समीक्षा: - वीरेन्द्र कुमार गुप्त

आप बीती सुनाने की ललक आदि मानव में  निश्चय ही रही होगी. बाद में सभ्यता के विकास के साथ अनेक विधाओं में जो विशाल साहित्य अस्तित्व में आया उसके स्रोत को इस नैसर्गिक ललक में खोजना अनुचित न होगा. हर व्यक्ति का मन अतीत में घटी घटनाओं तथा रिश्ते से जुड़े या सम्पर्क में आये लोगों की यादों से भरा मिलता है. पर व्यक्ति अपनी उन यादों को अभिव्यक्ति नहीं दे पाता और वे कंकड़ या मोती उसके साथ ही शून्य में खो जाते हैं. उसमें प्रवृत्ति नहीं होती या क्षमता नहीं होती. कथाकार रूपसिंह चन्देल में दोनों ही बातों की उपस्थिति का प्रमाण उनकी सद्यः प्रकाशित संस्मरण पुस्तक  ’यादों की लकीरें’ है जिसमें उन्होंने अपनी संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा को चित्रित किया है. यह श्लाघ्य है. 

अनेक महापुरुषों ने आत्मकथाएं लिखीं या अन्यों ने उनकी जीवन-कथाएं लिखीं पर अधिकतर उनमें श्रृखंलाबद्ध घटनाओं का सपाटपन मिलता है जबकि घटना को प्रेरित करने वाली परिस्थिति और निजी मानसिकता को अधिक महत्व मिलना अपेक्षित रहता है. रूपसिंह चन्देल के संस्मरणों में, जिनमें कुछ को रेखाचित्र कहना उचित होगा, यह कमी मुझे नहीं प्राप्त हुई. 

’यादों की लकीरें’  को लेखक ने दो खंडों में विभाजित किया है. पहले खंड में उन्होंने हिन्दी के कुछ शीर्ष साहित्यकारों को लिया है जिनके सम्पर्क में वह आये और जिनसे वह प्रभावित हुए अथवा उन्हें दिशा-बोध और प्रोत्साहन प्राप्त हुआ. ये हैं- नागार्जुन, भगवतीचरण वर्मा, विष्णु प्रभाकर, कमलेश्वर, शिवप्रसाद सिंह, शैलेश मटियानी, रमाकांत, कन्हैयालाल नन्दन, लक्ष्मीनारायण लाल, रमेश बतरा, प्रकाशक श्रीकृष्ण (पराग प्रकाशन),  रत्नलाल शर्मा, शिवतोष दास और राष्ट्रबन्धु. दूसरे खंड में उनकी अपनी संघर्ष-कथा है. कानपुर के एक गांव से निकलकर दिल्ली में एक प्रतिष्ठित साहित्यकार के स्तर तक पहुंचने की यात्रा. मैं सोचता हूं कि यह दूसरा खंड पहला होना चाहिए था. 

’यादों की लकीरें’ में लेखक का जीवन क्रमबद्ध रूप में वर्णित नहीं है. उन्होंने अपने बचपन से बाद तक के जीवन की कुछ घटनाओं को लेकर उन्हें आज के मानसिक स्तर पर जीने का रोचक प्रयास किया है. लगता ही नहीं कि लेखक ने कहीं भी कल्पना का पुट उनमें डाला है. लगता है जैसे सब कुछ हमारी आंखों के सामने घट रहा है और हम पाठक उस सब कुछ के साक्षी हैं. चन्देल जी की स्मरण शक्ति बहुत ही प्रखर है. इसका प्रमाण यह है कि उन्होंने कितनी ही घटनाओं की तिथियों का उल्लेख किया है. साथ ही वर्णन में आए पात्रों के हाव-भाव, बातचीत आदि भी मौलिक हैं, जो आज के चन्देल के लेखक द्वारा गढ़ी गई प्रतीत नहीं होती. विशेष बात यह है कि लेखक ने अपने या पात्रों के प्रति अपने उस अतीत के भावों को अपनी कलम पर हावी नहीं होने दिया है. यथातथ्यात्कता की पूरी रक्षा की है. दूसरी बात यह कि ये संस्मरण कथा या गल्प शैली में लिखे गये हैं. कथा में आवश्यक रस और चित्रात्मकता इनमें भरपूर है और पाठक आद्यंत इनसे बंधा रहता है. इस प्रकार ये संस्मरण केवल लेखक के निजी न रहकर पाठक के भी बन जाते हैं क्योंकि सभी के जीवनानुभवों की मूल प्रकृति एक ही होती है, केवल सतही विवरण ही भिन्न होते हैं. जिन विभिन्न चरित्रों के सम्पर्क में चन्देल  जी आए वे सभी हम सबके भी अनुभव में आए हैं और आते रहेंगे. यह मानना होगा कि लेखक ने विशेषकर गांवों में रहने वाले निम्नमध्यवर्ग के लोगों के यथार्थ जीवन, उनके सपनों, उनकी चिन्तन प्रक्रिया, उनके संघर्षों को बड़ी ही बारीकी और ईमानदारी से चित्रित किया है. उनकी उदारता, सहनशीलता, यहां तक कि क्रूरता भी इनमें उपेक्षित नहीं रह पायी है. 

’यादों की लकीरें’   में आये सभी चरित्र यद्यपि स्मरणीय हैं और अलग-अलग रंगों की छाप छोड़ जाते हैं पर कुछ चरित्र अविस्मरणीय हैं. इनमें  सत्यनाराण की मां (एक और कस्तूरबा), इकरामुर्रहमान हाशमी, तांगेवाला, चांदनी देवी (चंदनिया बुइया उर्फ चांदनी देवी), मामी, ’बड़ी दीदी’, सदन सिंह ’पिता’ (सपनों में पिता), बाला प्रसाद त्रिवेदी (पहला मित्र), ’शोभालाल’, मथाई सी.जे. प्रमुख हैं.  ये सभी चरित्र नैसर्गिक हैं, इनकी अंतःप्रकृति ने जैसा इन्हें बना दिया. ये सीधे जमीन से उगे पौधे हैं जिन्हें बाहरी खाद कभी नहीं मिली. ये चरित्र कृति की आत्मा हैं.

चर्चित कृति के प्रथम खंड के विषय में भी वही कहना होगा जो ऊपर कहा जा चुका है. हिन्दी साहित्य की जिन विभूतियों के सम्पर्क में चन्देल आये, उन्होंने उनके लेखक के विकास में किसी न किसी रूप में योगदान दिया. उन्होंने उन सभी के ॠण को मुक्तकंठ से स्वीकार किया है. इस प्रथम खंड को भी चन्देल ने कथा शैली में ही लिखा है जिससे इसकी ग्रहणशीलता बढ़ गई है. वैसे यह उल्लेख अनपेक्षित न होगा कि रूपसिंह चन्देल के कथाकार की किस्सागोई शैली उनकी विशेषता है और यह विशेषता इन संस्मरणों को दूसरे लेखकों के संस्मरणों से अलग करती है. पिछले तीस वर्षों के बीच रहे हिन्दी के साहित्यिक वातावरण का अच्छा आभास यह खंड दे जाता है.  मेरा मानना है कि हिन्दी में संस्मरण विधा के क्षेत्र में अधिक कार्य नहीं हुआ और जो हुआ भी है उसमें लेखकों की सपाटबयानी और स्वयं के महिमामंडन का आधिक्य ही परिलक्षित है. इस दृष्टि से रूपसिंह चन्देल के संस्मरण परम्परा को तोड़ते हुए सर्वाधिक मौलिक, स्वस्थापना से दूर और बेहद पठनीय हैं. इनका स्वागत होना चाहिए.

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वीरेन्द्र कुमार गुप्त
द्वारा प्रो. डॉ. प्रवीण कुमार गुप्त
डी-१०, हिल व्यू अपार्टमेंट,
आई.आई.टी. परिसर,
रुड़की (उत्तराखंड)
मो. नं. 09410164625

‘यादों की लकीरें’ – ले. रूपसिंह चन्देल
भावना प्रकाशन, 109-A, पटपड़गंज,
दिल्ली -११० ०९१

कवर – राजकमल
पृष्ठ – 184,  मूल्य :300/- 
संस्करण - २०१२

2 comments:

  1. Viredra Kumar dwara likhee yadon kee lakiren par bahut achchhi samiksha padi,ismen sabhee cheejon ko ek-ek kar uker diya hai jisse pathak ko padne ke liye majboot karega,badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  2. HINDI KE MOORDHANYA LEKHAK ROOP SINGH CHANDEL JI KE
    SANSMARNON KEE PUSTAK KEE SMEEKSHA PADH KAR BAHUT
    ACHCHHAA LAGAA HAI . STARIY SMEEKSHA KE LIYE
    VIRENDRA KUMAR JI KO BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA.

    उत्तर देंहटाएं

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