विजेन्द्र केवल हिन्दी कविता का एक बडा नाम ही नहीं हैं वे एक चित्रकार भी हैं। प्रस्तुत कविता उनके संग्रह "आधी रात के रंग से है जिसमें अपनी प्रत्येक रचना पर उन्होंने पेंटिंग भी बनायी है। 

ध्वस्त घर 

एक दिन
जैसे ही मुझे बुलडोजर नें ढहाया
सारे घरवासी
मुझे विपदा में
छोड भागे।

वे मेरे रक्षक थे
फिर भी मुझे बचा नहीं पाये।

क्रेन के लम्बे लौह हाँथ नें
मेरी मुंडेरों को
खसा डाला
और मेरी पसलियों का
भुरचट बना दिया।
मैं चीखा चिल्लाया
पर कौन सुने....!

मेरे रक्षक-
इधर-उधर बिखरे सामान को
बटोरने में लगे थे
बच्चे भयभीत
पडोसी भौचक्के थे!

दोबारा लौह हाँथ रेंगता आया
इस बार उसने मेरी रीढ
और कूल्हों को चटखाया
मैं पूरी तरह ध्वस्त था।

अब पूरा अमला
दूसरे घर ढहाने चला गया है।

मैं इस ध्वंस में बैठा
हर राहगीर को
अपनी त्रासदी सुनाता हूँ।

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