17 मई, न्यूयार्क। यहाँ आये 15 दिन हो गये है. रोज कहीं ना कहीं घूमने का सिलसिला जारी है। आज शाम हम स्क़्वेयर टाईम्स देखने पहुचें। इस शहर का सबसे चर्चित और लोकप्रिय जगह। रात के 8 बज रहे है, चारों और बिजली की चकाचोंध से नज़रे प्रकाश की आती जाती लहरों पर मानों नर्तन करने लगी। संकरी गलियों में बनी ऊचीं ईमारतों की पूरी दीवारे स्क्रीन में बदल गई थी। जिन पर रंग बिरंगी विग्यापनों की भरमार चलती फिल्म के रूप में सबको आकर्शित कर रही थी। किसे देखे किसे नहीं, समझ नही आ रहा था।

इनसे हटकर नज़रें सडक पर आई तो उत्साहित, उन्मादित लोगों की एसी भीड कि पैदल चलना भी दूभर। हर तरह के, हर उम्र के लोग पूरी सज धज के साथ। युवा जोडे अधिक, जो फुटपाथ पर ही आलिंगंनबद्ध झूम रहे थे। विग्यापनों और भीड के शोरगुल से कान सुन्न हो रहे थे। फुटपाथ पर अनेक तमाशाबीन अलग अलग करतब दिखा रहे थे। ऐसा लगा अपने देश के ही किसी सावन के मेले में आई हूं। वहीं एक चीनी कलाकार से हमने अपना केरी केचर बनवाया। मात्र दस मिनिट में हमारी तस्वीर बन कर तैयार। अदभुत कला है। उस चीनी के चेहरे की मुस्कराहट हमेशा याद रहेगी मुझे। गोरे अमेरिकनों की सुंदरता का जवाब नहीं। सबकी ऊचीं कद काठी, तीखे नाक नक्श, लालिमा भरा बेहद गोरा रंग, हेयर स्टाइल उनकी जीवन शैली की तरह ही उलझी बिखरी लापरवाह। अज़ीब संस्क्रति है यहां की.इतना खुलापन? किसी को किसी की कोइ परवाह नहीं, शर्म नहीं संकोच नहीं.सब के सब मानों भोग विलास के सागर की अंतिम बूंद तक पीने को आतुर। इस अति को देखकर मन वितृष्णा से भर गया। फिल्मों में जरुर ऐसे सीन देखे जो विवाद के विषय बन जाते है। अब तो हमारे यहां भी महानगरों मे यह आम बात हो गई है। मानव मन की स्वभाविक प्रवृत्तियों के रुझान में कोइ अंतर नहीं चाहे वह पूरव हो या पश्चिम।

 हमारे देश में इन प्रवृत्तियों पर जितने सयंम और बंधन उतने ही जघन्य अपराधों की संख्या में वृद्धि। यहां जितनी छूट उतनी ही अधिक अतृप्ति, असंतोष और भीतरी खालीपन। दोनों ही परिस्थितियां घातक, दोनों का ही परिणाम अंतत: सर्वनाश।  एक का आदर्शों की खोल के भीतर घुटकर और दूसरे का उन्मुक्तता के सागर में डूबकर। 
                                         मीनाक्षी जोशी
                                         अध्यक्ष, हिंदी विभाग, 
                                   जे.एम.पटेल कालेज.भंडारा (महाराष्ट्र)

5 comments:


  1. न्यू योर्क का टाईम्स स्क्वेयर सम्पूर्ण अमरीका की छवि नहीं है
    परंतु मीनाक्षी जी की यात्रा के अन्य भाग भी पढना चाहेंगें
    - लावण्या दीपक शाह

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  2. Padhkar aisa laga mano hum abhi waha firse pohoch gaye ho..... Bahut Accha hai...!!!!

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  3. बहुत जल्दबाजी में छोटा सा एक पक्ष- विस्तार में अनुभव पढ़ने की आशा है..

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  4. Duniya Bhar ke log, najane kitni hi jagah jakar atey hain pur apne jis tarah se waha ki vihangam drushyo ko moti dar moti piroya aur ant mey usey humarey samajik vishleshan se joda, kafi prashansaniye hai.....apke shabd do ankhon ki tarah hai jo ek se sundarta aur dusri se vastvikta pur gaur karate hai...Adbhutt...

    Vineet Joshi

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