वह बार-बार अपने प्रतिरूप को दर्पण में निहार रही थी... मन सपनों के नवीन नीड़ बनाने को आतुर था। वह पंछी की तरह आसमान में सुदूर उड़ जाना चाहती...इतनी ऊँचाई पर जहाँ से पृथ्वी का सब कुछ अदृश्य रहे...। उठी हुई तीखी नाक..इन्द्रधनुषी भवें ...लम्बी गर्दन ...वह सुन्दरता की प्रतिमूर्ति...। सुडौल बाहें जिनका सहारा पाने के लिए हर युवा तैयार ...उन्नत वक्ष, तराशी हुई कटि सभी अंग-प्रत्यंगों के महत्तम समावर्तक रूप में वह एक आकर्षक प्रतिमा थी..। नागपाश के समान केशराशि जो इन्हें देखता उनमें बिंधकर रह जाता।

नाभि-दर्शना तथा अंग-प्रदर्शना कपड़े पहनना उसकी हॉबी है। अपनी ड्रेस भी वो अपने आप डिजायन कर टेलर मास्टर को हिदायत देती...। छोटा और स्लीवलैस टॉप पहनकर जब वह निकलती तो हर युवा की धड़कनें बेकाबू हो जातीं..। छोटे और टाइट टॉप पहनने में पापा को आपत्ति होती इसलिए घर से निकलते वक्त ऐसे कपड़ों के ऊपर एक फुलस्लीव टॉप पहन लेती जो कुछ ही दूरी पर गाड़ी की डिग्गी के हवाले हो जाता...और तन पर रह जाता टाइट टॉप जिसमें से शरीर कुलांचे मार बाहर निकलने को आतुर होता...।

उसका नाम है सौदामिनी..। जब भी वह निकलती दो-चार पर अपने नाम के अनुरूप बिजली गिरा ही देती..। पर उसे अपने नाम का शॅॉर्टफॉर्म 'मिनी' कहलाना अच्छा लगता। घर आकर मम्मी को कारनामे भी सुनाती...। ऊँची से ऊँची हील की सैंडिल पहनकर कूल्हे मटकाती, कैट वॉक में खट्-खट् की आवाज करती हुई जब वह जाती लड़के उसकी खट्-खट् आवाज से गिनती गिनते। उसका कहना होता जब तक मैं पूरे छब्बीस अल्फाबेट के हिसाब से अपने दीवाने नहीं बना लूँगी मुझे अपने कमसिन होने में सन्देह रहेगा।

अरे! ये क्या कह रहे हैं आप उसके घर में कोई नहीं है..। नहीं-नहीं, उसके घर में सब हैं मम्मी-पापा, भाई-बहन...। अब आप पूछेंगे कि ये फ्लर्ट क्यों करती है? तो सुनिए यही तो उसका शौक है...उसका कहना है कि पुरुष फ्लर्ट करते थे पर अब ये मोर्चा लड़कियाँ संभाल चुकी हैं।

सौदामिनी की मम्मी रजनी उसे खूब समझातीं और चाहतीं कि वो आदर्श लड़की बने..पर वह मॉड बनकर रहती...। पापा के ऑफिस जाते ही उसकी फिक्सिंग, डेटिंग सब शुरू हो जाती। मम्मी को मनाकर वह उन्हें अपने पक्ष में कर ही लेती और रेस्तराँ, होटल कैफे जाने में सफल हो जाती। मम्मी की सारी कोशिशें नाकामयाब हो जातीं। वे धर्म-संकट में उलझकर रह जातीं। ट्रीट देना और ट्रीट लेना उसकी दिनचर्या थी। इस समय उसके एक-दो नहीं पूरे चार मित्र हैं.. सभी के साथ वह अपने तरीके से घूमती-फिरती और मौज-मस्ती करती। मम्मी बेहद चिन्तित रहतीं...यदि संख्या एक होती तो उसके साथ ही शादी कर दी जाती लेकिन यहाँ तो अजीब उलझन है...।

''बेटा इनमें से किसी से शादी करने का तेरा मन हो तो बता मैं पापा से बात कर लूँगी..'' मम्मी समझाते हुए उसके समक्ष प्रस्ताव रखतीं।

''मम्मी शादी तो मैं तुम्हारी ही मर्जी से करुँगी... ये तो फॉर मीन टाइम हैं...'' वह हँसते हुए उत्तर देती।
''पर अब तुम्हारी शादी के लिये उम्र हो गयी है'' वे घिघियाती सी बोलतीं।

''ओह नो मम्मी ! ये वक्त अभी शादी-वादी करने का नहीं है... अभी तो जिन्दगी के मजे लेने दो...अभी कौन सी उम्र बीती जा रही है...।

''लेकिन तेरा इस तरह रोज-रोज लड़कों के साथ घूमना मुझे अच्छा नहीं लगता..फिर पापा को पता चलेगा तो आफत हो जायेगी...।''

''ओ शिट ! ... मॉम बोर मत करो... तुम्हें अपने समय में चाहने बाले नहीं मिले होंगे...देखो कितना मजा आता है...जब चाहने वाले लोगों की लाइन लगी रहती है..सबके सब फूलिश...सबको तड़पते देखकर मन को अजीब-सी सन्तुष्टि मिलती है,'' कहते हुए वह बैग हवा में लहराती चल देती।

आए दिन वही घिट-पिट... कभी छोटे भाई से तो कभी मम्मी से उसकी बहस होती...भाई मम्मी को उलाहना देता,''तुम उसे रोकती क्यों नहीं? ..मेरे दोस्त मुझ पर व्यंग्य करते हैं...कहते है तेरी बहन तो आवारा है..''
''मैंने उसे बहुत समझाया ...'' माँ हथियार डाल देतीं।

'मम्मी वो एक ही लड़के के साथ घूमे तो मैं बात संभाल लूँ..पर उसके साथी तो रोज बदलते हैं...तुमने ही उसकी तारीफ कर-करके उसे सिर पर चढ़ा लिया हैं। ...तुम्ही कहती थीं न -तू मेरा चाँद है मैं तेरा आसमान हूँ...।''
रजनी निरुत्तर हो जाती...

''इतना ही नहीं सारे होटल और रेस्तराँवाले उसे पहचानते हैं...उन लोगों की फब्तियों के कारण मेरा वहाँ जाना मुश्किल हो गया है।'' उसने जोर देते हुए कहा

रजनी चुपचाप किचिन में चली जाती.. ये तो सिर्फ उसे ही मालूम है कि ज्यादा रोक-टोक करने पर उसका आखिरी उत्तर होता...ज्यादा तंग करोगी तो मैं घर से भाग जाऊँगी...उसकी इस धमकी से वो भयभीत हैं...वो तो सिर्फ यही चाहती हैं घर की इज्जत घर में ही बनी रहे...आँखों के आगे बनी रहेगी तो तसल्ली रहेगी...यही सोचकर वे शांत हैं...पर अन्दर कितना उबाल है ये किसे बतायें... पति को बताती हैं तो स्थिति और अधिक खराब होने का डर है..।

फोन कॉल्स आने की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है...जिसका भी फोन आता वह कहता 'मिनी' से बात करना है।...रात को ब्लैंक कॉल्स आने लगे...जगजाहिर बात पिता को भी पता लग गयी कि बेटी युवा हो गयी है...रात में फोन का रिसीवर अलग हटाकर रखा जाने लगा। रात का सन्नाटा चीरती फोन की घण्टी दिल की धड़कनों को बढ़ा देती थी। तूफान ऐसा कि कब आ जाये और कहाँ जाकर थमे कहा नहीं जा सकता...। बस एक बात अच्छी थी सौदामिनी में ...किसी को भी शरीर टच नहीं करने देती ...इस मामले में वह कठोर थी बिल्कुल पाषाण... उसके सब दोस्तों को यह बात मालूम थी। ....कोई उसके कन्धे पर भी हाथ रख देता तो.. वह एकदम बिजली की तरह उसे करेंट मारती हुई उसे झटक देती ...साथ ही हिदायत भी कि आगे ऐसा न हो...।

सौदामिनी की एक घनिष्ट सहेली थी 'नीरा'। दोनों लॉ कर रही थी...नीरा अधिकतर सुमित के साथ कैफे हाउस जाया करती ...यहीं सौदामिनी का परिचय सुमित से हुआ...। हृदय की अनन्त गहराइयों से एक दूसरे का प्यार करते थे सुमित और नीरा....उन दोनों की परस्पर प्रणय भावनाओं को देख वह रोमांचित हो जाती...उनके प्यार को देख उसके हृदय में भी प्रेम भाव हिलोरें लेने लगा..। उसे अहसास होने लगा, दोस्ती और प्रेम में अन्तर होता है..उसके मन में जिज्ञासा होने लगी कि जो उसके दोस्त है वे सिर्फ दोस्त हैं या उसे प्यार भी करते हैं...। सुमित नहीं चाहता था कि नीरा किसी और लड़के की तरफ देखे या नीरा को कोई अन्य लड़का ध्यान से देखे ...उनका प्यार एक पर जाकर एक पर ही ठहर गया था...यह देख सौदामिनी प्रेम की गहराइयों को समझने लगी थी। उसके दोस्तोंी को कोई परवाह नहीं कि वह किसके साथ जा रही है...किसको देख रही है.. प्रेम में विद्वेष और प्रेम में ईर्ष्या का भाव वहाँ शून्य था...।

कुछ दिन ही बीते थे कि नीरा बदहवास सी उसके पास आयी..रोते-रोते उसने बताया घरवालों ने उसकी शादी कहीं और तय कर दी है। ...उसमें इतना साहस नहीं था कि वह सुमित का सामना कर उसे वस्तुस्थिति बता सके...वह खुद उसे टूटते हए नहीं देख सकती थी...उसने सौदामिनी को जिम्मेदारी दे दी कि वह सुमित को सब बता दे और उसका ख्याल भी रखे..। मन के किसी अज्ञात कोने में सौदामिनी भी उसका साहचर्य चाहती थी...सुमित का एकनिष्ठ प्रेम और प्रेम की विह्वलता देखकर उसके मन में उसके प्रति सम्मान था। सुमित को जब नीरा के विवाह की बात पता चली तो वह फूट-फूटकर रोने लगा...एक पुरुष को प्रेम में पागलों की तरह रोते देख उसकी समस्त पाषाण आधुनिकता खण्ड-खण्ड हो गयी ...एक नारीत्व भाव मन में पैदा हो गया जिसमें सहानुभूति थी...निश्छलता थी.. और अपनापन...।

सुमित को संभालना उसकी जिम्मेदारी... सो वह ज्यादा से ज्यादा वक्त उसके साथ गुजारने लगी...उसके दुःख को कम करने का प्रयास करने लगी...। किसी की इच्छा-अनिच्छा को महत्व न देकर अपने अहं को पूरा करने वाली मिनी अब सुमित की पसन्द-नापसन्द का ख्याल रखने लगी...। लव शब्द का मतलब भी वह अब समझ पायी थी और उसे जीवन में उतारने के लिए पूरे मनोयोग से प्रयासरत भी...। उसकी आँखों में आँखें डालकर सुमित ने पूछा, '' लव शब्द का अर्थ जानती हो?''

''नहीं''

''स्'' से होता है ''संम वति `जिमंते ..(लेक ऑफ टीयर्स)

''मतलब''

''आँसुओं की झील''

''और व् से''

''व्बममद व`विवततवू .....(ओसीन ऑफ सोरो)''

''अरे वाह ! ट से''

''टमससमल व`किमंजी .....(वैली ऑफ डैथ)''

''............''

''म्से म्दक व`जिम सपमि ..(एण्ड ऑफ दा लाइफ)''

''हूँ....'' वह चहक उठी थी...

सुमित के दुःख को दूर करते-करते वह भावनाओं के आवेग में इतनी दूर निकल आयी कि उसका लौटना मुश्किल हो गया...। जब सुमित ने कहा,'' अरे! तुम्हें स्पर्श करने वाला मैं ही प्रथम पुरुष हूँ...मैं तो सोच रहा था तुम्हारे इतने अधिक पुरुष मित्र हैं तुम तो जूठन होगी...।''

''उस रात सौदामिनी रात भर सोचती रही.. मैंने तो सोचा था जो मुझे स्पर्श करेगा ..मैं उसी से शादी करूंगी...यही वजह है कि अब तक कोई भी दोस्त उसे स्पर्श नहीं कर पाया... अब ...अब क्या होगा ?..मुझे सुमित से बात करना चाहिए...सुमित ने मना कर दिया तो...नहीं वह भी अब मुझे चाहता है...नीरा उसका कल थी ..मैं उसका आज हूँ...'' सोचते-सोचते वह सो गयी।

सौदामिनी ने सुमित से बात की ..वह शादी के लिए तैयार हो गया..। परिवार वालों की सहमति मिलते ही उसका वैवाहिक जीवन शुरु हो गया...। कोई मना भी क्यों करता..परिवार के लोग उसका विवाह कर उससे खुद छुटकारा पाना चाहते थे..। सौदामिनी जिन्दगी को जितनी सहज, सरल और सुखद समझ रही थी वह उतनी ही अधिक पथरीली,ऊबड़-खाबड़ और कठिन थी। शादी के कुछ दिनों बाद उसे जीवन की सत्य और जटिल विभीषिकाओं का सामना करना पड़ा... वह पुरुष को जितना सरल, निश्छल और कोमल समझती थी ..उसकी सोच गलत साबित हुयी। शादी से पहले सुमित उसे सब तरह के परिधान पहनने देने को तैयार था पर अब 'मिनी' को ऐसे कपड़े पहनने देने में आपत्ति ही नहीं कड़ा विरोध था...। परिवार अच्छी तरह चले और वैवाहिक जीवन टिकाऊ बना रहे इसलिए मिनी ने समझौता करना शुरू कर दिया। सुमित ने उसका मायके जाना बन्द कर दिया वह उसे अपने साथ ले जाता..और अपने साथ वापस लिवा लाता..। मिनी का आग्रह रहता, ''मैं दो -चार दिन मम्मी के पास रहना चाहती हूँ।''

'मुझे तुम्हारे बिना घर काटने को दौड़ता है.. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाता..'' वह दलील देता।

सौदामिनी के पापा का एक्सीडेन्ट हो गया। मिनी ने उसे खबर देने के लिए ऑफिस फोन लगाया वह मीटिंग में था। उसके लिए मैसेज छोड़ वह अकेले ही पापा को देखने चली गयी...शाम को सुमित ने वहाँ पहुँचकर सबके सामने उसे डांटते हुए कहा- इतनी क्या जल्दी थी आने की?... तुम कोई डॉक्टर तो नहीं थीं..कम से कम मेरा इन्तजार कर लिया होता...'' तब मिनी को ज्ञात हुआ कि मायके अकेले न जाने देना उसका असीम प्यार नहीं बल्कि उसके अन्दर बैठा शक का पुरुष था, जो यह स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि पहले और आज की सौदामिनी में बहुत अन्तर आ गया है...। सुमित को हमेशा शंका रहती ...मिनी मायके जायेगी तो वहाँ अपने पुराने मित्रों से मिलेगी...सुमित का शक दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था। पार्टी में भी वह हमेशा उसके साथ चिपका रहता। वह न किसी के साथ आत्मीयता से बात कर पाती और न ही अपनापन व्यक्त कर पाती। कुछ बातें ऐसी होतीं जिन्हें वह सुमित की अनुपस्थिति में अपनी सहेलियों पर व्यक्त करना चाहती ...हर आदमी उसे 'मिनी' का दोस्त नजर आता... हर देखने वाले की आँखों में उसे मिनी के प्रति आकर्षण दिखाई देता...। स्वतंत्र विचारों की पक्षधर मिनी इन सारे बन्धनों से अब ऊब गयी थी। जिन्दगी बासी, लिजलिजी और खोखली नजर आने लगी। अपने बीते दिन याद करके उसके मन में कसक और वेदना भर जाती। उसे कहीं कोई अन्त दिखाई नहीं देता...कैसे वह सुमित को विश्वास दिलाए कि उसका शक गलत हैं। काश! 'विश्वास' क्रय करने की वस्तु होती तो वह प्रचुर मात्रा में खरीदकर सुमित को उपहार में दे देती। वह कैसे विश्वास दिलाए कि उसको स्पर्श करने वाला वह ही प्रथम पुरुष है और जो अन्तिम भी...उसकी निष्ठा केवल सुमित में है।

जीवन की गति रुक गयी थी ..दिन महीने...और महीने.. वर्ष प्रतीत होने लगे। प्रेमरस की फुहार समाप्त हो गयी...नीरसता और बेरुखी ने अपना डेरा जमा लिया...क्रोध, झुंझलाहट हर कोने में दिखाई देने लगा।

एक दिन सौदामिनी ने किसी पत्रिका में रेसेपी पढ़कर मलाई कोफ्ते बनाए... उसका पहला प्रयास ...और फिर वो पाक कला में निपुण तो थी नहीं...मलाई कोफ्ते बिगड़ना थे सो बिगड़ गए। वह सोच रही थी सुमित को नई डिसेज बनाकर खिलाऊँगी तो उनका मूड भी अच्छा हो जायेगा।

सुमित ने जैसे ही पहला कौर खाया... वह चिल्ला पड़ा,''ये क्या खाना बनाया है... बनाना नहीं आता तो क्यों बनाती हो...ऊपर से सामान खराब करती हो।

वह घबड़ा गयी.. उसके ये तेवर उसने पहले कभी नहीं देखे थे, वह धीरे से बोली-''जी ..वो...वो..पत्रिका से पढ़कर बनाने की कोशिश की थी।''

सुमित भी कब चुप रहने वाला था वह व्यंग्य करते हुए बोला,'' तुम्हें क्यों बनाना आएंगे...कभी खाना बनाया हो तब तो आए... कॉफी हाउस और रेस्तराँ से फुर्सत मिली हो कभी तब तो कोई सीखेगा...एक झूठी हड्डी गले में आकर पड़ गयी है ...जैसे साँप के मुँह में छछूंदर...न तो उगलते बनता है और न निगलते...। ''

सुनकर सौदामिनी अवाक् रह गयी। कभी हार न मानने वाली मिनी की आँखों से आँसू बह निकले...। वह रोते हुए बोली, ''आपने खुद स्वीकार किया था कि मुझे किसी ने स्पर्श नहीं किया ...आप अब मुझे जूठन कह रहे हैं...''

उसे झिंझोड़ते हुए सुमित बोला,''स्पर्श कई तरह के होते हैं देवीजी....'' कहता हुआ वह कमरे से बाहर चला गया।

सारी रात मिनी बिस्तर पर करवटें बदलती रही... उसे याद आया जब उसने पहली बार खाना बनाया था, तब सुमित उसे गोद में उठाकर खुशी से झूम उठा था और बोला था, ''मिनी तुम इतना अच्छा खाना बना लेती हो मैं तो कभी सोच ही नहीं सकता ...इतनी मॉड होते हुए तुम पाककला में निपुण हो ...।'' सुमित ने उसकी तारीफ के पुल बाँध दिए...इस बात की उसने अपने दोस्तों के सामने भी प्रशंसा की।

लेकिन आज का यह रूप ! यह भी एक सच्चाई है उसके मन में द्वन्द्व चल रहा था... क्या सुमित के मन का शक उसकी सब अच्छाइयों पर हावी हो गया है...वो ये क्यों नहीं सोचता कि मैंने कोई गलत काम नहीं किया...दोस्तों के साथ घूमना यदि अपवित्रता की निशानी है या शक की परिधि मे आता है तो ये खुशनुमा गलतियाँ तो उसने की हैं...। वह कौन-सी परीक्षा दे जिससे सुमित के मन के शक की दीवार खण्डहर हो जाए और वह उसके मन में फिर से नया बसेरा बना सके। उसकी सोच निरन्तर जारी है....नारी के विवाह के पूर्व की सच्चाइयाँ पुरुष कभी अंगीकार नहीं कर पाता जबकि पति के पूर्व जीवन की सच्चाइयाँ और यहाँ तक कि बुराइयाँ भी पत्नी शिरोधार्य कर लेती है... सब कमियों के बावजूद वह पति को परमेश्वर ही मानती है...यहाँ तो पुरुष अर्धांगिनी ही मानने को तैयार नहीं है। ....

.....ठीक ही तो है...बलात्कार हमेशा नारी का ही होता है, पुरुष का कभी बलात्कार हुआ है?...पुरुष ही तो बलात् (जबरन) स्त्री से कोई कार्य करवाता है...स्त्री कब पुरुष से बलात् कोई कार्य करवा पाती है...और सुमित..! उसके भी तो नीरा से घनिष्ठ संबंध थे...सुमित भी तो नीरा को 'मेरी स्टोप्स' क्लीनिक लेकर गया था..जहाँ उसका अबॉर्शन करवाया था....क्या सुमित जूठन नहीं है?..कम से कम मैंने तो ये सब नहीं किया...एक के साथ ही शारीरिक निर्वाह किया है..उसका मंथन जारी था...आखिर पुरुष, पुरुष होता है...उसका अहं, उसका पुरुषार्थ विशेषकर उसका पतित्व कभी समाप्त नहीं होता...ये पत्नी की सबसे बड़ी भूल है कि वो अपने पति को गुजरे कल के बारे में बता देती है...पुरुष का हृदय इतना विशाल कहाँ होता है, जो वह सारी बातों को सहेजकर रख पाए...वो तो नारी ही है जो सारा विषपान कर लेती है..ऋषि गौतम ने अहल्या को माफ नहीं किया...जबकि उसकी गलती न होकर इन्द्र की थी...सोचते -सोचते न जाने कब सुबह हो गयी उसे पता ही नहीं चला..।

घण्टाघर से आती हुई ध्वनि भी छः बजने का संकेत दे रही थी..। मिनी कमरे से उठकर बाहर आयी तो सर्द पवन का झोंका चेहरे को छूता हुआ लट कपोल पर बिखेर गया। ये लटें वह अपनी सौन्दर्य वृद्धि के लिए चेहरे पर डाल लेती थी...आज उन्हीं लटों को उसने बेरुखी से पीछे कर दिया। ठण्डी हवा मन के कोने-कोने को छू रही थी... उसे लगा अन्तस् में कुछ जम-सा रहा है.. और शरीर बेजान और निश्चल हो रहा है...कमरे में सामान बिखरा छोड़ वह किचिन में आ गयी और नाश्ते की तैयारी करने लगी..।

दिन अनमना सा बीता...सुमित से अनबोला चल रहा था...पर सब कुछ रोज की तरह काम हो रहा था..यंत्रवत्...पूर्ववत्...।

शाम का धुंधलका घिरने लगा..'मिनी सुमित के आने का इन्तजार कर रही थी..। सुमित थके हंए कदमों से आया और सोफे पर ढेर हो गया..मिनी ने बिना बोले हो पानी का गिलास मेज पर रख दिया...और चाय बनाने चली गयी...एक अजीब घुटन कमरे में फैली थी..। रात्रि में सुमित को बॉस के यहाँ पार्टी में जाना था...उनकी बेटी की शादी थी..। यदि वह मिनी को नहीं ले जायेगा तो बॉस नाराज हो जायेंगे। उसने रूखे शब्दों में कहा,' 'तैयार हो जाओ...शादी में जाना है..।''

मिनी सामने सोफे पर बैठी पत्रिका के पन्ने पलट रही थी उसने अनसुना कर दिया....आखिर उसका भी अस्तित्व है...।

सुमित ने मौके की नज़ाकत समझी...वह उसके पास आया और कन्धे पर हाथ रखकर बोला, '' अच्छा बाबा कल का गुस्सा थूक दो...आकर बात करेंगे...चलो जल्दी से तैयार हो जाओ...।''

मिनी के लिए इतना ही काफी था। वह उठी और जल्दी से तैयार होने लगी..। आज उसकी तैयारी में अलग ही स्फूर्ति थी..। मन थोड़ा सा प्रसन्न हो गया था इसलिये खूब मन लगाकर तैयार हुई.. चे हरे पर मॉक्सराइजर..पलकों पर मस्कारा..गालों पर रूज और ब्रश का प्रयोग..होठों पर लिपस्टिक और शेडो स्टिक ..आँखों पर आई लाइनार लगाया...और चेहरे पर आगे की ओर एक लट छोड़ दी....हर देखने वाले को डँसने के लिए।

सुमित ने उसे देखा तो कह उठा, ''मिनी यू आर लुकिंग वैरी ब्यूटीफुल..''

मिनी ने कुछ नहीं कहा.. बस पलकों को झपक दिया, जैसे थैंकयू कह रही हो..।

विवाह में गहमागहमी थी.. सुमित और मिनी हाथों में हाथ डाले अन्दर आये..। सुमित के दोस्तों ने उसे घेर लिया...वे मिनी की तारीफ करने लगे...सुमित मन्द-मन्द मुस्कराता रहा..। मिनी यह अन्दाजा नहीं लगा पा रही थी कि वह वास्तव में अन्दर से भी उतना खुश है जितना बाहर शो कर रहा है..उसे दूसरों के द्वारा मिनी की सुन्दरता की तारीफ करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता..। इन सबमें उसे सुमित के प्यार की गहराई नजर नहीं आती थी। उसे लगता कि सुमित का वश चलता तो वह मिनी का चेहरा काला करके लाता...।

वे दोनों आगे बढ़ गये..सुमित के मोबाइल की घण्टी बजने लगी..सुमित उससे 'अभी आया' कहकर उसे अकेला छोड़कर चला गया..। कुछ देर बाद मिनी की नजरें उसे भीड़ में खोजने लगीं...उसे अपने पड़ौस का लड़का अजय दिखायी दिया..इत्तफाक से उसने भी मिनी को उसी समय देखा, नहीं तो वह उसे अनदेखा कर पीठ करके खड़ी हो जाती..। वह उसके पास आ गया ..मजबूरी में वह मुस्करायी...। अजय बोला, ''आज बहुत सुन्दर लग रही हो,..।''

उसी वक्त सुमित का वहाँ आना हुआ.. उन दोनों को हँसता देखकर सुमित का चेहरा तमतमाने लगा.. मिनी उसके चेहरे को देख सकपका गयी...। उसने अजय का सुमित से परिचय करवाया..। सुमित ने अजय से इजाजत ली... वह मिनी का हाथ पकड़ लगभग घसीटते हुए उसे बाहर ले आया और बोला, '' बस बहुत हो चुका ..अब घर चलो..''

तभी बाहर एक दोस्त मिल गया बोला ,'' चल यार खाना तो खा ले...।''

''नहीं यार मिनी की तबियत अचानक खराब हो गयी है.. उसे घर ले जा रहा हूँ..''

सौदामिनी सोच रही थी कि कह दे तबियत मेरी नहीं इनकी खराब हुयी है...दूसरों की तारीफ का बिच्छू जो डँस गया है..। रास्ते भर वह अन्दर ही अन्दर उफनती रही..भूख लग रही थी सो अलग...।

घर आते ही वह दहाड़कर बोला, ''अब अपने शरीर का और अंगों का प्रदर्शन बन्द करो... एक तो पहले से ही जूठी हो और अभी भी दूसरों की नज़र में जूठा होने में शर्म नहीं आती..ज्यादा ही सजने-सँवरने का शौक है तो एक कोठा खोल लो ...बैठी रहना उसमें सजी-धजी ...फिर आयेंगे तुम्हारे सौन्दर्य के उपासक...।''

सौदामिनी सब कुछ सहन कर गयी पर आज कोठे बाली बात सहन नहीं हुयी। अन्दर का तूफान उमड़कर बाहर आ ही गया। वह भी लगभग चीखते हुए बोली, ''मिस्टर सुमित ! मैं बहुत सुन चुकी हूँ तुम्हारे ये शब्द जूठन...जूठन...जूठन...। जूठन तो एक तरह से तुम भी हो ....तुम्हारे और नीरा के क्या संबंध थे ...खुद अपने दिमाग पर जोर डालो..तुम नीरा को मेरी स्टोप्स क्लीनिक ले गये थे उसका अबॉर्शन करवाने....कम से कम मैंने वैसा तो कुछ नहीं किया...जो कुछ किया तुम्हारे साथ किया...घूमना-फिरना अपवित्रता नहीं है...और यदि है तो सब कुछ जानते समझते तुमने मुझसे शादी क्यों की?''

पुरुष सब कुछ सहन कर सकता है, अपने ऊपर आरोप सहन नहीं कर सकता...उसका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया....उसने आव देखा ना ताव एक जोरदार थप्पड़ उसके गाल पर माऱ दिया। सौदामिनी इस आक्रामकता के लिए तैयार नहीं थी..वह भी मर्द के हाथ का...क्रोध भरा जोरदार थप्पड़ ...जैसे ही उसके गाल पर पड़ा वह विपरीत दिशा में घूम गयी और टेबिल लैम्प पर जा गिरी...। उसका चेहरा लैम्प से जा टकराया..। चारों तरफ काँच ही काँच बिखर गया..। सौदामिनी ने अपना चेहरा हाथों से टटोला तो गाल खून से लथपथ था..वह यह देखकर बेहोश हो गयी।

सुमित भी घबरा गया...जल्दी से वह उसे लेकर हॉस्पीटल पहुँचा...

सौदामिनी को जब होश आया देखा चेहरे पर पट्टी बँधी है..अपना चेहरा दर्पण में देखकर वह फूट-फूटकर रोने लगी...। उसकी मम्मी पास में खड़ी थीं...उसने पूछा,''मम्मी टांके आये हैं क्या?''

'' ज्यादा नहीं बेटा, सब ठीक हो जायेगा...'' मम्मी ने सांत्वना देते हुए कहा। वह रोते हुए उनके गले लग गयी और बोली,''मम्मी तुम खुद को आसमान और मुझे चाँद कहती थीं न ...देखो आज चाँद को दाग लग गया...''

रजनी कुछ नहीं बोल पा रहीं थीं.. सुमित ने बताया था कि नींद में मिनी टॉयलेट जा रही थी टेबल लैम्प के तार में पैर उलझ गया...वह गिर गयी और बल्व से टकरा गयी...। दूसरे गाल पर उंगलियों के निशान देख रजनी समझ गयी थी कि कौन सी टकराहअ हुयी थी घर में...। माँ का ममत्व उमड़ रहा था... वह नजरें बचाकर उसे बिखरते हुए देख रही थी...आसमान अपने चाँद पर लगे हुए दाग को निर्विकार भाव से देख रहा था। रजनी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे...।

रजनी डॉक्टर से मिलने चलीं गयीं।

सौदामिनी के अन्दर तूफान उठ रहा था. ..मैंने बहुत सहन कर लिया..अब तो हद पार हो गयी ...मैं हमेशा यह सोचकर समझौता करती रही कि घर बिखरने नहीं पाये...। यदि अलगाव आया तो सब मुझे ही दोष देंगे...सब मुझमें ही कमी निकालेंगे...हमारे समाज में चाहे गलती पुरुष की ही क्यों न हो स्त्री को ही दोषी ठहराया जाता है...अब तो मुझे ही कोई कठोर कदम उठाना होगा...जब मन ही नहीं मिल सकते तो दुनिया को दिखाने के लिए साथ रहने से क्या फायदा...? समाज..दुनिया कुछ कहे तो कहते रहें इन सबकी मुझे पहले भी परवाह नहीं थी..समाज के नियम पुरुष के पक्षधर हैं...।जहाँ मेरा सम्मान नहीं उस घर में मैं रह नहीं सकती...मेरा भी अस्तित्व है..उसको बचाने के लिए मैं सारे प्रयत्न करूँगी...सुमित को भी नहीं बख्शूँगी...।

आहट हुई तो उसकी विचार-तंद्रा भंग हो गयी...मम्मी आ गयी थीं...।उन्होंने बताया, ''डॉक्टर ने तुम्हें डिस्चार्ज कर दिया है...'' मोबाइल उठाते हुए बोलीं, ''मैं सुमित को फोन लगाती हूँ..।''

सौदामिनी ने उनका हाथ पकड़लिया और मना करते हुए बोली, ''नहीं मम्मी उसे मत बताओ मैं उस घर में नहीं जाऊँगी...अब में उसके साथ नहीं रहूँगी..'' फिर प्रश्न करते हुए बोली,''क्या में आपके साथ चल सकती हूँ..?''
'...हाँ बेटी क्यों नहीं...'' रजनी की आँखें भर आयी थीं। उसे गले लगाते हुए बोलीं ,''वो आज भी तुम्हारा घर हैं...बेटी परार्इ्र जरूर होती है पर दिल में रहती है..।.''

''मम्मी मैं पहले महिला थाने जाना चाहती हूँ...'' सुनकर हतप्रभ हो गयी रजनी... समझाते हुए बोलीं, ''नहीं बेटा छोटी-छोटी बातों को घर के अन्दर ही सुलझा लेना चाहिए..।''

''मम्मी ! पत्नी पर हाथ उठाना छोटी बात नहीं है...हम पत्नियाँ बेवजह क्यों प्रताड़ित हों..थाने में जायेगा तो सब अकल ठिकाने लग जायेगी..''

'बेटी बात करने से मामला सुलझ जाये तो बात करके देख ले...'' वे चिन्तित होकर बोलीं।

''मम्मी मैंने उसे बहुत समझाने का प्रयास किया है..थोड़ा बहुत कानून मैंने भी पढ़ा है.. पत्नी को मारना या अपशब्द कहना घरेलू हिंसा में आता है, धारा 12 लग गयी तो बच्चू को छह माह की जेल हो जायेगी..''

''थोड़ा और सोच-विचार कर लेती बेटी...'' रजनी घिघियाने लगी..।

''मैं तो उसे 498 ए लगवाऊँगी, दो वर्ष के कारावास में होश ठिकाने आ जायेंगे जिन्दगी भर किसी पर हाथ नहीं उठाएगा...'' क्रोध में उफनती वह बोली।

उसने पापा से बात की। महिला थाने जाकर उसने रिपोर्ट दर्ज करायी। जब सुमित ने यह सुना तो उसके होश उड़ गये...

शाम को वह राजीनामा करने के लिये सौदामिनी को मना रहा था, कई सारी कसमों-वादों और मनुहार के साथ...

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