प्रणाम। आपसे पहले भी बात की थी, कौन सी एक आदत है जिससे आज के हिन्दुस्तान को बचना चाहिए। 

इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य रहा जातिवाद। और बड़ा दुर्भाग्य ये कि आज के राजनेता फिर से जाति की ही राजनीति कर रहे हैं। जाति के नाम पर सबसे बड़ा पाप हुआ है इस देश में।

आप पर नास्तिक होने का आरोप लगता है। 

एक सूक्त आपसे मैं कहना चाहता हूं। धर्म एव हतो हन्ति. धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। मनु स्मृति का सूक्त है यह। क्या मतलब है इसका...? ये कि मरा हुआ धर्म तुमको मार डालेगा। और जीवित धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा। तो कौन सा मरा धर्म है और जीवित धर्म क्या है... ? धर्म की अनुभूति थी। उसकी अनुभूति बड़े बड़े संतों को हुई... ज्ञानियों को हुई... प्रज्ञापुरुषों को हुई... महात्माओं को हुई... गांधीजी को हुई... टैगोर को हुई... राम को हुई ... कृष्ण को हुई... बुद्ध को हुई... मुहम्मद साहब को हुई। लेकिन बाद के लोगों ने तोते के समान उसको रटना शुरू कर दिया। तो आज जिस धर्म को लेकर तुम लोग चल रहे हो वो धर्म नही धर्म की लाश है..। उस लाश को जब तक घर से नहीं निकाला जाएगा तब तक संसार का कल्याण होने वाला नहीं है। आज का धर्म नहीं धर्म की लाश है..। लाश को कितने दिन रखा जाता है घर में ? धर्म के नाम पर क्या हो रहा है..। धर्म तो दिखता ही नहीं है संसार में... धर्म होता तो ये सब हो रहा होता क्या...?  कितने धर्म के नाम पर विचार बने संसार में उन्होंने क्या किया...? आदमी का खून बहाया और कुछ नहीं किया। जब तक इस धर्म की लाश को घर से बाहर नहीं निकालोगे तब तक संसार का कल्याण होने वाला नहीं है।

तो आप किसी भी धर्म को नहीं मानते?

मैं अपने आप को न हिंदू मानता हूं, न मुसलमान, न कोई और धर्म में आस्था रखने वाला। सिर्फ मनुष्य...। कवि का धर्म सिर्फ मनुष्य बनकर अपनी कविता के माध्यम से मनुष्य तक पहुंचना है... इसके अलावा और कुछ नहीं जानता मैं धर्म के बारे में। मैं किसी धर्म में विश्वास नहीं करता। धार्मिकता में विश्वास करता हूं मैं... धर्म मे नहीं। धार्मिकता बड़ी चीज़ है... धर्म के नाम पर तो लोग तिलक भी लगाते हैं, पूजा पाठ भी करते हैं, अजान भी करते हैं... पर धार्मिकता बड़ी चीज़ है..। 

जाति-पाति से बड़ा धर्म है। 
धर्म ध्यान से बड़ा कर्म है...।
कर्मकांड से बड़ा मर्म है..। 
मगर सभी से बड़ा यहां पर 
ये छोटा सा इंसान है। 
और अगर वो प्यार करे तो 
धरती स्वर्ग समान है। 
   
मैं दुनिया घूमा। आदमी दिखाई दिये तरह तरह के। कितनी शक्लें दिखाई दीं। कोई हिंदू दिखाई दिया, कोई हिंदू, कोई मुसलमान। एक इंसान नहीं दिखाई पड़ा। बस। 

एक गज़ल के दो-तीन शेर हैं। 

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए। 
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।।

आग बहती है यहां... गंगा मे झेलम में भी...।
कोई बतलाए, कहां जाकर नहाया जाए।।

मेरा मकसद है ये महफिल रहे रौशन यूं ही।
खून चाहे मेरा दीपों में जलाया जाए।।

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।।

मेरे दुख दर्द का तुझ पर हो कुछ असर ऐसा।
मैं रहूं भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।।

जिस्म दो होकर दिल एक हैं अपने ऐसे..।
मेरा आंसू तेरी पलकों से उठाया जाए।

गीत गुमसुम हैं, गज़ल चुप है, रुबाई दुखी।
ऐसे माहौल में नीरज को बुलाया जाए।।

कवि होना पूर्णता का प्रतीक है..। पूर्व जन्म का कोई बड़ा पुण्य होता है तब आदमी कवि बनता है..। क्यों..?  आत्मा के सौन्दर्य का शब्दरूप है काव्य। मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य..। 

अभी इतना ही। फिर कभी...।
  

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