जाआओ गुइमारएस रोसा ( 1908-1967 )

जाआओ गुइमारएस का जन्म मिनास रोसा ग़ैराइस, ब्राजिल में 1908 में हुआ था. चिकित्सा का प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में प्रैक्टिस शुरू की. उस दौरान उस अंचल की लोक-कथाओं से वे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने इन तमाम कथाओं को एकत्रित करने का महत्त्वपूर्ण काम किया. ब्राज़िल से दूर मिनास ग़ैराइस क्षेत्र के खास भाषायी गुणों का इस्तेमाल करते हुए रोसा ने एक अद्वितीय कथा शैली विकसित की है और विलक्षण क़िस्म का काव्यात्मक गद्य लिखा है. उनकी कहानियाँ में ऊपरी तौर पर घटनाओं का सरल बखान है पर उनमें अनोखी मार्मिकता है. 

‘सागाराना’ (1946), ‘कोरपो डि बेले’ (1956) और ‘ट्रिफिल’ (1967) उनके कथासंग्रह हैं. उनका वृहदकाय उपन्यास ‘द डेविल टु पे इन द बैकलैंड’ लातीनी अमरीकी साहित्य जगत का एक उपन्यास माना जाता है. 

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मेरे पिता एक ज़िम्मेदार, अनुशासित, शांत, सीधे-सादे इंसान थे. उन्हें जानने वाले तमाम विश्वसनीय लोगों की भी यही राय थी. उनका मानना था कि न केवल युवावस्था में बल्कि बचपन से ही उनमें ये खुबियाँ थीं. जहाँ तक मुझे याद है और अपने आसपास के उन सभी जानकार लोगों के बरक्स मेरे पिता न तो बहुत खुशमिज़ाज थे और न ही बहुत उदासीन, हाँ एक हद तक वे शांत ज़रूर थे. घर में माँ की ही चलती, माँ, हमें रोज़ाना डांटती – फटकारती – मेरी बहन, मेरे भाई को और मुझे भी. पर एक दिन अचानक ऐसा हुआ कि पिता ने एक किश्ती मंगवाई.
किश्ती को लेकर वे बहुत संजीदा थे. वे अपने लिए ख़ासतौर पर मिमोसा काठ की किश्ती बनवाना चाहते थे. एक ऐसी मज़बूत किश्ती जो बीस-तीस बरस तक चले और उसमें एक व्यक्ति भर के बैठने की जगह हो. माँ लगातार पिता से पूछती रही - क्या उसका पति अचानक मछुआरा बनना चाहता है या उन पर शिकारी बनने का भूत सवार है? पिता कुछ नहीं बोलते. नदी से एक मील से भी कम दूरी पर हमारा घर था. नदी गहरी, शांत और इतनी चौड़ी थी कि उसका दूसरा किनारा नज़र नहीं आता था.
मैं वह दिन कभी नहीं भूल सकता, जिस दिन किश्ती घर पहुँचाई गई. पिता ने न कोई खुशी ज़ाहिर की और न कोई उत्साह. हमेशा की तरह उन्होंने अपनी टोपी पहनी और हमसे विदा लेकर चल पड़े. अपने साथ भोजन अथवा किसी तरह का कोई सामान भी नहीं लिया. हमें लगा शायद माँ चीखेंगी, चिल्लांएगी या रोएंंगी पर माँ ने ऐसा कुछ नहीं किया. वह बहुत उदास थीं और होंठों को लगातार चबा रही थीं. आख़िर उसने बस इतना ही कहा, “ अगर जा रहे हो तो दूर ही रहना, कभी लौटकर न आना!”
पिता ने कोई जवाब नहीं दिया. प्यार से उन्होंने मुझे देखा और अपने साथ लेकर चलने लगे. मुझे माँ के गुस्से का डर था पर फिर भी मैं झटपट उनके साथ हो लिया. हम साथ-साथ नदी की तरफ बढ़ने लगे. मैं उनके साथ पूरी तरह आश्वस्त था और भीतर से आल्हादित महसूस कर रहा था. रोमांच से भर मैंने कहा भी, “पिताजी, अपनी किश्ती में मुझे भी ले चलेंगे न?”
उन्होंने बस मुझे देखा, आशीर्वाद दिया और इशारे से लौट जाने को कहा, मैंने उन्हें दिखाने के लिए ऐसा ही किया. पर जैसे ही वे पलटे, मैं उन्हें देखने के लिए झाड़ियों में छुपकर बैठ गया. पिता किश्ती में बैठे और उसे खेते हुए दूर चले गए, किश्ती की परछाईंं पानी में किसी मगरमच्छ की तरह दिखाई देने लगी – लंबी और शांत. 
पिता लौटकर नहीं आए, दरअसल वे कहीं दूर भी नहीं गए. वे नदी में ही किश्ती खेते रहते और उनकी किश्ती इधर- उधर डोलती रहती. सभी भयभीत थे. अब तक जो कभी हुआ न था, जो कभी होना मुमकिन भी न था, वह हो रहा था. हमारे रिश्तेदार, पड़ोसी और मित्र सभी इस अद्भुत वाकए पर चर्चा करने आए. 
माँ बेहद लज्जित महसूस करती. वह बहुत कम बोलती और बड़े धीरज के साथ पेश आती. करीब-करीब सभी ने यही सोचा (हालाँकि कहा किसी ने नहीं) कि पिता पगला गए हैं. कुछेक ने यह भी कहा कि शायद उनके पिता ईश्वर अथवा किसी संत को दिए वचन को पूरा कर रहे हैं या फिर शायद उन्हें कोई भयंकर रोग मसलन कोढ़ वगैरह लग गया है, जिसकी वजह से वे परिवार से दूर चले गए हैं पर वे परिवार के आसपास ही बने रहना चाहते हैं. 
नदी के आसपास घूमने आए यात्रियों और किनारे पर बसे लोगों से यह भी पता चला कि पिता ने अब तक कभी भी दिन या रात में ज़मीन पर पाँव नहीं रखा. वे अकेले, दिशाहीन, किसी अपराधी की तरह नदी में यहाँ से वहाँ भटकते रहते. माँ और हमारे तमाम रिश्तेदारों का मानना था कि किश्ती में उन्होंने यक़ीनन कुछ खाना छुपा रखा होगा जो जल्दी ही ख़त्म हो जाएगा, तब या तो वे नदी छोड़कर किसी दूसरी जगह घूमने निकल पड़ेंगे, जो कम से कम इससे कुछ ज्यादासम्माननीय होगा या फिर पछताकर घर लौट आएँगे. 
दरअसल वे सच्चाई नहीं जानते थे! पिता के पास खान-पान का एक गोपनीय स्त्रा÷त था- मैं! हर रोज़ मैं उनके लिए खाना चुराकर ले जाता. पहली रात जब वे हमें छोड़कर गए थे, हम सब लकड़ियाँ जलाकर किनारे पर खड़े रहे और प्रार्थना करते रहे और उन्हें पुकारते रहे. मैं बेहद दुखी था और उनके लिए कुछ करना चाहता था. अगले दिन मैं नदी में उतरकर नीचे तक गया. अपने साथ मैं डबलरोटी का एक पूरा पैकेट, केले और कच्ची ब्राउन चीनी ले गया था. मैं देर तक बेचैनी से उनकी राह तकता रहा. फिर मुझे दूर, बहुत दूर एकमात्र थिरकती किश्ती दिखाई दी, जो नदी के शांत बहाव में तकरीबन अगोचर ही थी. पिता किश्ती के तले में बैठे थे. उन्होंने मुझे देखा पर न तो मेरी तरफ आए और न ही कोई इशारा किया. मैंने उन्हें खाना दिखाया और फिर नदी के किनारे बने एक खोह के अंदर रख दिया. मुझे यक़ीन था कि वहाँ जानवरों, बरसात और ओस से खाना सलामत रहेगा. लगातार कई दिनों तक मैं यही करता रहा. बाद में मैं दंग रह गया, जब मुझे पता चला कि माँ सब कुछ जानती थी. माँ जानबूझकर खाना ऐसी जगह रख देती, जहाँ से मैं आसानी से उठाकर ले जाउँ, किंतु उन्होंने कभी यह मुझ पर ज़ाहिर नहीं होने दिया. 
माँ ने खेती - बाड़ी तथा कारोबारी मसलों में मदद के लिए अपने भाई को बुलवा भेजा. हमारी पढ़ाई के लिए घर में ही एक टीचर का इंतज़ाम कर दिया गया क्योंकि काफ़ी समय से हमारी पढ़ाई छूट गई थी. एक दिन माँ के ही अनुरोध पर एक पुरोहित पूजा अर्चना का लिबास पहन नदी के किनारे गया और पिता पर हावी भूत – प्रेत की झाड़-फूंक करने लगा. उसने जोर जोर से चिल्लाकर पिता को समझाया कि उन्हें यह बेहूदा ज़िद छोड़ अपने फर्ज़ पूरे करने चाहिए. अगले दिन माँ ने फिर दो सिपाहियों को बुलाया, ताकि वे पिता को डरा-धमकाकर बाहर आने पर मजबूर कर सकें. पर पिता कभी कोई जवाब नहीं देते. कभी कोई उनके क़रीब नहीं जा सका. जब कभी अख़बार वाले उनकी तस्वीर खींचने आते तो पिता जो अब तक नदी का चप्पा-चप्पा जान गए थे, कहीं ओझल हो जाते, जबकि दूसरे लोग उन झाड़ियों में रास्ता खो बैठते. चारों तरफ घने बेलों और झाड़ियों से घिरे तथा आसपास की समूची रेल-पेल के बीच पिता अपनी इस निज़ी भूल-भूलैया में महफूज़ थे.
पिता के इस तरह नदी में रहने को लेकर अब तक हमें आदी हो जाना चाहिए था पर हम कभी ऐसा नहीं कर पाए. मुझे लगता है कि एक मैं ही था, जो कुछ हद तक समझता था कि वे क्या चाहते हैं और क्या नहीं? एक बात थी, जो मैं बिल्कुल नहीं समझ पा रहा था कि कैसे वे लगातार इतने कष्ट झेल पा रहे हैं? दिन-रात, कड़ी धूप और बरसात, गर्मी और कड़ाके की सर्दी, सिर पर केवल एक टोपी और बेहद कम कपड़ों में वे कैसे सप्ताह-दर-सप्ताह, महीने-दर-महीने, साल-दर-साल, निरूद्देश्य….लक्ष्यहीन… अपना जीवन गुज़ारते चले जा रहे थे. उन्होंने कभी ज़मीन या घास अथवा किसी द्वीप या फिर किनारे पर पाँव नहीं रखा. हाँ, कभी-कभार वे ज़रूर झपकी लेने के लिए किसी गुप्त जगह पर टापू के किनारे अपनी किश्ती बाँध देते. उन्होंने कोई आग या रोशनी यहाँ तक कि माचिस की तीली तक नहीं सुलगाई. उनके पास टॉर्च वग़ैरह भी नहीं थी. नदी के किनारे चट्टान की खोह में उनके लिए मैं जो खाना रखता था, उसमें से वे बहुत कम खाते, बस केवल उतना जितना जीने के लिए ज़रूरी था. पता नहीं इस सबका उनकी सेहत पर कैसा असर पड़ रहा था? मैं यह भी नहीं जानता था कि किश्ती को काबू में रखने के लिए लगातार चप्पू चलाते रहने में उनकी कितनी शारीरिक ताकत चली जाती होगी? जाने कैसे वे यदा-कदा नदी की बाढ़ और उसके तेज़ बहाव में आने वाली तमाम ख़तरनाक वस्तुओं, झाड़-झंखाड़ों, कंकालों और जानवरों से खुद को और अपनी उस छोटी सी किश्ती को बचा पाते होंगे?
उन्होंने कभी किसी जीते-जागते, धड़कते इंसान से बात नहीं की. हमने भी उनके बारे में बातें करना छोड़ दिया था. अलबत्ता, हम सदा उनके बारे में सोचते रहते. नहीं, पिता को अपने ज़ेहन से निकाल पाना नामुमकिन था. क्षण भर के लिए कभी-कभार ऐसा होता भी तो जिस भयानक हालात में वे जी रहे थे, उसका ख़्याल आते ही हम मानो सोते से अचानक चौंककर जाग उठते. 
मेरी बहन का विवाह हो गया, माँ ने कोई ताम-झाम, दावत वग़ैरह नहीं दी. यह सब दुख ही देता क्योंकि हम कुछ भी करते या अच्छा खाते-पीते तो हमें हर क्षण पिता का ही ख़्याल आता. सर्द तूफ़ानी रातों में जब हम अपने आरामदेह बिस्तरों में होते, तब वहाँ घने अंधकार में पिता अपने हाथों और चप्पू से किश्ती बचाने में जुटे रहते. अकेले और असुरक्षित. अक्सर लोग मुझे देखकर कहते कि मैं धीरे-धीरे पिता की शक्ल अख़्तियार करने लगा हूँ. पर मैं जानता था कि अब तक तो पिता के पूरे बाल और दाढ़ी खुरदरी और सफ़ेद हो चुकी हेंगी. नाख़ून बढ़ चुके होंगे. मुझे अक्सर एक दुबले-पतले, कमज़ोर व बीमार, धूप से झुलसे क़रीब-क़रीब नग्न व्यक्ति के रूप में पिता की छवि दिखाई देती, हालाँकि मैं कभी-कभार खोह में उनके लिए कुछ कपड़े रख दिया करता था. 
ऐसा लगता मानो उन्हें हमारी रत्ती भर भी परवाह नहीं थी. पर अब भी मुझे उनसे गहरा लगाव और उनके प्रति आदर था. जब भी लोग मेरे अच्छे कामों की तारीफ़ करते तो मैं यही कहता, “ मेरे पिता ने ही यह सब सिखाया है.”
यह एकदम सही तो नहीं था, पर सच्चाई भरा एक झूठ था. मैं कह ही चुका हूँ, पिता को हमारी रत्तीभर भी परवाह नहीं थी, पर फिर क्यों वे हमारे आसपास बने हुए थे? वे क्यों नहीं नदी के इस तरफ़ या उस तरफ़ के छोर पर दूर निकल जाते, जहाँ से न हम उन्हें दिखाई दें और न ही वे हमें दिखाई दे पाएँ. इसका जवाब तो वही दे सकते थे. 
मेरी बहन ने पुत्र को जन्म दिया. उसके ज़ोर देने पर हम पिता को उनका नाती दिखाने ले गए. एक खुशनुमा सुबह हम सब नदी किनारे गए. मेरी बहन ने विवाह का सफ़ेद जोड़ा पहन रखा था. उसने अपने बेटे को ऊपर उठाया. बच्चे के पिता ने उसके ऊपर छाता तान रखा था. हम ज़ोर-ज़ोर से पिता को पुकारते रहे और इंतज़ार करते रहे पर पिता बाहर नहीं निकले. मेरी बहन रो पड़ी. हम सभी एक-दूसरे से गले लगकर बिलखने लगे.
मेरी बहन और उसका पति रहने के लिए कहीं दूर चले गए. मेरा भाई भी शहर छोड़ चला गया. वक़्त तेज़ी से गुज़रता रहा. आखिर माँ भी चली गई. वह बूढ़ी हो चुकी थी. वह अपनी बेटी के पास रहने चली गई. सिर्फ़ मैं रहा गया- अकेला. विवाह करने का मुझे कभी ख़्याल ही नहीं आया. मैं बस अपने जीवन की इस विडंबना में अटका रह गया. नदी में अकेले निराधार भटकते  पिता को मेरी ज़रूरत थी. मैं जानता था, उन्हें मेरी ज़रूरत है, हालाँकि उन्होंने मुझे कभी बताया तक नहीं कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? जब मैं लोगों से ज़बर्दस्ती जानना चाहता तो वे महज इतना ही कहते कि सुना है, तुम्हारे पिता ने किश्ती बनाने वाले को सब कुछ बताया था पर अब वह भी गुज़र चुका है और किसी को कुछ भी पता और न ही याद है. जब कभी लगातार मूसलाधार बरसात होती तो लोग मूर्खताभरी बातें करते कि पिता ने किसी बाढ़ या तूफ़ान के अंदेशे से पहले ही किश्ती तैयार करवा ली, अब तो मुझे भी कुछ याद नहीं है. चाहे जो हो, मेरे पिता जो कुछ भी कर रहे थे, मैं कभी उनकी निंदा या आलोचना नहीं कर पाऊँगा. अब तो मेरे बाल भी सफेद होने लगे थे. मेरे पास कहने के लिए केवल दुख भरी बातें हैं. मैंने ऐसा क्या बुरा किया था, मेरा क्या कसूर था? मेरे पिता मुझसे दूर किंतु उनकी ग़ैर-मौजूदगी हमेशा मेरे ज़ेहन में बसी रहती. और नदी, लगातार खुद को पुनःजीवित करती रहती. मैं बुढ़ापे के करीब पहुँचने लगा था, जहाँ जीवन थम सा जाता है. मुझे लगातार बीमारी और बेचैनी के दौरे पड़ते. मैं दिनोंदिन झगड़ालू क़िस्म होने लगा था. न जाने कहां से झगड़ने की प्रवृति मुझमें बढ़ने लगी थी और वे? आखिर क्यों वे ऐसा कर रहे थे? यक़ीनन उन्हें बेहद कष्ट झेलना पड़ता होगा. वे बहुत बूढ़े हो चुके थे. संभवतः किसी दिन अपनी ख़त्म होती साँसों को देखते हुए वे किश्ती को शायद उलट जाने दें या नदी की गहराई में इतना नीचे ले जाएँ, जब तक किश्ती डूब न जाए. मेरे दिलोदिमाग पर हमेशा तनाव बना रहता. पिताजी वहां नदी पर रहते और यहां मेरा सुख चैन हमेशा के लिए छिन गया था. मैं सदा एक अपराध-बोध से घिरा रहता. मैं यह भी नहीं जानता था कि क्यों? यह यातना मुझे भीतर तक एक खुले ज़ख्म की तरह सालती रहती. शायद मैं जान पाता यदि चीजें कुछ अलग होतीं. मैं सोचता रहता कि कहाँ क्या गलत घट रहा है?
क्या मैं पगला गया था? नहीं, हमारे घर में यह शब्द कभी जुबान पर नहीं लाया गया. इन तमाम बरसों में कभी नहीं. किसी ने कभी किसी को पागल नहीं कहा और कोई पागल था भी नहीं. या फिर शायद सभी पागल थे. अब मैं महज यह करता कि वहाँ जाता और रूमाल हिलाता ताकि वे मुझे देख सकें. मेरा खुद पर पूरा नियंत्रण था. आख़िर दूर एक अस्पष्ट सी आकृति किश्ती में बैठी दिखाई देती. मैंने कई-कई बार उन्हें पुकारा और चिल्ला-चिल्लाकर वह सब कहा जिसे कहने के लिए मैं कितना उतावला हो रहा था. मैंने पूरी ताकत लगाकर ज़ोर से पूरे प्रण और मन से कहा – 
“ पिताजी, आप काफ़ी लंबे समय से वहाँ हैं. अब आप बूढ़े हो चुके हैं, लौट आइए, अब आपको ऐसा करने की कोई ज़रूरत नहीं है…लौट आइए और आपकी जगह मैं चला जाऊँगा. यदि आप चाहें तो इसी वक्त, इसी पल से मैं किश्ती में रहूँगा… मैं आपकी जगह लूँगा.”
और जब मैंने यह सब कहा, मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा. 
उन्होंने मेरी बात सुनी. वे खड़े हो गए. फिर चप्पुओं के सहारे अपनी किश्ती मेरी तरफ घुमा दी. उन्होंने मेरा प्रस्ताव मान लिया था. अचानक मैं भीतर तक कांप उठा, क्योंकि पहली बार, इन तमाम बरसों में पहली बार उन्होंने अपना हाथ उठाकर हिलाया था और मैं निश्चल खड़ा रहा… कुछ नहीं कर पाया. 
भय से मेरे रोंगटे खड़े हो गए, फिर मैं भागा, बेतहाशा भागने लगा. वे शायद किसी और ही मिट्टी के बने थे… किसी दूसरी दुनिया के… मैं क्षमा चाहता हूँ. क्षमा याचना… केवल क्षमा.
मुझे भयानक ठंड ने जकड़ लिया जो अमूनन किसी क़िस्म के भय से होती है. मैं बीमार पड़ गया. उसके बाद किसी ने न उन्हें कभी देखा और न ही उनके बारे में कभी सुना. क्या ऐसी विफलता के बाद मैं आदमी कहलाऊँगा? मुझे ऐसा नहीं होना चाहिए था. मुझे अब चुप ही रहना चाहिए. मैं जानता हूँ, अब बहुत देर हो चुकी है. मुझे किसी रेगिस्तान में रहना चाहिए; अपने जीवन की हर परछाई से दूर और मुझे डर है कि शायद मैं अपनी जीवन-लीला समाप्त कर दूँगा पर जब मेरी मृत्यु हो तो मैं चाहता हूँ, मुझे नदी के इन लंबे छोरों के बीच अनवरत बहते पानी में एक छोटी सी किश्ती में लिटा दिया जाए और मैं नदी के भीतर…अथाह गहराई में खो जाऊँ, हमेशा-हमेशा के लिए समा जाऊँ! 
==========

अनुवाद- अनुराधा महेद्र


अनुराधा महेद्र

एस आई ई एस से बी ए, मंबई विश्वविद्यालय से एम ए
भारतीय औद्योगिक विकास बैंक में उप महा प्रबंधक के पद पर कार्यरत.

प्रकाशित किताबें-
1- विश्व के अमर कथाकार -विश्व के 20 नोबेल पुरस्कार विजेता रचनाकारों की चुनी हुई कहानियों का संकलन  
2- कहानियों से गुजरती बीसवीं सदी- बीसवीं सदी के विश्व विख्यात कथाकारों की कहानियों के अनुवाद 
3- एक स्त्री की जिंदगी के चौबीस घंटे- जर्मन के महान कथाकार स्टीफन ज़्विग की कहानियों का संग्रह
4- बिवेर ऑफ पिटी- (कायर)  स्टीफन ज़्विग द्वारा रचित एकमात्र उपन्यास का अनुवाद प्रकाशनाधीन
पुरस्कार - भारत सरकार के केद्रीय हिन्दी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालयद्वारा  `विश्व के अमर कथाकार' के लिए  वर्ष 2001-2002 के लिए अनुवाद का 50 हजार रुपये का पुरस्कार प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी के हाथों से प्रदत्त. 
* आईडीबीआई बैंक की हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका `विकास प्रभा' के कार्य से पिछले 20 वर्षों से जुड़ाव जिसमें प्रकाशित लेखों, फीचर लेखन को गृह पत्रिकाओं की प्रतिष्ठित संस्था एसोसिएशन ऑफ बिजनेस कम्युनिकेटर्स द्वारा विभिन्न श्रेणियों में कई पुरस्कार *देश की प्रतिष्टित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों के अनुवाद और लेख प्रकाशित.
*आकाशवाणी और विविध भारती से तमाम विषयों पर वाताएं ( Talk) प्रसारित.
*डिसकवरी चैनल के लिए अनुवाद कार्य

1 comments:

  1. लोकजीवन पर आधारित बहुत ही खूबसूरत कहानी.

    रूपसिंह चन्देल

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