१-

पहले बोलते थे तुम्हारे शब्द
सुनता था मेरा मौन -
उन स्वरों में
मुखरित उपालंभ;
वह बेपरवाह जुमले भी
जो उछल जाते थे -
मेरी तरफ .......इरादतन
धीरे धीरे चुकने लगे तुम्हारे शब्द ;
होते गए अर्थहीन -
सब सन्दर्भ- प्रसंग
और मेरा मौन ...........
धैर्य और त्याग की लपटों में
तपता रहा, निखरता रहा
दिनबदिन .......सोने सा
अब चुप हैं तुम्हारे शब्द -
और बोलता है मेरा मौन!

२-

कसमसाते अनकहे उद्गार
खटखटाते हैं तड़पकर
चेतना के द्वार
तन्द्रिल अलस अभिव्यक्ति
भी लेती तभी अंगडाइयां
ज्यों सुलग उठे
दबे अंगार
शब्द चुन लो
जाल बुन लो
बस अबोला
यह  मिटा दो
बढ़ चला है
मौन का विस्तार
जागरण के राग
होठों पर खिले
जड़ हुई संवेदना को
स्वर मिले
क्रांति के आह्वान से
गूंजे सकल  संसार

३-

दरवेश से भटकते  हैं मेरे सपने
यादों के गलियारों में,  दरबदर
चलते चलते ;
समय के किसी मोड़ पर -
ठिठक जाते हैं अचानक,
वहां ............
बदल जहाँ गयी
जीवन की दिशा
जहाँ ढल गयी थी -
स्वर्णिम उषा
सहेज लेते हैं -
उदासियों के वो पल
अपनी झोली में ;
और करुणामयी मुस्कान सजाकर
निकल पड़ते हैं अपनी चिर यात्रा पर!

४-

सब दिशाएं मौन हैं
चंचल हवाएं मौन हैं
दर्द भी पथरा गया -
आकुल व्यथाएं मौन हैं
जुल्म होता देख
कुछ भीतर सुलगता ही नहीं ;
सुगबुगातीं थीं जो- वे संवेदनाएं मौन हैं

इस मुखौटों के शहर में
हो गए चेहरे दफ़न
बिक गए एहसास सब
बेनूर खुशियों का चमन
अब तलक जो जोड़तीं थीं -
दिल से दिल के तार को
धड़कनों से उठने वाली वो सदायें मौन हैं

यह व्यवस्था राक्षसी-
लूटे प्रजा का चैन है
सत्ता पर काबिज़ लुटेरे
लूटते दिन-रैन हैं
दाल रोटी के लिए, संघर्ष जो करना पड़ा -
अब तरक्की की सभी संभावनाएं मौन हैं

कुर्सियों की होड़ में
नेतृत्व रहता व्यस्त है ;
प्रशासन बदहाल ऐसा  -
आमजन संत्रस्त है
हर घड़ी पाबंदियों का स्वांग जो भरती रहीं
मद के नंगे नाच पर -वह वर्जनाएं मौन हैं

५-

युगों युगों से है
सृजन की प्रेरणा
समष्टि में
कोई तो है
जो भर रहा
सुहाने रंग
सृष्टि में
कि जिसकी
दिव्य तूलिका
से सज गई
दिशा दिशा
जो धड़कनों में
गा रहा
जिजीविषा.... जिजीविषा!
अपने अपने
मरुथलों में
चल रहे हैं हम सभी
अलग अलग
इबारतों में ढल
रहे हैं हम सभी ;
मरीचिका है
एक किन्तु,
एक सी
रही तृषा
जो व्यग्र हो पुकारती -
जिजीविषा .....जिजीविषा!

६-

अनगिन जल- मुक्ताएँ
रणों के सोने से -
निखर निखर जाती हैं
फेनिल उद्गारों सी
मन के तटबंधों पर
बिखर बिखर जाती हैं
इक नन्ही हलचल भी
विचलित जो कर देती -
भावों के उद्वेलित
ज्वार कहाँ ठहरे हैं ?
लहरें तो लहरें हैं!
वलय तरंगों के
स्वरलहरी सम बढ़ते है
अवरोहों ,आरोहों की
सीढ़ी चढ़ते हैं
वे उठती गिरती हैं -
शोर मचा देती हैं
दिल की सरहद पर
कब बैठ सके पहरे हैं?
लहरें तो लहरें हैं!

७-

अंधियारे की कुटिल हंसी से
स्वप्निल आशाएं थर्रायीं
चारों ओर भयंकर तम है
राह नहीं पड़ती दिखलाई
साथ मेरे वह ज्योति नहीं है
जिसे थाम आगे बढ़ जाऊं
जिसकी तेजोमय ज्वाला से
अंतर्मन का तमस मिटाऊं
बस नन्ही अभिलाषाओं के
टिम टिम करते जुगनूँ हैं
संग मेरे जो हँसते गाते -
आँखमिचौली खेल रहे हैं
खेल खेल में
उनको बस में कर लेती हूँ
झट उनको अपनी मुट्ठी में
भर लेती हूँ
जब अवसादों के घेरे में
मेरी सांस जकड़ जाती है
मेरे इन बंद हाथों से तब -
वह उजास फूट आती है
मुस्काकर कहती है ;
रजनी से रुक पाती भोर नहीं है
कितनी ही बाधाएं आयें -
तुम्हें हारना और नहीं है !

८-

महक महक उठे सपन
नेह के सुवास से
जिन्दगी की आस से
झिलमिला उठा गगन
इक  नए उजास से
इक नए प्रकाश से
मन में है हिलोर जो -
कह रही है थाम लो
चाव से , उमंग से
दोस्ती  की डोर को
अंतहीन वेदना धुल गयी
सुहास में, प्रेम के विलास में
खिल उठी कली कली
मुस्करा रहा चमन

९-

माना कि तुम्हारे तरकश में हैं
पैनी सच्चाइयों के तीर
और  तुम आमादा हो
वार करने पर
ताकि  दे सको
हर विफलता को भूल का नाम;
कठघरे में खड़ा कर सको
बिखरते वज़ूद की कराहटों को
और  लानत भेज सको -
सहमी हुई सम्वेदनाओं को
लेकिन कभी सोचा;
क़ि ऐसा करने से -
पुतेगी कालिख ;
तुम्हारे भी नाम पर
क्योंकि हमारे तार
उलझ गए थे आपस में,
कहीं न कहीं -
जाने अनजाने!

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