13 अगस्त। यह दिन दुनिया भर में लैफ्ट हैंडर्स डे के रूप में मनाया जाता है। जब भी इस तरह के किसी डे की बात पढ़ता हूं तो यही अफसोस होता है‍ कि बरस भर के बाकी दिन तो दूसरों के लिए लेकिन एक दिन आपका। अब चाहे मदर्स डे हो या फादर्स डे। साल में सिर्फ यही दिन आपका। भले ही अपने देश का करवा चौथ का व्रत ही क्यों  न हो। बेचारे पति के हिस्से  में पूरे बरस में एक ही दिन आता है। जवाब में आप ये भी कह सकते हैं कि बेचारी महिलाओं के हिस्सें में भी तो बरस भर में एक ही वीमेंस डे आता है। बाकी दिन तो उन्हें कोई  नहीं पूछता।

मुझे याद पड़ता है कि हमारे बचपन में खब्बुओं को मार-मार कर सज्जू कर दिया जाता था। (पंजाबी में बायें हाथ को खब्बाक और दायें हाथ को सज्जास हाथ कहते हैं)। मजाल है आप कोई काम खब्बे  हाथ से कर के दिखा दें। घर पर तो पिटाई होती ही थी। मास्टर लोग भी अपनी खुजली उन्हें  मार-मार कर मिटाते थे। दुनिया में पूरी जनसंख्या  के 13 से 14 प्रतिशत लोग खब्बू  हैं, लेकिन ये भारत में ही और वो भी उत्तूर भारत में ज्यादा होता है‍ कि बायें हाथ से काम करने वाले को पीट-पीट कर दायें हाथ से काम करने पर मजबूर किया जाता है। उसका मानसिक विकास तो रुकेगा ही जब आप प्रकृति के खिलाफ उस पर अपनी चलायेंगे।  

दरअसल ये जो दुनिया है ना, लगता है, दायें हाथ से काम करने वालों के लिए ही  बनी है। सारी मशीनरी, सारे उपकरण, औजार, आविष्कार, खेलकूद, संगीत के उपकरण यानि इस्तेमाल में आने वाला जो कुछ भी है, उसे दायें हाथ से काम करने वालों के लिए ही बनाया गया है। या यूं कह लें कि उन्हों ने सब कुछ अपने हिसाब से बना लिया और बायें हाथ से काम करने वालों को अंगूठा दिखा दिया। भला दुनिया भर के 87 प्रतिशत राइट हैंडर्स ये कैसे बरदाश्ते करते कि कोई उनकी बनायी व्यावस्था  के खिलाफ जाये। अपने देश का तो ये हाल है कि आप बायें हाथ से किसी को पैसे या कुछ और दे ही नहीं सकते। भिखारी भी बायें हाथ से दी गयी भीख नहीं लेते। और तो और भाषा में भी खब्बु ओं के लिए गुजाइश नहीं छोड़ी गयी। आप सही हैं तो यू आर राइट, और आपका रास्तां सही है तो यू आर ऑन राइट ट्रैक। सही होने के लिए दायें हाथ का अंगूठा ही उठाया जायेगा। पता नहीं, कुछ देशों में लेफ्ट हैंड ड्राइव कैसे है।

ये तो भला हो कि दुनिया के सभी लेफ्टी एक मंच पर जुटे, अपने लिए हक मांगे, अपनी जरूरत की चीजों का खुद आविष्कासर किया और बरस में बेशक एक दिन ही सही, 13 अगस्तज अपने नाम करवा लिया। अब ये दिन दुनिया भर में लेफ्ट हैंडर्स डे के रूप में मनाया जाता है और उनके हक की बात की जाती है। वैसे भी ये माना जाता है कि बायें हाथ से काम करने वाले ज्याकदा अंतर्मुखी, संवेदनशील, कलाकार, और रचनात्मक गुणों से भरे होते हैं  लेकिन संकट यही है कि उन्हें चैन से लेफ्टी भी नहीं रहने दिया जाता। मार-मार कर उन्हें लेफ्ट राइट के बजाये राइट राइट कर दिया जाता है।  

 मेरे पिता बेशक खब्बू थे लेकिन बचपन में हुई पिटाई के कारण दायें हाथ से लिखने के अलावा जीवन भर अपने सारे काम बायें हाथ से करते रहे। चाहे टेबिल टेनिस खेलना हो, कैरम खेलना हो या खाना खाना हो।

यही हाल मेरे बड़े भाई का रहा। वे खब्बू  होने के बावजूद लिखने सहित अपने सारे काम दायें हाथ से करने को मजबूर हुए। पिटाई के कारण सहज मानसिक विकास रुका, हकलाने लगे और सबके मज़ाक का पात्र बने। नतीजा ये हुआ कि अकेले होते चले गये, पढ़ाई में पिछड़ने लगे और जिंदगी में जितनी तरक्की कर सकते थे, नहीं कर पाये। औसत से कम वाली जिंदगी उनके हिस्‍से में आयी। 

मेरा छोटा बेटा भी खब्बू है। लेकिन उसे अपने सारे काम बायें हा‍थ से करने की पूरी छूट है। बेशक वह गिटार दायें हाथ से बजा लेता है और पीसी पर माउस भी दायें हाथ से ही चलाता है। पीसी की वजह समझ में आती है कि पीसी पूरे घर का सांझा है और वह इस बात को ठीक नहीं समझता कि बार बार सेटिंग करके माउस को अपने लिए लैफ्ट हैंडर बनाये। बाकी काम वह बायें हाथ से ही करता है। जब से उसे लैपटाप मिला है, अब उसने उस पर अपने हिसाब से सेटिंग कर ली है।

मैंने सिर्फ गुजरात में ही देखा कि क्लास में और ट्रेनिंग सेंटर्स में भी इनबिल्टस मेज वाली कुर्सियां लैफ्ट हैंडर्स के लिए भी होती हैं बेशक तीस में से पांच ही क्यों  न हों।

कहा जाता है कि पहले के ज़माने में युद्धों में बायें हाथ से लड़ने वालों को बहुत तकलीफ होती थी। वे मरते भी ज्यादा थे क्योंकि सामने वाले के बायें हाथ में ढाल है और दायें में तलवार। वह अपने सीने की रक्षा करते हुए सामने वाले के सीने पर वार कर सकता था लेकिन खब्बूर महाशय के बायें हाथ में तलवार और दायें हाथ में ढाल है। बेचारा दिल तो उनका भी बायीं तरफ ही रहता था। नतीजा यही हुआ कि लड़ाइयों की वजह से खब्बू। ज्याददा शहीद होते रहे और दुनिया की जनसंख्या में उनका प्रतिशत भी कम हुआ। ये एक कारण हो सकता है।

मैं विदेशों की नहीं जानता कि वहां पर लैफ्ट हैंडर्स के साथ क्याह व्य वहार होता है। लेकिन ये मानने में कोई हर्ज नहीं कि उन्हें सम्माथन तो मिलता ही होगा उन्हें  भी तभी तो वे लैफ्ट हैंडर्स डे मनाने की सोच सकते हैं। पिटाई तो उनकी वैसे भी नहीं होती। आइये जानें दुनिया के कुछ खास खास खब्बुोओं के बारे में। जरा सोचिये, अगर इन सबको भी पीट पीट कर सज्जूे बना दिया जाता तो क्या  होता। 

ये है सूची – महात्मा गांधी, सिंकदर महान, हैंस क्रिश्चियन एंडरसन, बिस्मा र्क, नेपोलियन बोनापार्ट, जॉर्ज बुश सीनियर, जूलियस सीजर, लुइस कैरोल, चार्ली चैप्लिन, विंस्टरन चर्चिल, बिल क्लिंटन, लियोनार्डो द विंची, अल्बीर्ट आइंस्टी न, बेंजामिन फ्रेंकलिन, ग्रेटा गार्बो, इलियास होव, निकोल किडमैन, गैरी सोबर्स, ब्रायन लारा, सौरव गांगुली, वसीम अकरम, माइकल एंजेलो, मर्लिन मनरो, पेले, प्रिंस चार्ल्स्, क्वीआन नी विक्टोीरिया, क्रिस्टोटफर रीव, जिमी कोनर्स, टाम क्रूज, सिल्वेयस्ट र स्टेचलोन, बीथोवन, एच जी वेल्सत और अपने देश के बाप बेटा बच्च्न जी।

है ना मजेदार लिस्ट ।

एक अजीब बात है कि हम अपने ही खब्बू  साथियों के बारे में कितना कम जानते हैं। उनकी तकलीफें, जरूरतें, उनकी सुविधाएं और उनकी परेशानियां हम हमेशा अनदेखी कर जाते हैं। वैसे तो मैंने ये भी देखा है कि खुद खब्बूं लोग अपनी दुनिया यानी खब्बुजओं की दुनिया के बारे में कुछ नहीं जानते। मैंने खुद सैकड़ों खब्बुदओं को बताया होगा कि बरस में एक दिन यानी 13  अगस्त उनके नाम पर भी होता है। आज तक मुझे अपने बेटे के अलावा एक भी लैफ्टी ऐसा नहीं मिला जिसे इस दिन के बारे में पता हो। 

एक बार मेरे मित्र प्रेम चंद गांधी का जयपुर से फोन आया था। वे राजस्थाोन में रहने वाले किसी खब्बूर लेखक के बारे में जानना चाह रहे थे। सचमुच हमारे पास इस बात के कोई आंकड़े नहीं हैं कि कितने हिन्दी लेखक वामपंथी विचारधारा के होते हुए भी दायें हाथ से लिखते हैं और कितने नरम वादी होते हुए भी बायें हाथ से लेखनी चलाते हैं।

चलिये आपको खब्बूत संसार की एक मनोरजंक यात्रा कराते हैं-  

ये अमरीकी राष्ट्रंपति खब्बून थे – जेम्स  ए गारफील्ड , (1831-1881) बीसवें, हरबर्ट हूवर, (1874-1964) इकतीसवें, हैरी एस ट्रूमून (1884-1972) तेतीसवें, फोर्ड (1913-2006) अड़तीसवें, रोनाल्डू रीगन (1911-2004) चालीसवें, जॉजर्      बुश (1924-) इकतालीसवें, बल क्लिंटन (1946- ) बयालीसवें।

ज्याबदातर खब्बू- ड्राइवर पहली ही बार में ड्राइविंग टैस्ट पास कर लेते हैं।

गुजरात में ही आपको सबसे ज्या‍दा खब्बू डाक्टर मिलेंगे।

गुजरात में आपको कई पति पत्नी‍ दोनों ही खब्बू मिल जायेंगे।

दुनिया भर के खब्बुओं को एक मंच पर लाने के लिए एक वेबसाइट है www.lefthandersday.com। इस साइट पर कोई भी खब्बू सदस्य बन सकता है।

ये साइट तरह तरह की प्रतियोगिताएं, सर्वेक्षण आदि आयोजित करती है।

खब्बुओं की जरूरतें बेशक वही होती हैं जो सज्जुओं की होती हैं लेकिन उनके हाथ की करामात अलग होती है। 

ढेरों चीजें हैं जो हम रोजाना इस्तेहमाल करते हैं - कैंची, कटर, रसोई का सामान, कीबोर्ड, गिटार, माउस, पैन, स्क्रूं ड्राइवर यानि सब कुछ। ऐसे में कोई दुकान भी तो होगी जो इनका ख्याल रखे और सब कुछ खब्बुओं को ही बेचे। ये दुकान है -    http://www.anythinglefthanded.co.uk। यहां सिर्फ और सिर्फ खब्बुओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चीजें मिलती हैं।

अक्स‍र जुड़वां बच्चों  में से एक खब्बूक होता है।

हकलाना और डाइलेक्सिया जैसे रोग खब्बुोओं के हिस्सेस में ज्याबदा आते हैं क्योंकि उन्हें ठोक पीट कर सज्जूो बनाने की कोशिशें सबसे ज्यादा होती हैं।

कागजों पर लगाये गये ऑलपिन से ही आप पता लगा सकते हैं कि इसे लैफ्टी ने लगाया है।

दुनिया के लगभग सभी खब्बू आजीवन दायें हाथ वालों के लिए बनायी गयी चीजें इस्तेकमाल करने के लिए बाध्य होते हैं। 

ये जानना रोचक हो सकता है कि कोई व्यपक्ति कितने प्रतिशत लैफ्टी है। मतलब अपने कितने काम बायें अंगों से करता है। आंख मारने से लेकर लिफ्ट मांगने तक।

खब्बू बेशक हर क्षेत्र कला, खेल, लेखन और संगीत में उत्कृष्ट होते हैं लेकिन वे आम तौर पर हॉकी खिलाड़ी नहीं होते। 

क्यों का जवाब आप खुद सोचें। 
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4 comments:

  1. बिल्कुल सही बात है...दुनिया के बहुत सारे लोगों की तरह मुझे भी इस `डे' के बारे में कुछ नहीं पता था...। बहुत रोचक और जानकारीपूर्ण लेख है...आभार...।
    इस लेख को पढ़ने के बाद एक मज़ेदार बात...मेरे छोटे मामा जी का जन्मदिन १३ अगस्त है और इतफ़ाक से वे खब्बू हैं...हाँ, उन्हें कभी किसी ने दाएँ हाथ से काम करने पर ज़ोर नहीं दिया, सो वे सारा काम बाएँ हाथ से ही करते हैं...बस कम्प्यूटर चलाने में उन्हें समस्या आती है...।

    प्रियंका गुप्ता

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  2. ` KHABBOO ` KE BAARE MEIN DHER SAAREE JANKAAREE
    PAA KAR BAHUT ACHCHHAA LAGAA HAI . LEKH KEE KHOOBEE
    HAI USKAA ROCHAK HONA . SUPERJET KEE SPEED SE PADH
    GAYAA HUN . BHAVISHYA MEIN BHEE KUCHH AESE LEKH HON
    JAANE CHAAHIYE .

    उत्तर देंहटाएं
  3. सूरज भाई,

    बहुत ही परिश्रम से आपने इस लेख को लिखा है. पहली बार जाना कि १३ अगस्त बाएं हाथ से काम करने वालों के लिए है. हां, मैं आपसे सहमत हूं कि उत्तर भारत में बच्चों के बांए हाथ से काम करने पर अभिभावक विचलित हो जाते हैं और कोशिश करते हैं कि वह दाएं से ही काम करे. मेरा बेटा भी लेफ्टी था. बचपन में बाएं हाथ से ही काम करता था. पत्नी इस पक्ष में थीं कि उसे उसी से करने दिया जाए, लेकिन मैंने टोकाटाकी जारी रखी. हां उसे कभी इस बात के लिए मारा पीटा नहीं. वैसे भी मैं इसे बहुत ही बुरा मानता हूं. बेटे ने धीरे-धीरे दाएं से काम शुरू कर दिया. इसे अपना सौभाग्य ही मानता हूं कि वह तब भी बहुत ही कुशाग्र था जब बाएं से काम करता था और अब भी है और अब वह एक MNC में बहुत ही अच्छी पोजीशन में है. यदि उसकी स्थिति ऎसी न होती तब आपके इस आलेख को पढ़कर मैं निश्चित ही अपने को अपराधी मानता.

    आपने सही कहा कि बाएं से काम करने वाले कलाकार होते हैं. जब वह छोटा था, उसे हमने तबला सिखाया और उसमें उसने कमाल हासिल किया. फिर गंधर्व महाविद्यालय में उसे सितार के लिए भर्ती करवाया. उसके गुरू जी का कहना था कि यदि वह अपनी शिक्षा जारी रखता है तो दूसरा रविशंकर बन सकता है. यह तो शायद एक गुरू की अपने शिष्य के प्रति सहृदय उद्गार रहे होंगे, पर वह बहुत ही खूब बजाता है. लेकिन कैरियर और प्रोफेशनल शिक्षा बाधक बन गयी---हां पढ़ने का उसे ऎसा चस्का है कि विश्व का जितना महान साहित्य उसने पढ़ लिया है उसे पढ़ने के लिए शायद मेरी उम्र अब कम पड़ेगी. लगभग प्रतिमाह वह गुड़गांव के एक मॉल के उस पुस्तक शॉप से जिसमें विश्व का क्लासिक साहित्य होता है, चार-पांच पुस्तकें अवश्य खरीद लाता है.

    इस उम्दा आलेख के लिए बधाई.

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  4. suraj ji

    lekh ke liye badhai mujhe achi tarah pata hai ki kitni kathinaiya ati hai. mai swayam baye hath se sare kam karti hoo.


    nisha

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