याद नहीं कि किसने कहा पर जिसने भी कहा, सौ फ़ीसदी सच कहा है कि चलते रहने का नाम ज़िन्दगी है और रुकने का मौत...। मरने से भैय्या सभी को डर लगता है और मुझे तो और भी ज़्यादा...इसी लिए मैं हमेशा चलता रहता हूँ...कभी पैदल, तो कभी टैम्पो में, तो कभी ट्रेन में...। सिचुएशन के अनुसार जो भी मिल जाए, चल देता हूँ। इस बहुत ज़्यादा चलते रहने के कारण मैं काफ़ी चलताऊ किस्म का हो गया हूँ।

ख़ैर! ये बातें बाद में...। इस समय तो चलते रहने से मेरा आशय खास सन्दर्भ से है और वह है ट्रेन से चलना...। और तरह से चलने में आदमी अपनी ज़िन्दगी की डोर अपने हाथों में रखता है पर ट्रेन से चलने में वह डोर दूसरे के हाथों में चली जाती है...और यह दूसरा इतना बेरहम है कि कभी-कभी डोर को खींच कर साँस ही अटका देता है...।

डोर को थामने वाला यह जीव अर्थात ट्रेन कभी अचानक पुल से छलांग लगा देता है, कभी पटरी से उतर जाता है तो कभी दूसरे के कंधे पर चढ़ कर बहुतों को कंधा नसीब करा देता है।
            
कई बार मैं इसके करतब का शिकार होते-होते बचा हूँ। यही कारण है कि इधर यात्रा के नाम से ही मुझे कंपकंपी सी छूटने लगी है। पर मेरी इस कंपकंपी को मेरी पत्नी ने और बढ़ा दिया। ऑफ़िस टूर पर न जाने के कारण मेरी जेब क्या हल्की हुई, मेरी पत्नी ने बेहद हल्केपन से मुझसे बात करनी शुरू कर दी।
           
उसके इस हल्केपन के कारण मेरे एक परम मित्र की हिम्मत बहुत बढ़ गई थी। वह जब-तब मेरा कॉलर पकड़ कर मेरी पत्नी की ओर से घर के खर्चे को लेकर मुझे धमकाता और बार-बार अख़बार की ढेर सारी कतरनें दिखा कर यह विश्वास दिलाने की कोशिश करता कि यात्रा करने में कोई खतरा नहीं होता। जब मौत को आना होगा तो वह घर में भी आ जाएगी...ट्रेन में मेरे जाने का इन्तज़ार नहीं करेगी...।
            
मित्र के साथ-साथ पत्नी ने भी तरह-तरह के फलसफ़े झाड़ कर मुझे समझाने की कोशिश की कि अब यात्रा करना काफ़ी सुरक्षित है। इसमें आदमी अगर मर जाता है तो भी घबराने की कोई बात नहीं...। उसके नाम पर जो मुआवजा मिलता है, वह उसके बीवी-बच्चों के भविष्य को सुरक्षित कर देता है और अगर किस्मत से ज़िन्दा लौट आता है तो आगे के लिए रास्ता खुल जाता है...।
            
पत्नी और मित्र की तर्क पूर्ण बातें सुन कर मैं प्रसन्न हुआ ही था कि सहसा मित्र ने मेरे आगे एक प्रस्ताव रख दिया कि मुझे पूरी तरह भयमुक्त करने के लिए इस बार वह भी मेरे साथ यात्रा करेगा।
           
सहसा गले आ पड़े इस ढोल को बजाने का मन तो नहीं था, पर दूसरे ही क्षण अपनी यात्रा को सस्ता और सुखमय बनाने का एक सरल उपाय सूझ गया। मित्र जितना काँइया था, मैं उससे दो कदम आगे था। मित्र के साथ इस बार यात्रा करके जहाँ मैं पूरी तरह भयमुक्त रहूँगा, वहीं कुछ पैसे बचने की भी पूरी सम्भावना थी...।
           
मैने यह बात पत्नी को बताई तो वह गुस्सा हो गई। असुरक्षित यात्रा के कारण उसे मुआवजे की जिस रकम की आशा थी, वह धूमिल हो गई थी। मेरी पत्नी के साथ साथ मेरे कुछ मित्र भी परेशान नज़र आए। ये मेरे वो मित्र हैं जिन्होंने विगत दिनों मेरी यात्रा के दौरान मेरी ट्रेन के दुर्घटनाग्रस्त होने की ख़बर पाकर और साथ ही मेरे शव कॊ लापता पाकर न केवल मेरी अन्तिम क्रिया कर दी थी, वरन कुछ चन्दा इकठ्ठा कर के एक शानदार शोक-सभा भी आयोजित कर दी थी। अब यह बात दूसरी थी कि अर्द्धमूर्छित अवस्था में एक अनजानी जगह नौ दिन पड़ा नौ रसानुभूति करने के बाद ठीक अपने दसवें के दिन करुण रस में डूबे अपने मित्रों के सम्मुख भयानक रस का दृश्य प्रस्तुत करता हुआ आ खड़ा हुआ।
           
इस तरह अचानक मुझे ज़िन्दा पाकर पहले तो मित्रों को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ और जब यक़ीन हुआ तो सहसा मेरी पत्नी के साथ उन सब की करुणा पहले रौद्र-रस में, फिर तुरन्त ही आश्चर्य-रस में परिवर्तित हो गई और फिर उससे उबरे तो हास्य-रस में गोते लगाने लगे।
          
रसों की इस अनोखी उत्पत्ति और परिवर्तन की प्रक्रिया में मैं चाह कर भी उनका साथ नहीं दे पाया क्योंकि उस समय मैं भौतिक युग के नए रस-राज ‘चिन्ता-रस’ में डूबा हुआ था...। अपने इस नए रस की उत्पत्ति का कारण मुझे ज्ञात था कि मुझे ज़िन्दा देख कर मेरी क्रियाओं पर खर्च किए गए रुपए मेरे मित्र मुझसे लिए बिना नहीं मानेंगे और हुआ भी वही...। अपनी अन्तिम क्रिया के कारण मैं कई महीनों तक कर्ज़ में डूबा रहा।
          
ख़ैर! ये सब बीती बातें हैं और एक भले आदमी की तरह मैने भी ये सब भुला दिया है...। इस भूलने का ही नतीज़ा है कि जैसे ही मेरे बॉस ने मुझे टूर पर जाने का आदेश दिया, मैने न केवल उसे स्वीकार कर लिया, बल्कि अपने उस मित्र को भी आमन्त्रण भेज दिया।
          
दूसरे दिन अपने माल-असबाब के साथ मित्र मेरे घर इतनी जल्दी पधार गया जैसे वह आदमी नहीं, स्पीड-पोस्ट हो। पत्र गया नहीं कि दूसरे दिन प्राप्त (ऐसा माना जाता है...) । दरअसल उसे बाहर जाने की बहुत जल्दी थी पर उससे ज़्यादा जल्दी मेरी पत्नी को थी। सो मैने भी जल्दी निकलना उचित समझा और समय से पहले ही स्टेशन पहुँच गया...।
          
ज़िन्दगी में पहली बार मुझे अपने मित्र पर गर्व हुआ...। उसने सच ही कहा था कि यात्रा के एक-एक पड़ाव को ठोंक-बजा कर सुधारा गया है तभी तो मुझे लगा कि जैसे मैं किसी प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं, बल्कि अपने घर के आँगन में खड़ा हूँ...।
          
जिस तरह मेरी पत्नी घर की हर चीज़ को झाड़-पोंछ कर सही स्थान पर रखती है, ठीक वैसा ही वहाँ पर भी था। हर चीज़ अपनी जगह पर थी...। जूठे पत्तल...भिखारी...कुत्ते...सब अपने स्थान पर करीने से थे। गाड़ी के आने के इन्तज़ार में यात्रीगण ऊँघते हुए बेंचों पर तरीके से पसरे थे। उनके अलावा जिन यात्रियों ने परिवार-नियोजन के बारे में सरकार द्वारा लाख समझाने पर भी उसकी बात नहीं मानी थी, वे ढेर सारे बाल-गोपालों के साथ रोना मुँह लिए अपना दण्ड भुगत रहे थे।
          
प्लेटफ़ॉर्म के उस विशाल कैनवास पर उकरे उन विचित्र चित्रों को निहारने में मैं इतना मगन हो गया कि मुझे याद ही नहीं रहा कि सुधार की उस योजना में बिना टिकट यात्रा करना शामिल नहीं है...।
          
मेरे मित्र को मेरी वह मग्नता (कृपया इसे नंगता न पढ़ें) शायद भायी नहीं, तभी वह ज़हरीले सर्प सा फुंफकारा,"याऽऽऽर, टिकट के पैसे तो दो...ट्रेन आने ही वाली है...।"
           
अपने मित्र के इस तरह फुंफकारने से मैं तनिक भी विचलित नहीं हुआ, बल्कि धैर्य के साथ उल्टे मुस्करा कर बोला,"यार...अभी मेरे पास छुट्टे नहीं हैं...अभी तुम टिकट ले आओ, मैं बाद में दे दूँगा...।"
           
मेरी बात सुन कर मित्र बोला तो कुछ नहीं, पर उसकी आँखों में मुझे अपने लिए हिंसा का भाव साफ़ दिखा। ख़ैर, थोड़ी देर मुझे खा जाने वाली नज़रों से देखने के बाद किसी थके हुए मुसाफ़िर की तरह जाकर टिकट खिड़की पर लगी लम्बी लाइन में रेल के पिछले डिब्बे की तरह जुड़ कर खड़ा हो गया।
           
उधर मित्र को गए काफ़ी देर हो गई और इधर ट्रेन ज़्यादा नहीं, सिर्फ़ घण्टे भर देर से आई। ट्रेन अपनी भारी-भरकम देहयष्टि के बावजूद किसी नकचढ़ी हीरोइन कीतरह बड़ी ही मस्त चाल से चलती, सीटी बजाती आकर प्लेटफ़ॉर्म रूपी हीरो से चिपक कर खड़ी हो गई।
           
जितने आराम से वह खड़ी रही, उतने ही आराम से मैं भी खड़ा रहा। न उसे जल्दी थी, न मुझे...पर मेरा मित्र काफ़ी हड़बड़ाया था। वह तेज़ी से दौड़ता हुआ आया,"पाँच मिनट में ट्रेन छूटने वाली है और तुम हो कि आराम से खड़े हो...कुली भी नहीं किया...।"
           
"कुली...? अरे यार, कुली की क्या ज़रूरत है...? हम-तुम हैं न...।" वह कुछ कहता कि तभी एक हल्का-सा ऑफ़िस ब्रीफ़केस उठा कर मैं आगे बढ़ गया।
            
थोड़ी देर बाद मैने पीछे मुड़ कर देखा तो मेरा मित्र मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूरता हुआ मेरे व अपने भारी-भरकम सूटकेसों को दोनो हाथों में उठाए किसी थुलथुली महिला की तरह हाँफता-काँपता चला आ रहा था। अपने मित्र की इस हालत पर मुझे दया तो बहुत आई, पर सहयोग का समय नहीं था। डिब्बे के अन्दर शीघ्रता से घुसना भी था अतः मन में उपजी करुणा को भीतर दबा कर अर्धखाली डिब्बा ढूँढने में जुट गया। सौभाग्य से ऐसा एक डिब्बा जल्दी ही मिल गया।
           
मारे खुशी के मैने मित्र को आवाज़ दी और फिर डिब्बे में घुसने लगा, पर इस चक्कर में मैं यह भूल गया कि जितनी जल्दी मुझे भीतर घुसने की है, उतनी ही जल्दी किसी को बाहर आने की भी है। जल्दबाजी का नतीज़ा यह हुआ कि अन्दर वाला बाहर नहीं आ पाया और ट्रेन ने सरकना शुरू कर दिया। अब मेरा भाग्य प्रबल था कि धक्कामुक्की के इस खेल में मैं जीत गया। मैने तुरन्त सामान सहित मित्र को भीतर धकेला और फिर खुद भी चढ़ गया।
          
मित्र को शायद इस तरह धकेले जाने की उम्मीद नहीं थी, अतः बदहवासी की हालत में वह सामान सहित लड़खड़ाया और फिर जाकर एक ऐसे दुष्ट-पुष्ट पुरुष से टकराया जो अपने भारी-भरकम शरीर के आधे भाग से अधे से अधिक बर्थ को घेरे था और बाकी से ज़मीन को...। वह उस समय भयानक नींद में था, पर मेरे मित्र के धक्के से ऐसा जागा, जैसे कि रात भर का जगा हो...। उसकी आँखों से चिंगारियाँ फूटने लगी। उसने अपने आसपास घूर कर देखा, फिर मित्र की धुनाई करने लगा। उसकी भयानक गर्जना से मैं इतना भयभीत हो गया कि उस पूरे सफ़र के दौरान मैने मित्र को पहचानने से भी इंकार कर दिया। मित्र बेचारा क्या करता...? पिटा हुआ मुँह और धुना हुआ शरीर लेकर सारे रास्ते वह मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूरता रहा।
          
 ख़ैर! किसी तरह यह विवादास्पद यात्रा ख़त्म होने की कग़ार पर आ पहुँचा। मित्र संडास के दुर्गन्धित द्वार से सटा कराहता रहा और मैं स्काउटिंग के अहसास से गर्वित होता रहा। इस क्रिया से हम दोनो को तभी मुक्ति मिली जब हमारा पड़ाव आ गया।
           
अपनी इस शानदार यात्रा से लौटने के बाद मैं काफ़ी अभिभूत और अहसानमन्द रहा अपने उस मित्र का, जिसके कारण मेरी वह यात्रा काफ़ी रोचक, आनन्ददायक, सस्ती व सुरक्षित ही नहीं रही, बल्कि उसके कारण मैने आर्थिक मजबूती भी पाई...।

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(प्रेम गुप्ता ‘मानी’)      
 ईमेल: premgupta.mani.knpr@gmail.com
                                                           




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