मारियो वर्गास ल्योसा ने लिखा है कि उपन्यासकार अपने उपन्यास में एक कल्पित समाज की रचना करता है जो वास्तविक समाज के समतुल्य होता है और जितनी उसकी वास्तविक समाज से समानता होती है उतना ही वह सफल होता है। भारतीय मूल के कनाडाई लेखक  रोहिंटन मिस्त्री के उपन्यास ‘सच ए लांग जर्नी’ की शुरुआत टी.एस. इलियट की लिखी इन पंक्तियों से होती है-- ‘हमें एक लंबा सफर तय करना था। साल का सबसे खराब मौसम इस सफर के लिए और सफर भी इत्ता लंबा।‘ इस उपन्यास ने रोहिंटन मिस्त्री को विश्वप्रसिद्ध बना दिया। इसका हिंदी में अनुवाद मोनिका जोशी ने ‘इत्ता लंबा सफर’ नाम से किया है।

बैंक क्लर्क गुस्ताद नोबेल की भरी-पूरी दुनिया उजड़ती जा रही है। पिता की किताबों की दुकान बंद हो जाती है। घर का एक-एक कीमती सामान बिक जाता है। बेटा आई आई टी की परीक्षा पास करने के बावजूद इंजीनियरिंग में जाने से इनकार कर देता है। बेटी की तबीयत लगातार गिरती  जा रही है। ऐसे में गुस्ताद को एक पुराने दोस्त मेजर बिलमोरिया का एक लिफाफा मिलता है और उस लिफाफे के साथ शुरू होता है गुस्ताद का लंबा सफर। गुस्ताद नोबेल इस सफर में अपने अतीत की तलाश करता है और शहर की भी। उपन्यास को आत्मकथात्मक भी कहा जा सकता है क्योंकि रोहिंटन मिस्त्री भी कथानायक गुस्ताद की ही तरह बैंक में क्लर्क रह चुके थे। 

लेखक ने उपन्यास में गुस्ताद और उसके परिवार के माध्यम से उसके जीवन-संघर्ष को बड़ी बारीकी से उकेरा है। पारसी समाज के रीति-रिवाजों, परम्पराओं और  खान-पान के बारे में विश्वसनीय जानकारी दी गयी है। उनके द्वारा बुरे समय को टालने के लिए किये गये टोटकों और शव को ‘टावर ऑफ साइलेंस’ तक ले जाने की अंतिम यात्रा  का विस्तार से वर्णन किया गया है। एक साधारण पारसी मध्यवर्गीय आदमी के जीवन को उदासी के साथ व्यक्त किया है। इस उपन्यास का हर चरित्र अपने आसपास देखा-जाना हुआ सा लगता है। एक के बाद एक मुसीबत का सामना करता हुआ गुस्ताद और बेटे की वापसी और बेटी के स्वस्थ होने के लिए चिंतित दिलनवाज पाठकों को अपने से लगते हैं।. सोहराब, डेरियस, मैल्कम और मिसेज कटपिटिया, सभी चरित्रों को बेहद बारीकी से बुना गया है।  कहानी की पृष्ठभूमि ७० के दशक की है जब बंगलादेश युद्ध के बाद इंदिरा गाँधी को दुर्गा के रूप में बताया जा रहा था और  ‘इंदिरा इज़ इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ जैसे नारे लगाये  जा रहे थे। यह राजनैतिक घटनाओं और उसके व्यापक असर की कहानी है। दूर कहीं सीमा पर युद्ध  छिड़ा है। लेकिन उसका असर दूर दराज के शहरों और उन लोगों की जिंदगियों तक पड़ता है, जिनका भारत-पाकिस्तान की लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है।  सियासत का गंदा चेहरा है, ताकत की लड़ाई है, कुछ लोगों के स्वार्थ के लिए दांव पर लगाया जाता बहुसंख्यकों का हित है।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत  इसकी किस्सागोई है। एक सीधी रेखा में चलते हुए  इत्ता लंबा सफर तय किया गया है। बीच- बीच में कहीं- कहीं  स्मित तथा स्फुट हास्य का पुट भी मिलता है। जिस दीवार को लोगों ने मूत्र से बदबूदार बना दिया था, पेंटर द्वारा देवी देवता के चित्र बना देने के बाद लोगों ने उसकी पूजा करनी शुरू कर दी। रोहिंटन मिस्त्री ने पूरे उपन्यास में नॉस्टेल्जिया और अवसाद का इस्तेमाल अंतर्धारा की तरह किया है। वह शहर को उदासी  लेकिन उम्मीद के साथ देखते हैं। उनकी निगाह गंदी, संकरी, बदबूदार गलियों, पुराने अपार्टमेंट की गिरती चारदीवारियों और सड़ रही चालों तक जाती है। इस उपन्यास  को पढते हुए ‘पेस्तनजी’ और ‘बींग सायरस’ फिल्मों  की याद आ जाती है। हिन्दी अनुवाद में कहीं-कहीं अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल किया गया है जिससे बचा जा सकता था।  यह उपन्यास  बेहद साहसिक और दिलचस्प है जो अपने समय की राजनीति और भ्रष्टाचार की तह तक जाता है और तीखा व्यंग्य करते हुए सत्तासीन दल से सीधे टक्कर लेने की हिम्मत करता है।

2 comments:

  1. सार संक्षेप मे रोचकता गढ देने की कला दृष्टिगोचर हो रही है । बेहतरीन समीक्षा ।

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  2. किताब की समीक्षा बहुत अच्छी लगी। सरिता जी का बहुत-बहुत शुक्रिया।

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