दण्डकारण्य समाचार का प्रकाशन 1959 से आरंभ हुआ और तब से ही यह अखबार इस अंचल की खबरों का प्रामाणिक जरिया बना हुआ है। इतना ही नहीं वर्ष 1959 से लगभग वर्ष 1975 तक की बस्तर अंचल की जानकारी के लिये आपको दण्डकारण्य पर ही निर्भर रहना होगा। {मेरी पहली कहानी भी दण्डकारण्य में ही प्रकाशित हुई थी।} तुषार कांति बोस और मणिकुंतला बोस ने पत्रकारिता के बाजार बन जाने के बाद भी बाजार की पत्रकारिता कभी नहीं की। पीले से पन्नों में निकलने वाला यह अखबार देखते ही देखते कुछ राज्यों की सीमाओं को भी लांघ गया तथा अब इसका ई-संस्करण भी उपलब्ध है। दण्डकारण्य समाचार के 50 साल पूरे होने के अवसर पर प्रकाशित जिज्ञासा शीर्षक से दो पुस्तके प्रकाशित हुई हैं। आप चाहे तो इन्हें अखबारी कतरनों का क्रमवार संयोजन कह सहते हैं। वह इकलौता अखबार जिसने दशकों तक अंचल की महत्वपूर्ण घटनाओं को बनते ही नहीं देखा बल्कि उसके संवाददाताओं नें हर घटना के प्रत्यक्षदर्शी की तरह विवेचना प्रस्तुत की वह अब अपनी पीढी के लिये उपलब्ध है। ये पुस्तके केवल समय का दस्तावेज नहीं बस्तर अंचल की बहुमूल्य धरोहरें हैं।

जिज्ञासा भाग -1 544 पृष्ठों का संकलन है तथा भाग दो में लगभग 250 पृष्ठ हैं। दण्डकारण्य परियोजना का दंश जब पूर्वी पाकिस्तान से आये शरणार्थियों को बस्तर में बसाया जा रहा था इस संकलन का पहला प्रस्तुत समाचार है तिथि है 17 मई 1956 (रविवार); इससे सम्बन्धित अगले समाचारों में एक तस्वीर ने ध्यान खींचा जहाँ विस्थापित परिवार तम्बू में किस तरह रह रहे थे दर्शाया गया है। यहाँ जोडना चाहूंगा कि पूरे संकलन में तस्वीरों का स्तर बहुत अच्छा नहीं है। तस्वीरें धुंधली प्रकशित हुई है तथापि वे एक पूरे समय को देखने समझने में कम सहायता नहीं करती।

राजपरिवार की राजनीति, राजपरिवर के साथ हुई राजनीति, लेव्ही प्रकरण, धान की कमी के समय बस्तर, प्रवीर के आन्दोलन, प्रवीर की हत्या, विजय चन्द्र भंजदेव के वक्तव्य, महारानी वेदवती का संघर्ष, बाबा बिहारीदास का उत्थान, पतन, क्षेत्रीय राजनीति में कब किस राजनीतिक दल की पैठ, मालिक मकबूजा, लौहण्डीगुडा गोली कांड, किरंदुल गोली कांड, पखांजुर गोली कांड, बैलाडिलाखदान का आगमन, पहली रेल का आगमन, आकाशवाणी-दूरदर्शन की शुरुआत, मध्यप्रदेश सरकार के दौरान बस्तर की स्थिति, अलग अलग समयों में परियोजनाओं की घोषणाये व उनका हश्र, दण्डक गुफा जैसे पर्यटन स्थलों की खोज, बस्तर का जिलों में विभाजन और उनके कारण, छत्तीसगढ राज्य का निर्माण और उसके बाद का बस्तर, सलवाजुडुमके कारण, परिणाम, 1980 से पहले के वे समाचार जिनमें नकसलियों की आमद का जिक्र है के साथ साथ उनका बढता प्रभाव, उनकी वारदाते, उनके प्रभावित, बहुत से समाचार आँखें खोलने वाले हैं। कई समाचार एसे हैं जो नक्सलवाद की नृशंसतम घटनाओं का हू बहू प्रस्तुतिकरण है तथा हत्यारों और क्रांति की भावना के बीच का फर्क समझने में सहायक हैं। कई लेख हैं जो बस्तर के लिये झूठे आँसू बहा कर मानवाधिकार की दूकान खोलने वालों को धिक्कारते हैं।

इस पुस्तक का महत्व इस बात से और भी बढ जाता है कि समाचारो के अलावा बस्तर की संस्कृति, आदिवासी जीवन शैली, घोटुल, रामायण कालीन बस्तर, बस्तर की वन सम्पदा, वन-औषधियाँ, पुरातात्विक महत्व आदि से सम्बन्धित आलेख प्रस्तुत किये गये हैं जिन्हे लिखने वाली कलमे आज भी स्तुत्य हैं। कुछ महत्वपूर्ण लेखकों ने नाम भी उद्धरित कर रहा हूँ – पं गंगाधर सामंत, सुन्दर लाल त्रिपाठी, लाला जगदलपुरी गोरेलाल झा, श्याम सुन्दर देव, बंशीलाल श्रीवास्तव, शिवशंकर मिश्र, रामसिंह ठाकुर, सुभाष पाण्डेय, डॉ. के के झा, हरिहर वैष्णव आदि।

कुछ शिकायते भी हैं। बहुत कुछ बहुत महत्वपूर्ण घटनायें संकलन में छूट भी गयी है। राष्ट्रीय समाचारों के संकलन से बचा भी जा सकता था क्योंकि उनकी प्राप्ति के अनेक स्त्रोत उपलब्ध हैं। बस्तर पर केन्द्रित अंक निकाला जाता तो बहुत से और समाचारों को जगह मिल पाती और बेहतर दस्तावेजीकरण हो सकता। जिज्ञासा के अंक दो में स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनिया, स्वास्थ्य सम्बधी लेख आदि की जगह अब तक प्रकाशित महत्वपूर्ण कहानियाँ, आलेख, संस्मरण आदि को जगह दी जाती तो संकलन की महत्ता और बढ जाती। तथापि जिज्ञासा ‘दो अंको’ मे प्रकाशित एक बहुत बडा प्रयास है जो संग्रणीय है। बस्तर को जानने की जिज्ञासा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इन्हें पढना चाहिये।

[दण्डकारण्य समाचार नें दोनो संकलन का कुल मूल्य 500 रुपये रखा है] 

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