स्वतंत्र भारत एशिया महाद्वीप ही नहीं; प्रत्युत सारे विश्व की शांतिकामी और प्रगतिशील जनता की आशाओं-आकांक्षाओं का केन्द्र है। भारत का गौरव महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, आचार्य विनोबा भावे प्रभृति महापुरुषों की व्यापक एवं उदार मानवतावादी विचार-धारा तथा उनके द्वारा सम्पादित मानव-कल्याण के महान् कार्यों से अत्यधिक बढ़ा। नये और सशक्त भारत का परिचय — भारतीय स्वतंत्रता की कहानी तथा महापुरुषों की जीवन-गाथाओं से प्राप्त होता है।
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प्रत्येक प्राणी स्वतंत्रता चाहता है। दासता की शृंखलाओं से उसे घृणा है। सब प्राणियों में मनुष्य सबसे उन्नत और विवेकशील प्राणी है। ऐसी अवस्था में स्वतंत्रता की चाह उसमें उत्कट रूप में होनी ही चाहिए। स्वतंत्रता की भावना मनुष्य की मनुष्यता का एक अंग है। जो मनुष्य स्वंतत्रता नहीं चाहता अथवा उसके पाने के प्रयत्न नहीं करता वह पशु से भी गया गुज़रा है। वह धरती पर व्यर्थ का भार है। उसे मानवीय जीवन अपनाने का अधिकार नहीं।

‘स्वतंत्रता !’ कितना प्यारा शब्द है। ‘स्वतंत्रता’ शब्द को सुनकर हमारा मस्तक ऊँचा उठ जाता है। हृदय में आनन्द की हिलोरें उठने लगती हैं। परतंत्रता के साथ समस्त सुख-सुविधाएँ भी हेय हैं ; पर स्वतंत्रता के साथ भूख, ग़रीबी और कष्ट भी अंगीकार करने योग्य हैं। महाकवि तुलसीदास के शब्दों में — ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।’

मनुष्य ने सभी कालों और सभी देशों में स्वतंत्रता-देवी को वरण करने के लिए असंख्य बलिदान किये हैं। बिना उसको पाये वह एक पल भी चैन से नहीं बैठा है; क्योंकि स्वतंत्रता उसके देश के स्वाभिमान की रक्षिका है। और देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए मर-मिटने में ही मनुष्य की महानता है। ऐसे मनुष्यों के नाम मानवीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखे जाते हैं। वे हमारे प्रेम, आदर और श्रद्धा के पात्र होते हैं। इतिहास हमें बताता है कि एकता की भावना के अभाव के कारण हमारे देश भारत की स्वतंत्रता जाती रही। साम्राज्य-लोलुप अँग्रेज़ एक दिन सौदागर के वेष में हमारी धरती पर आये और हमसे व्यापार की सुविधाएँ माँगीं। भारत ने अपनी परम्परागत उदारता के फलस्वरूप सहज ही उन्हें वे सुविधाएँ प्रदान कीं । पर, जिस तरह उँगली पकड़कर पहुँचा पकड़ा जाता है; ठीक उसी तरह अँग्रेज़ों ने धीरे-धीरे हमारी दुर्बलताओं से लाभ उठाकर पूरे देश पर अधिकार कर लिया। भारत पराधीन हो गया। हम, हमारी धरती, हमारा आसमान और हमारा भविष्य सब परतंत्रता के कठोर-सीख़चों में आबद्ध हो गये।

पर, हमारी स्वतंत्रता की भावना को कुचला न जा सका। विदेशी शासन के विरुद्ध भारतीयों ने संघर्ष किये। भारतीय स्वाधीनता-संग्राम की पहली लड़ाई सन् 1857 में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में लड़ी गयी। आगे चलकर सन् 1885 में ‘अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना हुई; जिसने सम्पूर्ण देश में स्वातंत्र्य-संग्राम को सुव्यस्थित रूप दिया तथा जिसके तत्त्वावधान में अनेक आन्दोलन हुए। सर्वप्रथम लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वंतत्रता का महामन्त्र फूँका और ‘स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का हमें प्रेरणादायक नारा दिया। महात्मा गाँधी ने काँग्रेस के तत्त्वावधान में अनेक आन्दोलनों का सूत्रपात किया। सन् 1920-21 के असहयोग और सविनय आज्ञा-भंग के आन्दोलन ने राष्ट्रीय चेतना के फैलाने में सर्वाधिक योग दिया। सरदार भगतसिंह आदि के बलिदान ने स्वतंत्रता की ज्वाला को और प्रज्वलित कर दिया। 26 जनवरी 1930 को श्री जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर-अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता के प्रस्ताव की घोषणा की। सन् 1942 में एक ओर गाँधीजी ने ‘करो या मरो’ और ‘भारत छोड़ो’ का मंत्र प्रदान किया तो दूसरी ओर सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में ‘आज़ाद हिन्द फौज’ का अभियान ‘दिल्ली चलो’ के नारे के साथ प्रारम्भ हुआ। इस घटना ने अँग्रेज़ी शासन के प्रति भारतीय सैनिकों की वफ़ादारी को सामप्त-सा कर दिया। समूचा भारतवर्ष स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिए तड़प उठा। जगह-जगह अपूर्व बलिदान हुए।

इसी बीच महायुद्ध के कारण ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति बिगड़ी। साम्राज्यवादियों ने देखा कि अब भारत पर शासन करना बड़ा दुरूह और महँगा है ; अतः उन्होंने उसे स्वतंत्र करने की घोषणा की; जिससे उनके आर्थिक हित सुरक्षित रह सकें। यही नहीं, भारत को सदैव कमज़ोर बनाये रखने की नीयत से उन्होंने उसके दो टुकड़े भी कर दिये। भारतीय नेताओं को विवश होकर विभाजन स्वीकार करना पड़ा; क्योंकि अस्वीकृति की दशा में स्वतंत्रता-प्राप्ति में विलम्ब तो होता ही, सम्पूर्ण देश हिन्दू-मुस्लिम दंगों से जर्जरित भी हो जाता और इस प्रकार हमें बहुत बड़ी राष्ट्रीय हानि चुकानी पड़ती । अन्त में 15 अगस्त 1947 के दिन देश की बागडोर हमारे प्रिय नेताओं के हाथ में आ गयी। 15 अगस्त 1947 का दिन हमारी जनता का, लगभग 200 वर्षों की दासता से मुक्ति-प्राप्ति का दिन है। 15 अगस्त ने हमारे देश के बहुमुखी विकास के द्वार खोल दिये और हमें विश्व के अन्य उन्नत देशों की पंक्ति में खड़ा होने योग्य बनाया। 15 अगस्त हमारी विजय के उल्लास का दिन है। वह असंख्य बलिदान हुई आत्माओं की मनोकामनाओं के पूर्ति का दिन है। उसे हम एक राष्ट्रीय-पर्व के रूप में प्रतिवर्ष मनाते हैं।

स्वतंत्रता-दिवस को नगर में ‘प्रभात फेरियाँ’ निकलती हैं। ‘वन्देमातरम्’ और ‘जन-गण-मन’ के राष्ट्रीय गानों के साथ चक्र-चिन्हित तिरंगा राष्ट्रीय झंडा फहराया जाता है। पुलिस-परेड, खेल-कूद, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं — जिनमें वाद-विवाद, कवि-सम्मेलन, नाटक आदि प्रमुख हैं। रात को नगर में रोशनी की जाती है। इस प्रकार बड़ी धूम-धाम और बड़े उत्साह के साथ हम प्रतिवर्ष 15 अगस्त के राष्ट्रीय त्योहार को मनाते हैं।

स्वतंत्रता का यह अर्थ नहीं है कि हम मनमानी करें। ‘स्वतंत्र’ शब्द ‘स्व’ और ‘तंत्र’ शब्दों से बना है। अतः स्वतंत्रता का अर्थ हुआ, अपने द्वारा निर्मित नियमों के अनुसार जीवन-यापन करना। कुछ लोग स्वतंत्रता को नासमझी के कारण अराजकता समझ बैठते हैं। जिस तरह हमें अपना विकास करने की स्वतंत्रता हैं उसी प्रकार दूसरे को भी। उदाहरण के तौर पर कहा जाता है — ‘आपको स्वतंत्रता है आप जिस तरह चाहे लाठी चला सकते हैं, पर यह स्वतंत्रता वहाँ समाप्त हो जाती है, जहाँ से मेरी नाक शुरू होती है ; क्योंकि वह मेरी स्वतंत्रता का क्षेत्र है।’ आज हमारा कर्तव्य है कि हम स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ जनता को बताएँ और तन-मन-धन से उसकी रक्षा की दृढ़ प्रतिज्ञा करें। 15 अगस्त के दिन स्वातंत्र्य-संग्राम के शहीदों के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करना भी हमारा नैतिक और मानवीय कर्तव्य है। 15 अगस्त को हमने जो अपनी खोयी हुई स्वतंत्रता प्राप्त की है वह अमर हो ! हम और दुनिया के अन्य सभी देश अपने-अपने स्वतंत्रता-दिवस सदैव उत्साह और उल्लास से मानते रहें।

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