क्या स्त्री लेखन की पहचान सही पहचान हो सकी है? नहीं तो क्यों?

स्त्री लेखन की अलग पहचान के लिए साहित्यिक से अधिक गैर-साहित्यिक निमित्त है। स्त्री को दिया गया संस्कार, मूलधारा से कहीं उसकी निष्क्रय भूमिका, सत्ता में भागीदारी का न होना तथा पुरुष सत्तात्मक समाज और सामन्तवादी मनोवृत्तियां। वैसे हर वर्ग के साहित्य का अपना विशिष्ट वातावरण, हवा-पानी और स्थान होता है। स्वाभाविक है कि स्त्रियों की स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया अलग होती है। यूं हिंदी का समस्त लेखन ही सीमित दायरों का लेखन है। तो भी स्त्री लेखन पर विशेष रूप से संकीर्ण होने का आरोप लगाया जाता है। समग्रता से इसके मूल्यांकन का गंभीर प्रयास हुआ ही नहीं।

विकास की प्रक्रिया में वैश्वीकरण के इस युग में स्त्री की क्या स्थिति है? उसके लेखन पर इसका क्या प्रभाव पड़ा है?

विकास की प्रक्रिया में स्त्री लेखन भिन्न-भिन्न युगों से गुजरता आया है। प्रत्येक युग नई आशाएं और संभावनाएं लेकर आया है। आज इस उत्तर आधुनिक युग में औरत का प्रवेश हुआ और उसकी प्राथमिकताएं बदती हैं। उसके सामने औरत का एक 'ग्लोबल मॉडल' है जिससे औरत की रेजीमेंटिड छवि टूटी है। नायिका और खलनायिका, अभिजात्यता और साधारण तथा सती और वेश्या का दायरा सिमट रहा है। स्त्री लेखन तर्क की भावभूमि पर कई प्रश्न उठा रहा है जो अब तक उसके लिए वर्जित थे। उसकी जिंदगी के कितने ही अंधेरे पहलू हैं जो उसके लेखन में रचे जा रहे हैं। उसका अपना अस्तित्व, उसकी इच्छाएं, उसकी हाड़-मांस की देह और उसके यथार्थ आज महत्वपूर्ण हो गए हैं। दूसरी ओर, सामंती समाज में स्त्री की नियति के द्वार पर खड़ी औरत जितनी आगे बढ़ती है, उतनी ही पीछे लौट आती है। वह इस संस्कृति से कोप नहीं कर पा रही। वह आज भी शिक्षा, निजता और स्वाधीनता के मूल प्रश्नों से जूझ रही है। स्त्री लेखन में एक ओर उसकी बदली भूमिका की छटपटाहट है, वहां जातीय अपेक्षाएं पूरी न कर पाने का अपराधबोध भी है। एक ओर इसमें वैचारिक उथल-पुथल है, वहां औरत होने का भय और त्रास है। फ्लक्स की स्थिति में, अंतर्विरोधों से जूझती आक्रामक साहित्य रचती देह और बुद्धि के द्वंद्व में बुद्धि को केंद्र में रखकर स्वाधीन निर्णयों का साहित्य रचती तो है, पर वे जानती हैं कि साहित्य के सच को जीवन में पाने की कोशिश उन्हें अकेला और निरर्थक बना देगी। इसीलिए साहित्य में अंतर्विरोधों में जीने वाली स्त्रियां वे स्वयं हैं और साहसी निर्णयों वाली स्त्रियां उनकी महत्वकांक्षाएं हैं जिन्हें वे मरने नहीं दे रही। स्त्रियां बेबाकी से उलझे रिश्तों, पुरुष समाज में अपने खिलाफ हो रहे षड्यंत्र, प्रेम-दाम्पत्य, यौन संबंधों और स्त्री-पुरुष के बीच नए समीकरणों पर साहित्य रच रही हैं। यही शायद उसका सांस्कृतिक संक्रमण है। विघटन की पीड़ा, मूल्यहीनता का संत्रास और शरीर संस्कृति का अभिशाप सबसे ज्यादा उसे ही झेलना पड़ रहा है। जीवन के आर-पार, भीतर और बाहर घट रहे परिवर्तनों की आंच में तपकर औरते नए जीवन संदर्भों से जुड़कर विरोधों में सामंजस्य की संभावनाओं का साहित्य लिख रही हैं। 

स्त्री लेखन पर संकीर्णता होने का आरोप लगाया जाता है। आप इससे कितनी सहमत हैं?

भारतीय समाज वर्जनाओं से भरपूर है। वर्जनाएं स्त्री के अनुभव और विकास में बाधा बनती हैं। पावों में पड़ी बेड़ी की तरह उसे अधिक दूर तक नहीं जाने देती। प्रयोग की कोई सुविधा उसे नहीं है। उसे दी गई भूमिाक में परिवार के प्रति पूर्ण समर्पण, आज्ञाकारी होने, बिना प्रश्न, बिना जिज्ञासा के सबको खुश रखने में खुश रहने की अनुगामिनी का संस्कार है। 'अच्छी औरत' को अपने स्वीकार और अपनी छवि को सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए प्रमाणित भी करना होता है। स्त्री की रचनात्मकता और उसकी प्रतिभा बिना हवा-पानी के सिमटती जाती है अथवा सूख जाती है।

स्त्री लेखन उसके अपने सीमित किंतु प्रामाणिक तथा सूक्ष्म जीवन अनुभवों का लेखन है जिसमें उसकी जातीय पहचान उभरती है। लेखन के जीवन के किसी विशेष संदर्भ अथवा विशेष पक्ष का होने से उसका महत्व कम नहीं हो जाता। परंतु स्त्री लेखन संवेदनहीनता का शिकार हुआ है। तो भी स्त्रियों ने समय-समय पर अपनी सीमाओं का अतिक्रमण भी किया है। अनाम हिंदी महिला के सीमन्तनी उपदेश से शुरू होकर महादेवी ने शृंखला की कड़ियां तोड़ी। महाश्वेता देवी ने सर्वहारा वर्गों के संघर्षों को वाणी दी। आशापूर्णा देवी कोठों पर भी गई। कुर्तुर एन हैदर को 'आग का दरिया', मन्नु भंडारी का 'महाभोज', मृदुला गर्ग का 'अनित्य', कमल कुमार का 'हैम बर्गर', कृष्णा सोबती का 'जिंदगीनामा' और ईस्मत चुगतई जैसी लेखिकाएं सभी औरते हैं। स्त्री साहित्य का मूल्यांकन मानवीय और साहित्यिक मानदंडों द्वारा किया जाना चाहिए, न कि अलगाव और पूर्वाग्रहों द्वारा। 

साहित्य बाहर से भीतर और भीतर से बाहर की प्रक्रिया में रचा जाता है। साहित्य का मूलाधार सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य होता है, न कि राजनीति। मतवादों, आंदोलनों और राजनीतिक विचारधाराओं का साहित्य पर प्रभाव अवश्य पड़ता है। परंतु यह सृजन की प्रक्रिया के बीच अंजाम होता है जब इन विचारों और मतवादों के बीच से जिंदगी की पड़ताल की जाती है। अन्यथा साहित्य प्रचार बनकर रह जाता है। स्त्री लेखन पर यूं भी ये प्रभाव सीधे नहीं पड़ते। राजनीति में स्त्रियों की जो स्थिति है, वही राजनीतिक लेखन की स्त्री लेखन में है। वैसे भी भारतीय आधार संहिता में स्त्री बड़ी घरेलू-सी चीज है। उसका 'हित' भी उसी में आंका गया है, चाहे वह कुछ भी कर रही हो। इसलिए स्त्री लेखन अपने स्थानीय और जाति तत्वों से अलग नहीं होता।

मीडिया के विस्फोट का स्त्री लेखन पर क्या प्रभाव पड़ा है?

आठवें और नौवें दशक में विश्व मीडिया द्वारा पश्चिमी संस्कृति के विस्फोट ने पुराना सब तितर-बितर कर दिया। पारिवारिक सामाजिक संस्कृति मूल्यों, नैतिकता और आचार-संहित सभी पर प्रश्नचिह्न लग गए। हमारी चेतना को कई स्तरों पर रौंदा गया। हमारी चेतना का डी-कंस्ट्रक्शन हुआ। मल्टी मीडिया के सबसे सशक्त उपकरण विज्ञापन ने उपभोक्ता समाज बनाया। उत्पादकता और स्पर्द्धा से पारिवारिक संबंधों के समीकरण बदल गए। संबंधों की सहजता नष्ट हुई और संबंधों की स्थिरता व निरंतरता का निर्णय विशेष उत्पादन तय करने लगे। जिसका प्रभाव परिवार में संबंधों की ज्यामिति पर पड़ा और इसलिए स्त्री लेखन पर भी। विज्ञापन और ग्लेमर की दुनिया में स्त्री की छवि बदली। साथ ही, नए विचार बिंदु उभरे और संवेदना के स्तर पर नए अन्तर्संबंध विकसित हुए। चले आते मूल्यों और प्रचलित परिकल्पनाओं का कोई विशेष अर्थ नहीं रह गया।

आलोचना के क्षेत्र में स्त्रियां क्यों नहीं हैं?

कविता स्त्री की संवेदना के समीप और अनुकूल होते हुए भी कविता के क्षेत्र में कथा क्षेत्र की अपेक्षा कम औरते हैं। जिन्होंने कविता से शुरुआत की बाद में वे गद्य विधा में प्रवृत्त हो गईं। हो सकता है, उनका काव्यभाव उनके उबड़-खाबड़ जीवन यथार्थ से विखंडित होकर अभिव्यक्ति का सही माध्यम न रहा हो। आलोचना के क्षेत्र में स्त्रियां कम हैं। यूं आलोचकों ने भी असफल लेखक अधिक है। आलोचना के क्षेत्र में स्त्रियों का न आना कई सवाल उठाता है। क्या सोचने-विचारने और चिंतन के संस्कार और सुविधा के अभाव में तो ऐसा नहीं है? अपनी रचनात्मक क्षमता द्वारा गहरे से आत्मभिव्यक्ति की तीव्र इच्छा और तृष्टि तो नहीं। यह भी सच है कि आज की आलोचना में गुटबाजी, उठापटक और स्थापित-विस्थापित करने के प्रयास अधिक हैं अपेक्षाकृत किसी रचना के निष्पक्ष मूल्यांकन के। आलोचक आलोचना द्वारा संबंधों की शतरंज खेलते हैं। यह सुविधा औरतों को आसानी से उपलब्ध नहीं हो सकती। वैसे भी स्त्रियां पुरुषों की तरह और उनके जितनी अभी भ्रष्ट नहीं हुईं। फिर शिक्षित स्त्रियों का आंकड़ा कौन-सा बड़ा है।

संपादन और प्रकाशन में भी स्त्रियां नहीं के बराबर हैं।

संपादन और प्रकाशन की दुनिया में भी वर्चस्व पुरुषों का है। संपादकों और प्रकाशकों दोनों में ही स्त्री साहित्य को लेकर 'ठिठोली' का भाव है। जो उनके अहं की तुष्टि करता है। इसीलिए 'गुडी-गुडी' साहित्य लिखने वाली, किसी गॉड फादर की छाया में विशेष विचारधारा या मतवाद का साहित्य रचने वाली अथवा पतियों के पैसे और पदवी के दम पर उन्हें नीचा दिखाने वाली औरतें अधिक लोकप्रिय हो जाती हैं। वैचारिक असहमति के लिए उसे उपेक्षा का दंड दिया जाता है। संयमित और समन्वित दृष्टि तथा साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता का भाव क्या इनके पास है? लाभ और हानि से संचालित संपादन और प्रकाशन भी दूसरे व्यवसायों जैसा व्यवसाय ही है।

आज की स्थिति क्या है?

प्रिंट मीडिया में भी एक तरह की क्रांति हुई है। नई सोच और विचारों की दुनिया सबके लिए खुल गई है। आम औरत भी पहले से कहीं ज्यादा सचेत और चौकन्नी हो गई है। यद्यपि गंभीर साहित्य से जुड़ा पाठक वर्ग छोटा है। यह बात स्त्री लेखन के लिए जितनी सच है, उतनी ही किसी भी गंभीर साहित्य के लिए सच है। आम महिला पत्रिकाओं में घरेलू लेखन के साथ घरेलू-सा साहित्य भी रहता है जिसे फुर्सत के समय औरते पढ़ती हैं। उस पर आपस में बहस भी करती हैं। औपचारिक प्रतिक्रिया चाहे वे नहीं देती हों, पर साहित्य उन्हें प्रतिक्रियत अवश्य करता है

- कमल कुमार 
डी-38, प्रेस एनक्लेव, साकेत 
नई दिल्ली-17
दूर. 26861053


2 comments:

  1. कमलकुमार से यह बातचीत किसने की यह भी बताया जाना चाहिए था. यदि अब संभव हो तो अवश्य जोड़ा जाना चाहिए.

    रूपसिंह चन्देल

    उत्तर देंहटाएं
  2. कमलकुमार से यह बातचीत किसने की यह भी बताया जाना चाहिए था. यदि अब संभव हो तो अवश्य जोड़ा जाना चाहिए.

    रूपसिंह चन्देल

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