देवी नागरानी

यादें दिल के तहखाने में बसी रहती है, और जब ज़हन में करवटें लेती है तो दिल के मुरझाए ज़ख्म फिर से हरे हो जाते हैं। विश्वास अविश्वास के बीच जो झीनी सी दीवार, चालीस साल के सफ़र के बाद भी मैं आज तक नहीं फलाँग पायी है।  

वह शुक्रवार का दिन था जब सुधा अपने बच्चों को लेकर दस दिन के लिए पीहर आई। ठीक उसी वक़्त लच्छ्म्मा अपनी साँप वाली टोकरी लिए आन पहुंची। बचपन से आज तक हर शुक्रवार के दिन वह आती, माँ से कुछ अनाज या पैसे ले जाती। माँ ने एक आना दिया, और मैंने भी वही किया। मेरी ओर देखते हुए भैया से पूछा-“बहन है?”

“हाँ, भैया ने जवाब दिया, “मुंबई से आई है, आज लगे हाथ इसके हाथ की लकीरें भी देख लो, हमेशा उलझनों से घिरी रहती है?”

लच्छ्म्मा ने ताश के कुछ पते निकाल कर मेरे सामने फैलाये, और एक पत्ता लेने का इशारा किया। मैंने ने एक निकाल कर उसे दिया और उत्सुकता से कभी भाई को, तो कभी लच्छ्म्मा को देखती रही। लच्छ्म्मा कुछ देर अपनी उँगलियों पर आँखें बंद किए हुए जाने कौन सा गणित गिनती रही और आँख खोलते ही भाई की ओर मुखातिब होकर धीरे से कहने लगी-“ आपकी बहन वाक़ई उलझी लकीरों से घिरी हुई है। अगले दो महीनों में इसे साँप डसने वाला है!”

साँप के उलेख सुनते ही मेरे माथे पर पसीने की बूंदें झिलमिलाने लगी और भाई भी कुछ चिंतित हो उठे॥ यह विषय भूलने जैसा न था।  कोई कुछ कहे न कहे, पर मन में एक अनजान डर घिरा रहा। भाई से कहती तो वह सर पर हाथ फेरते कहता “पगली क्या पक्के घरों में कहीं साँप होते है, तुम इस बारे में ज़ियादा मत सोचो?”  

दस दिन बीते, मैं अपने बच्चों को लेकर ससुराल लौट आई, पर उस बात की व्याकुलता ने दामन नहीं छोड़ा, और वह भी साथ चली आई, लगभग दो महीने बीतने को थे कि अचानक एक दिन मेरे पति अकस्मात कार एक्सिडेंट में चल बसे साथ में जो तीन दोस्त गए थे उनका बाल भी बांका न हुआ, और वे तीनों मुझसे मिलने शोक सभा में भी आए। 

आज चालीस साल बीत जाने के बाद भी जाने क्यों मैं कभी न किसी पंडित-पुरोहित से कोई सवाल करती हूँ, और न ही अपने बच्चों की जन्म-पत्रियाँ दिखाती हूँ। मुझे आज भी लगता है कि वह काल रूपी साँप ही तो था जो मुझे डस लिया !!

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