये किस तरह से अलग होंगे।  

मेरे जीवन की शुरुआत बहुत ही सादगी भरे आम जीवन की तरह ही थी। मैं इस संसार में आयी, मैंने देखा और मैंने किले फतह किये जैसे कि परिवार का पहला बच्चा अक्सर करता है। मेरे नाम को लेकर एक सामान्य सोच-विचार हुआ। परिवार के पहले बच्चे का कोई भी चलताऊ नाम नहीं रखना चाहता था और इस बात को लेकर परिवार के सब लोग स्पष्ट थे। मेरे पिता ने मिल्ड्रे ड कैम्पबेल का नाम सुझाया, जोकि उनके बेहद सम्मानित पूर्वज थे और उसके बाद उन्होंलने बातचीत में और आगे हिस्सा लेने से मना कर दिया। मेरी मां ने यह कह कर इस समस्या को हल सुझाया कि वे चाहती हैं कि मैं उनकी मां के विवाह से पहले वाले नाम हेलेन एवेरेट से जानी जाऊं। लेकिन मुझे चर्च ले जाने की उत्सुकता में मेरे पिता इस नाम को रास्ते में ही भूल बैठे। यह सहज ही था क्योंकि उन्होंने तो इस किस्सें में भाग लेने से इंकार ही कर दिया था। जब पादरी ने उनसे नाम पूछा तो उन्हें केवल इतना ही ध्यान आया कि यह तय हुआ था कि मैं अपनी नानी के नाम से जानी जाऊंगी और उन्होंने वह नाम हेलन एडम्स बताया।

मुझे बताया गया कि जब मैं लंबी पोशाकें पहना करती थी तब भी मैंने उत्सुकता के, आत्म निश्चय के कई संकेत दिए। हर वो चीज़ जो मैं दूसरे लोगों को करते देखा करती, मैं उसी की नकल करने की ज़िद करती। छह महीने की उम्र में मैं "आप कैसे हैं" बोल सकती थी और एक दिन मैंने आसानी से चाय, चाय, चाय कह कर सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। अपनी बीमारी के बाद भी मुझे उन शब्दों में से एक शब्द याद था जो मैंने शुरुआती महीनों में सीखे थे। वह शब्द था "वाटर" और अपनी आवाज़ खो जाने के बाद भी मैंने उस शब्द के लिए कुछ ध्वनि बनाना जारी रखा। मैंने "वाह वाह" की आवाज़ निकालनी तभी बंद की जब मैंने उस शब्द को बोलना सीखा।

मुझे बताया गया कि जब मैं एक बरस की थी तभी मैंने चलना शुरू कर दिया था। मेरी मां ने मुझे नहाने के टब से बाहर निकाला ही था और वह मुझे गोद में पकड़े हुई थी, तभी मैं अचानक धूप में समतल फर्श पर नाचती हुई पत्तियों की फड़फड़ाती छाया की ओर आकर्षित हुई। मैं मां की गोद से उतरी और लगभग पत्तियों की ओर दौड़ ही पड़ी। आवेश के खत्म होते ही, मैं गिरी और चिल्लायी कि मां मुझे अपनी बाहों में ले लो।

 खुशी के ये दिन ज़्यादा लंबे नहीं चले। गाने वाली छोटी चिडि़या रॉबिन और मॉकिंग बर्ड के गीत के साथ एक संगीतमय छोटा-सा वसंत, फलों और गुलाबों से भरपूर एक गर्मी और सुनहरा और किरमिजी एक शरद बीत गया और ये सब उत्सुक और खुश बच्चे के पैरों में कुछ उपहार छोड़ गए। फिर फरवरी के नीरस महीने में वह बीमारी आयी जिसने मेरी आंखें और कान बंद कर दिए और मुझे एक नवजात बच्चे जैसी बेसुधी में धकेल दिया। वे इसे पेट और मस्तिष्क का तेज़  संकुचन कहते हैं। डॉक्टर यह मान कर चल रहा था कि मैं जी नहीं सकूंगी। एक अल-सुबह उसी तरह अचानक और रहस्यमय तरीके से मेरा बुखार उतर गया जैसे कि वह आया था। उस समय मेरे परिवार में बहुत खुशनुमा माहौल था, लेकिन कोई भी, यहां तक की डॉक्टर भी नहीं जानता था कि मैं अब कभी भी दोबारा देख-सुन नहीं सकूंगी।

 कल्पना करती हूं कि मैं अब भी अपनी उस बीमारी को लेकर विभ्रम की स्थिति में हूं। विशेष रूप से मुझे मेरी मां की वह सह्दयता याद है जिससे वह मेरी खीज और दर्दभरी बेहोशी में मुझे खुश करने की कोशिश करती थी। मेरी वह तड़प और घबराहट जिसके साथ मैं अशांत और आधी नींद से उठी और मैंने अपनी रूखी तथा गर्म आंखों को उस रोशनी से परे, जो मुझे कभी बहुत प्रिय लगती थी, एक दीवार की ओर मोड़ा, जो मुझे दिन-ब-दिन धुंधली दिखने लगी। लेकिन इन क्षणिक यादों के अलावा यदि सचमुच कुछ यादें हैं तो वे बहुत अवास्तविक, बिल्कुल एक बुरे सपने की तरह हैं। धीरे-धीरे मैं उस शांति और अंधियारे की आदी हो गई जो मुझे घेरे हुए था। तभी मेरी टीचर आयी, जिसने मेरी आत्मा को अनंत आकाश दिया। तब मैं भूल गई कि मेरा जीवन इस अंधेरेपन से कुछ जुदा था। लेकिन अपने जीवन के पहले उन्नीस महीनों में ही मैने बड़े हरे-भरे मैदानों, चमकीले आकाश, पेड़ों और फूलों की झलक पा ली थी। इन्हें आने वाला अंधकार मिटा न सका। अगर हम एक बार देख चुके हैं तो दिन हमारा है और उसकी हर एक चीज़ हमारी है, चाहे यादों में ही सही।

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