एकनिष्ठ प्रेम का मानक है; रति का कंगन  - सत्यदेव त्रिपाठी 

सुरेन्द्र वर्मा
जब सारी मर्यादाएं टूट रही हों, सारे मूल्य नष्ट होने की कग़ार पर हों... बच रहे हों सिर्फ़ मनमाने सुख के खुले खेल, तो किन्हीं मूल्यों को लेकर रचना में उतरना साहित्यकार का दायित्त्व हो जाता है। इसी का निर्वाह करता हुआ आया है हिन्दी के आधुनिक क्लासिक नाटककार सुरेन्द्र वर्मा का नया नाटक ‘रति का कंगन’। 

यह मूल्यों का टूटना प्रेम व काम संबन्धों के सन्दर्भ में व्याख्यायित है, जहाँ आज सर्वाधिक मनमानियां चलने लगी हैं। एक तरफ सहचर संबन्ध का प्रतिरूप है - जब तक चाहा साथ रहा, जब चाहा छोड दिया और बीच-बीच में अन्यों से भी संबन्ध बनाने पर रोक नहीं, दूसरी तरफ है - ‘रति का कंगन’, जो इन मनमानियों को रोकने का मानक है। और इन दोनो रूपों का शिकार होता है कथानायक मल्लिनाग। 

सुरेन्द्र वर्मा ने 1970 के दशक में विवाह के बाद संतानोत्पत्ति के लिए काम-सम्बन्ध की मर्यादा को तोडकर प्रेम के मूल्य को स्थापित किया था, तो लोगों को मनमानी लगी थी। अब उनके देखते यह भी धसक रहा है, तो प्रेम के औज़ार को फिर से धारदार करने के लिए देह के लिए देह की पूरी प्रवृत्ति को लेकर चले हैं। मल्लिनाग पहले इसी रूप में प्रकट होता है - ‘मैं प्रेम नहीं करता, अंतरंग लेकिन सीमित आत्मीयता का लेन-देन करता हूँ... ‘आज के इस टुच्चे व लुच्चे समय में स्त्री-पुरुष अपनी भावनात्मक प्रकृति की खोज-पडताल करें...दूसरी स्त्री में बडा आकर्षण होता है’...। लेकिन जब इसी प्रवृत्ति की प्रतिनिधि श्रीवल्लरी के प्रेम में सच ही पड जाता है और उससे ‘प्रेमी संज्ञा अब उतनी ही लिज्लिजी हो गयी है, जितनी प्रागैतिहासिक काल में पति थी’ ... ‘तुम भी वहीं लौट जाओ’ का टका-सा जवाब सुन लेता है, तो भग्नाश होकर नये सिरे से जीवन शुरू करने चलकर कुछ और भी ऐसे ही अनुभवों से गुज़रता है...। 

उच्च शिक्षा ग्रहण करने जाता है और अपनी शोध-निर्देशिका लवंगलता द्वारा अनचाहे यौन-शोषण का शिकार होता है- अब तक पीएच.डी. गाइडों द्वारा हो रहे छात्राओं के यौन-शोषण के ठीक विपरीत – गोया उस पुरुष-इतिहास या इतिहास-पुरुषों से बदला लेता हुआ। लेकिन बीच में लवंगलता का गाइड आ जाता है, जिसका शिकार लवंगलता रही है। याने यह रक्तबीजों की परम्परा है, जिसमें इसी तरह नौकरियां व डिग्रियां मिलती हैं और मिलने तक ‘शोधछात्र का शरीर, हृदय और आत्मा निर्देशक की मुट्ठी में रहते हैं’। और इनका कोई कुछ नहीं कर सकता। यह यथार्थ का एक बडा फेज़ है, पर मुकम्म्ल यथार्थ नहीं। बहरहाल, इस कामकेलि के दो पाटों बीच फँसकर मल्लिनाग को न डिग्री मिल पाती न नौकरी। 

तब वह छद्म नाम से गाइड लिखने में लगता है, जिसके ज़रिये प्रकाशक-लेखक संबन्ध के पुराण खुलते हैं। लिखते-लिखते अपने अतीत के विविध कामानुभवों की पूँजी से कामसूत्र की रचना करता है, जिससे प्रकाशक कोटिपति हो जाता है, पर लेखक (मल्लिनाग) को सैकडे में भी रॉयल्टी नहीं देता – ‘इससे घिनौना, कुत्सित व वीभत्स सम्बन्ध दूसरा नहीं’ को साबित करता हुआ कामसूत्र के छद्म नाम का खुलासा करके प्रकाशक मल्लिनाग को वर्जनामूलक शासन में जेल भेजवा देता है। वहाँ मल्लिनाग को चरित्रभ्रष्ट सिद्ध करने के लिए उसके जीवन में आयी सारी स्त्रियां ग़वाही के लिए बुलायी जाती हैं, पर सभी सच बोलते हुए मल्लिनाथ को उत्कट प्रेमी बताती हैं और चरित्रहीनता के आरोप में जेल जाती हैं। 

उधर इन सारे फेसेज़ से गुज़रने की मूल्यहीन मनमानियों से विमुख होकर मल्लिनाग मेघाम्बरा नामक युवती से सच का प्रेम करने और मानने लगता है- ‘जिसे तृप्ति कहते हैं, वह प्रतिबद्धता के बाद ही आती है’। ‘एकनिष्ठता प्रेम का चिरंतन मूल्य है और रहेगा’ का ही प्रतीक है- ‘रति का कंगन’, जो मेघाम्बरा उसे पहनाती है। इसका धारक यदि किसी अन्य स्त्री से कोई भी संबन्ध बनाता है, तो ऐसे रति-कंगन-दोष के पापी का सम्पूर्ण बहिष्कार होगा- मताधिकार से भी वंचित। याने आज के युग में यह व्यंग्य भी है और चुनौती भी। नाटक में मेघाम्बरा के पिता रूप में आते हैं - प्रतिशोध को एकमात्र मूल्य मानने व कूटनीति से ही दुनिया रचने वाले ‘अर्थशास्त्र’ के प्रणेता कौटिल्य, जो यहाँ अपनी प्रेमिका के लिए आजीवन तडपते हैं। मल्लिनाग के ‘कामसूत्र’ में तटस्थ होकर प्रेम का शास्त्रीय विश्लेषण हुआ है। उसके आध्यात्मिक रूप की छबियां आँकी गयी हैं। याने सुरेन्द्रजी की दुनिया इसी प्रेम और प्रेममय मूल्यों की दुनिया है।      

इस प्रकार वे अपनी उसी प्रेम की ज़मीन पर आते हैं, जिसे लेकर ‘सूर्य की अंतिम किरण...’ से चले थे और जिसे कई प्रेम-सम्बन्धों के बीच से ‘मुझे चाँद चाहिए’ की वर्षा ने पाया था और ‘दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता’ के पुरुषवेश्या नायक ने भी जिसके लिए अपना सबकुछ दाँव पर लगाकर जान तक गँवा दी थी। यहाँ इसका हामी है - मेघाम्बरा द्वारा अपना दिया ‘रति का कंगन’ वापस ले लेना। और नाट्य के साथ प्रेम की एकनिष्ठता का वीभत्स चरम है - प्रेमवंचित नीलाम्बरा का राजनीति की क्रूरता तले बेटी मेघाम्बरा के साथ बलात्कृत होते रहने के बाद आत्महत्या।  

लेकिन इन सबके बावजूद पूरा यक़ीन है कि हर रचना की तरह काम-निरूपण को ही मक़सद मानकर (‘दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता’ के लिए ‘समीक्षा’ जैसी) छीछालेदर से इसे भी गुज़रना होगा। याने न सुरेन्द्रजी अपनी ज़मीन छोडेंगे, न ज़माना अपना रवय्या- ‘वो अपनी ख़ू न छोडेंगे, हम अपनी वज़अ क्यों छोडें’। और ज़माने की इस ख़ू के साथ सुरेन्द्रजी का सलूक नरम नहीं, तेज से तेजतर होता जा रहा है। इस बार ऐसों के लिए ‘आठवाँ सर्ग’ के कला-अनाडियों से भी ज्यादा हास्यास्पद पात्र व प्रसंग वियोगी के रूप में आया है, जो उद्यान में दुष्यंत-शकुंतला के चुम्बन-दृश्य के लिए कालिदास को संस्कृति-भंजक बताता है। और काम-संबन्धों का गाढापन रचना-दर-रचना बढता जा रहा है। पिछली कृति ‘काटना शमी...’ से नाभि-उरोजादि पर विशेषक बना, अब ‘कटि के नीचे व ऊपर के अंगों की संवहन(मालिश) पद्धतियों के साथ पर-स्त्रियों को अंगिया पहनाने के प्रकरण व नितम्ब-पीताम्बर के जिक्र आते हैं। सौन्दर्य-स्पर्धाओं’ को स्वीकृति-सी मिली है।   

लेकिन संस्कृत से तराश कर बनाये पुरलुत्फ़ शब्दों से सजी तत्समी भाषा, व्यंजना-शक्ति के कुशल प्रयोग व शैली के कटाक्ष भरे गाढे विनोद...आदि से बने आभिजात्य में यह सारा कुछ तनिक भी अश्लील न होकर पर्याप्त रंजक हो जाता है। यह गुर नाट्य का शृंगार तो है ही, मंच पर इनके क्लासिक निर्वाह के लिए चुनौती भी देता है एवं स्कोप भी। नाटकों से आने पर वर्माजी के उपन्यास नाट्यमय होकर कलावृद्धि को प्राप्त हुए हैं, पर अब उपन्यासों के असर में कई सौ वर्षों (भास से लेकर बाणभट्ट-श्ंकराचार्य तक) के समय व कई शाखाओं में चलने लगी है कथा। इनके सूत्र तो जोड दिये गये हैं, पर इसके लिए नायक व सूत्रधार को सर्वत्र विराजमान होना पडा है, जिसमें पात्रत्त्व तो निभा है, नाट्य की केन्द्रीयता बिखरी है। इसी रौ में रति के कंगन की आत्मरति में नाटक का पसार दो अंकों, जिसे नया नाम ‘समय’ दिया गया है, में ऐसा दुगुना हो गया है कि ट्रायलोजी के वज़न पर साढे तीन घंटे का बॉ-योलोजी हो सकता है। 

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सम्पर्क- ‘मातरम्’, 26-गोकुल नगर, कंचनपुर, डी.एल.ड्ब्ल्यू., वाराणसी-221004/मो.-09453519830  

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