दिविक रमेश 

भरपाई पैंतीस से ज्यादा क्या होगी। लगती जरूर पैंतालीस की है। लेकिन भरपाई जानती है कि वह पैंतीस से दो चार दिन नीचे भले ही हो, ऊपर एक घड़ी भी नहीं है। भीतर ही भीतर यह सोचकर, खुद को किसी जवान से कम नहीं समझती। पंद्रह साल की उम्र में ब्याह हो गया था। यह तो ऊपरा तली के पांच-सात बालक हो गये वरना पैंतालीस नहीं तीस की नजर आती। लेकिन भरपाई से कोई यह वाक्य बोल कर तो देखे। नोच न ले तो मुंह। सारा मुहल्ला सिर पर उठा लेगी। बड़े-बूढ़े भी अपने कान दबोचे बैठे रह जाएंगे। उस समय भरपाई जो कह दे वह कम है। वह यह भी कह सकती है....‘‘कौन सा किसी गैर का लंगोट ढ़ीला हो गया है। अपणे मर्द से जणे हैं... पांच हैं तो। दस हैं तो।’’ परिवार नियोजन वाले तक उसके मुंह लगते कांपते हैं। ऊपर की ऊपर निकल जाते हैं। कौन सुने उसकी खुल्लमखुल्ला बातें।

लेकिन पिछले कुछ दिनों से भरपाई में साफ बदलाव नजर आ रहा था। वह बहुत कम बोलने लगी थी। किसी बात पर तुनकती भी नहीं। किसी ने ऐसी वैसी बात कह भी दी तो मुस्करा कर टाल देती है। उसकी मुस्कुराहट में बेबसी जरूर झलकती है। आस-पड़ोस की औरतों में तो यह जानकारी जोर पकड़ती जा रही थी कि भरपाई की बड़ी से छोटी बेटी सुरजा कई दिनों से स्कूल नहीं जा रही है। सुरजा कोई पन्द्रह-साढ़े-पन्द्रह साल की होगी। औरतों के लिए यह जानकारी एक बहुत ही बड़ा रहस्य बनी हुई है। और जिज्ञासा का कारण भी। आखिर दो-चारों ने हिम्मत की ओर चेहरों पर हितैषी वाला भाव मल कर पहुंच ही गयीं भरपाई के यहां। भरपाई शायद चावल फटक रही थी। छाज एक तरफ रख कर उसने सबसे बड़ी औरत की तरफ अपने नीचे से पीढ़ा निकाल कर सरका दिया। औरतें बैठ गई तो इधर-उधर की चर्चाएं होती रहीं। आखिर दस-पन्द्रह मिनट तो लग ही गए होंगे औरतों को काम की बात पर आते-अवाते। एक ने पूछ ही तो लिया...‘सुरजा को स्कूल नहीं जाते देखा भरपाई। क्या बीमार है?’

भरपाई ने उन औरतों की तरफ कुछ ऐसी आंखों से देखा जैसे तोल रही हो कि वे सुरजा के बारे में किस हद तक जानती हैं। थोड़ी ही देर में आ’वस्त सी होकर बोली -- ‘इब सुरजा स्कूल ना जावेगी बहन। इस साल दसमीं का निमतहान दिवा दूंगी बस।’ (अब सुरजा स्कूल नहीं जाएगी बहन। इस साल दवीं का इम्तहान दिलवा दूंगी बस) फिर भरपाई ने एक लंबी सी सांस खींच कर कहा -- ‘ठीक ठाक लड़के मिलेंगे तो बड़ली अर इसके हाथ एक साथ पीले करके गंगा नहा लूंगी। तुम जाणो, एक अकेली जान ही तो है कमाऊ घर में। इस कलयुग में तो सात जातकों की दो बेर की रोटी ही जुट जावे तो बहुत है। म्हारी बड़ली छोरी, छोरा होती तो भी कुछ सहारा लग जाता। इब यो छोरा है छोरिया की पीठ पै। चार साल का तो सारा हुआ है चैत में। इस रींगटे के जवान होते तक तो हम उस लोक की सुध ले रहे होंगे।’
‘ऐ ऐसी बात मत कह भरपाई। भगवान तमने सुख दिखावे। पर बहन लड़की की जिन्दगानी तो खराब हो जावेगी। आजकल दसमीं ने बूझे कौन है?’

‘मन्ने देख ने बहन। मैं तो कती ए अपढ़-मूरख हूं। के खराब हो गयी मेरी जिन्दगानी। जो जिसका भाग। ज्यादा पढ़ना इसके भाग में होता तो किसी लाट के घर में न जनमती?’

औरतों को इन बातों में जरा भी मजा नहीं आ रहा था। सुरजा के स्कूल न भेजे जाने का यह कारण उन्हें कतई तसल्ली नहीं दे रहा था। उनमें से एक ने एक दूसरा दाव खेला -- ‘बहन छोरी तो सारे मुहल्ले की होवे है। म्हारा मोहल्ला सहर में आके भी सहरी नहीं है जो एक-दूसरे के दुख-दर्द में भी काम न आवे। तू चाहवे तो हम सगली थोड़ा-थोड़ा चन्दा करके तेरी मदद कर सके हैं। पर पढ़ाई छुड़ा कर उस छोरी का जीवन मत खराब करे।’

भरपाई नासमझ नहीं थी। औरत का निशाना वह समझ रही थी। पर घाव छिपा कर बैठी रही थी। अपनी ही थाली में छेद हो तो कोई दोष किसे दे। ज्यादा बहस करने से बात उघड़ती ही। सौ इधर-उधर की करके उन्हें टाल ही दिया। औरतें जंग में नाकामयाब हुई सेना की तरह निराश लौट गई थीं।

भरपाई ने ऊपर कहा सारा किस्सा कुछ दिनों पहले ही तो मुझे बताया था। भरपाई को मैं भाभी कहता हूँ हालांकि कहानी की तर्ज पर पूरी बात कहने के लिए ही अब तक उनके नाम का उपयोग किया है।

इस बार बहुत दिनों के बाद गया था मैं उस दिन उनके घर। भाई बालमुकन्द कहीं हवन आदि कराने गए हुए थे। घर पर थे नहीं। पूजा-पाठ, हवन आदि कराना उनके लिए ‘पार्ट-टाइम जाब’ की तरह से है। यूं वे डाक-तार विभाग में ‘सारटर’ के पद पर काम करते हैं और 400-450 रूपए महीने के पा ही लेते हैं। छोटा ही सही पर अपना पु’तैनी घर है सो किराए के पंजों से बचे हुए हैं। जन्म से ब्राह्मण हैं सो पूजा-पाठ का काम कर लेने की सुविधा है। इस काम में भले ही लोगों की बहुत श्रद्धा नहीं रह गई है और इसीलिए इस काम को लोग हेय दृष्टि से भी देखते हैं लेकिन किसी भी कारण से सही, लोग कथा, हवन, पूजा आदि कराते ही रहते हैं। ऊपरी कमाई थोड़ी-बहुत भी हो तो भी बंधी कमाई से अच्छी लगा करती है।

बालमुकुन्द जी की अनुपस्थिति में मैं अक्सर पानी पीने तक के समय के लिए ही बैठा करता हूं लेकिन इस बार माहौल ही कुछ ऐसा था कि मुझे देर तक रूकना पड़ा। भाभी सुरजा पर हाथ ही छोड़ने वाली थीं कि मैं पहुंच गया था। थोड़ी देर को तो मेरे समेत सभी स्तब्ध खड़े रह गये थे। जैसे कोई गुनाह करते हुए, एक-दूसरे ने, एक-दूसरे को रंगे हाथों पकड़ लिया हो। लेकिन तभी भाभी फफक-फफक कर रो पड़ी थीं। मेरी स्थिति अजीब हो गई थी। थोड़ी देर को असमंजस में खड़ा रहा। बीच में पडूं कि न पडूं। मन हुआ कि लौट चलूं। घरों में लड़ाई-झगड़े तो होते ही रहते हैं। ऐसे में कौन चाहता है कि कोई बाहर का आदमी चश्मदीद गवाह हो। मैं खुद अपने घर में ऐसे समय किसी की उपस्थिति अधिक बर्दा’त नहीं कर पाता। लेकिन मैंने ज्यों ही चलने के लिए पांव लौटाए तो सुरजा लगभग सामने खड़ी हो गई थी। उसका पूरा शरीर मौन था। एकदम जैसे भांय-भांय करती जेठ की दोपहरी। लेकिन उसकी आंखों में साफ याचना थी। मानो वह कह रही थीं -- ‘अभी मत जाइये चाचा जी। आप गए तो थोड़ी देर को रूका तूफान फिर घर को घेर लेगा। मां मुझे जाने कितना-कितना पीटेंगी।’

मैं सचमुच रूक गया था। खुद भाभी मुझे रोकने की मुद्रा में थीं। मैं ठीक से नहीं कह सकता कि उस समय मैं केवल सुरजा के लिए रूका था या भाभी के लिए या फिर अपनी ही उत्सुकता के लिए।

पूरा तूफान भाभी की आंखों और जुबान पर आ चुका था। उन्हें यह भी होश नहीं था कि मैं जब से आया हूं, खड़ा ही हूं। अपने खड़े होने का एहसास खुद मुझे ही अब तक कहां था। उस समय अनौपचारिक ढंग से ही पलंग पर बैठने की औपचारिकता निभा ली थी। भाभी जमीन पर ही बैठ गई थीं -- टांगों को पैंतालीस के कोण पर मोड़े हुए। सुरजा मेरे कहने पर भी नहीं बैठी थी। आले के पास दीवार से सटी हुई सहमी-सी चुपचाप खड़ी थी। पर चुप थी नहीं वह। ऐसा न जाने क्यों मुझे लगातार लग रहा था।

छुटकू जाने कब से अपनी पुरानी तिपहिया साइकिल में ठोकाठाकी कर रहा था। जब कोई भी नहीं बोलता था तो ठोका-पीटी की आवाज एक खास किस्म का असह्य भद्दापन पूरे वातावरण में भर देती थी। ऊंट की कूब-सी आवाज छत से टकरा-टकरा कर पूरे कमरे में बिखर जाती थी।

‘मैं आपसे  के कहूं बाबूजी -- मैं ते आपसे कुछ कह भी न सकूं हूं।’ भाभी अपनी बात की भूमिका-सी टटोलती हुई, आंखों में बेबसी और आग भरे हुए शुरू हो गई थीं -- ‘इस छोरी ने इसी बात करी है कि मन्ने धरती में भी गड्डन की जगह नहीं मिल रही। आण दो पंडित जी को -- इसकी देही ना तुड़वाई तो.....।’ (इस लड़की ने ऐसी बात की है कि मुझे धरती में भी गड़ने की जगह नहीं मिल रही है। आने दो पंडित जी को -- इसकी देह न तुड़वाई तो) भाभी ने यह कहते-कहते सुरजा की ओर भी, उसकी नजर बचाते हुए, देख लिया था।

मुझे कुछ नहीं समझ आ रहा था। न ही मैं खुद को इस स्थिति में पा रहा था कि उन्हें यह एहसास हो कि मैं बात को कुरेद-कुरेद कर विस्तार में जानना चाहता हूं। लेकिन भाभी ‘शायद खुद ब खुद सारी घटना बता देने को उत्सुक थीं।

‘अब आप अपणे आदमी हो सो लाज-सरम भी छोड़ रही हूं। सबके सामने तो घर की सारी बातें नहीं कही जावें। तुम ही बताओ यहां तक उघाड़ूंगी-- भाभी ने लगभग घुटने तक साड़ी को खींच कर छोड़ दिया था -- तो सरम मन्ने ही आवेगी ना? तमणे तो नहीं आवेगी ना? अपणे आदमी के सामने ही जी खुला करै है बाबूजी।’’

भाभी का सही बात के इर्द-गिर्द इतना अधिक चक्कर लगाना मुझे बहुत ही खलने लगा था। ‘शायद ऊब भी मेरे चेहरे पर आ बैठी थी। भाभी ने भी 'शायद उसकी झलक ले ली थी। तभी तो उन्होंने कहा था -- ‘जो बात इस छोरी ने चटाक देने मारी थी, वो बात बताते हुए मेरी तो जीभ भी पाटण ने हो रही है। दुनिया कहवै तो माणस दो दुनिया ने सुणा के, जी हल्का कर सके हैं। पर जिब अपणा बालक और वो भी छोरी इसी बात कर दे -- छोरा भी कर दे तो सब हो जाया करें -- तो न उगलते बणै हैं न सटकते। इसी बात अपणे आदमी के आगे ही रोई जा सके है। वर्ना दुनिया का क्या है। दुनिया तो रो-रो के पूछेगी, हंस-हंस के उड़ावेगी।’

भाभी थोड़ी देर को चुप हो गई थीं। मेरा सारा ध्यान छुटके की खटा-पटी की भद्दी आवाज ने बंटा लिया था। सुरजा के चेहरे पर उस आवाज से मिलने वाली राहत साफ झलक रही थी। वह आवाज 'शायद, भयंकर हो सकने वाले वातावरण को कहीं चोट दे रही थी। हालांकि ऐसा था नहीं। कम से कम अभी तक तो वातावरण के भयंकर न हो जाने के कोई खास आसार नजर नहीं आ रहे थे। बात को बढ़ाने के लिए मैं कुछ कहने ही वाला था कि भाभी लगभग उसी समय फिर बोलने लगी थीं -- ‘मेरी तो वह गत हो रही है बाबूजी कि अपणी जांघ उघाड़े और अपने आप लजावे। जी तो यो चाहवे है कि या तो मैं घर में रहूं या यो छोरी। पर दोनों में एक भी तो ना हो सके है। यो काल की छोरी -- मेरी पैदा की हुई -- इसने इसी बात कर दी।’ भाभी की आंखों से फिर चिनगारियां छूटने लगी थीं।

मेरी आंखों में अब साफ-साफ यह भाव आ गया था कि आखिर बात भी बताओगी कि नहीं? -- ऐसा क्या कर दिया है सुरजा ने। मुझे यही आशंका थी कि पन्द्रह-सोलह साल की उम्र है इसकी -- जरूर कोई गलत कदम उठा बैठी है। किसी आस-पड़ोस के लड़के....’ मेरे कुछ आगे सोचने से पहले ही भाभी ने अपनी बात शुरू करके जैसे सोच पर प्रतिबंध लगा दिया था।

‘अब तुम ही बताओ बाबूजी क्या मैं इसका कुछ खाऊँ हूं, पीऊँ हूं? क्या मेरी उम्र बीत गयी है। मुशिकल से पैंतीस की हुई हूं। पन्द्रह साल की थी तो ब्याह हो गया था मेरा। सारी जिन्दगानी होम कर दी इनके पालन-पोषण में। आज यो खागड़ी इसी बात करण जोगी हो गी है।’

शायद अब मैं पूरी तरह झल्लाने की स्थिति में पहुंच गया था। सारी स्थितियों से जैसे मैं तटस्थ हो जाना चाहता था। पर न जाने कौन-सा सूत्र था जो इस माहौल में मुझे भागीदार बनाए हुए था।

‘पर तकदीर का डाण्डा तो भुगतना पड़े है आदमी को। हम भी भुगत रहे हैं। छोरा भी कह दे तो बर्दा’त हो जाया करे है। आप तो सब जाणो ही हो बाबूजी। म्हारे पास के धरा है। कोय खेत ना क्यार ना, दुकान ना सुकान ना। एक इज्जत है, ओढ़ लो, चाहे बिछा लो। वो भी अगर न रहवे तो किसा जीणा, किसा मरणा। मैं कोय बुड्ढ़ी-ठेरी तो हूं नहीं। पंडित जी भी चालीस से ऊपर नहीं हैं। पूरा दिन तो दफ्तर में खटे हैं फिर इनके भौभे भरने के लिए हवन-पूजा को निकल जावे है। जिब भी, इननेह हम बोलते-बतलाते ना सुहावे हैं। अब तुम से क्या लकोह (छुपाव) रक्खूं। रात ने थके-मांदे आये थे पंडित जी। उस भीतर वाले कोठे में जा लेटे। मैं गयी तो बोले पंडितानी थोड़े पांव दबा दे। ब्याह के लाए थे सो कह दिया। कोय खता तो नहीं की। बिरबानी हूं उनकी। मैं पांव दबाने बैठ गई। ... यो छोरी किते पाणी वाणी पीवण भीतर आई होगी। तड़के उठते ही न्यू (यूं) बोली -- ‘मां तम अपणे सुख के अलावा भी कुछ सोचा करो हो। आगे ही इतने बालक....’ बताओ-बताओ बाबूजी यह बात कहण की थी? और मेरे सुणण की थी? जल क्यूं ना गयी इसकी जुबान। जरा-सी छोरी और इतनी बड़ी बात। ... बालक हैं तो मेरे हैं। यो तो नहीं पाल देगी। पहलम तो बोल-बतलाने का इतना टेम ही कहां मिले है। कदै महीने-दो महीने में बोल-बतला भी लिए तो बाबूजी हमने के गैर-जायज काम कर दिया। आज तक ना मन्ने थारी फिलम देखी ना कोय और ‘ाौक पूरा किया। म्हारा बाम्हण तो इतना ‘ारीफ है कि कोई उघाड़ी भी बैठी हो तो अपणी नजर बचा लेवे हैं। और इस छोरी ने ओड़ बात कह दी। आज ईन्है (इसने) मैं भी उघाड़ी बना दी।’ 

लेकिन भाभी इसमें इतना परेशान होने की बात क्या है। आपकी ही संतान है। अब छोड़ो भी। आजकल का जमाना कम बच्चों का है। इसको ऐसी बात कहनी नहीं चाहिए थी। मुंह से निकल गई होगी।’ मैं सचमुच सकते में था कि सुरजा की जरा-सी बात का भाभी ने इतना पहाड़ क्यों बना दिया था। मैं तो कुछ और ही सोच बैठा था।

‘मुंह से निकली किस तरह? यो बात छोटी नहीं है बाबूजी। भोत (बहुत) बड़ी बात है। छोरा भी कहवे तो बर्दाश्त हो जा। इसने छोरी होके इसी बात कही।’

‘छोरे को भी नहीं कहनी चाहिए। मैंने बात को खत्म करने के लिहाज से कहा।

‘छोरे को भी ना करनी चाहिए। पर एक बात कहूं हूं। इसने ते छोरी होके इसी बात कह दी। पहलम मां अपनी बेटियां ने दुनियादारी सिखाया करें थीं और ईब यो जमाना आ गया है। के उम्र है इसकी? पन्द्रह बरस ना?’ 

‘पर भाभी आपकी तो इस उम्र में शादी हो गयी थी।’ मैंने यह वाक्य कहते हुए सुरजा की ओर भी देखा था। सुरजा पहले से भी ज्यादा चुप हो चुकी थी। मेरी बात सुन कर भाभी थोड़ा कटी जरूर लेकिन फिर आवेश में आकर बोलीं -- ‘आजकल तो तीस-तीस बरस की होके भी ब्याह कराती देखी है मन्ने। पर इसको तो अभी से सब ज्ञान है। ऐसी छोरी घर में टिक सके है? इसते बड़ी भी ते बैठी है। इसी ने ज्यादा राम लग रहा है। मुझते लिखवा लो बाबू जी अगर यो घर में टिक ले तै। इसने मुझते इसी बात कही। के मेरी उम्र लिकड़ गयी। बालक हैं तो मेरे हैं। जिसने दिए हैं के वो पालेगा नहीं? सब अपणा-अपणा भाग ले के उतरें हैं।’

मुझे मालूम है भाभी से इस मुद्दे पर बहस करना बहुत मुनासिब नहीं हो सकता था। बात साफ थी कि टूटी हुई आर्थिक स्थितियों के बोझ के नीचे दबी-झल्लायी भाभी इस बात से भी परेशान हैं कि पैंतीस की उम्र में ही वे पैंतालीस की बूढ़ी नजर आने लगी हैं और इस बात से भी कि उनके बिना बताए लड़की को दुनियादारी का ज्ञान है। भाभी को शायद इस बात पर इतना क्रोध नहीं था कि लड़की ने उन्हें रात की घटना को लेकर टोका है बल्कि इस बात पर था कि लड़की को ‘सब ज्ञान है।’ भाभी के लिए लड़की के बारे में यह जानकारी उन्हें पूरी तरह हिला देने वाली थी। इसीलिए यह डर उन्हें घर कर गया था कि यह लड़की जरूर कोई गुल खिलाएगी। भाभी उसे लेकर कहीं न कहीं असुरक्षित हो चली थीं। भाभी को इज्जत की पूरी दीवार ढ़हती नजर आ रही थी। मैं जानता था भाभी के संस्कारों के लिए यह एक अनहोनी घटना थी। ऐसे में मैंने वही रटा रटाया वाक्य दोहराना ही ठीक समझा -- ‘भाभी इस बात को अब खत्म भी करो। आखिर अपनी बच्ची ही है। और फिर सिवासण (जवान) है। बहुत नासमझी की उम्र तो नहीं है। आजकल जमाना भी तो नासमझी का नहीं है।’ यह कहते-कहते मैं लगभग झटके के साथ ही उठ गया था और चुपचाप खड़ी सुरजा के सामने जा खड़ा हुआ था -- ‘सुरजा, तुम्हें मां से ऐसा नहीं कहना चाहिए था। बोलो! नहीं कहना चाहिए था न?’

कई बार यह प्रश्न दोहराने पर भी सुरजा के मुंह से एक लब्ज नहीं फूटा था। बस मुझे भीतर तक हिला देने वाली निगाह से देख कर आंखें घुमा ली थीं।

सुरजा से मैंने शायद एक गलत सवाल किया था।

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2 comments:

  1. सूचनाः

    "साहित्य प्रेमी संघ" www.sahityapremisangh.com की आगामी पत्रिका हेतु आपकी इस साहित्यीक प्रविष्टि को चुना गया है।पत्रिका में आपके नाम और तस्वीर के साथ इस रचना को ससम्मान स्थान दिया जायेगा।आप चाहे तो अपना संक्षिप्त परिचय भी भेज दे।यह संदेश बस आपको सूचित करने हेतु है।हमारा कार्य है साहित्य की सुंदरतम रचनाओं को एक जगह संग्रहीत करना।यदि आपको कोई आपति हो तो हमे जरुर बताये।

    भवदीय,

    सम्पादकः
    सत्यम शिवम
    ईमेल:-contact@sahityapremisangh.com

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  2. आज ही नजर पड़ी। धन्यवाद। मुझे जानकर खुशी हॆ।

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