पिंजरे के पंछी 

चंद्रप्रकाश के चार साल के बेटे को पंछियों से बेहद प्यार था। वह उन पर अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार रहता। कुछ पंछी उसके घर के आँगन में जब कभी आते तो वह उनसे भरपूर खेलता। उन्हें जी भर कर दाने खिलाता . पेट भर कर अब वे उड़ते तो उसे बहुत अच्छा लगता। एक दिन बेटे ने अपने पिता जी से अपने मन की इच्छा प्रकट की -  " पिता जी , क्या चिड़िया,तोता और कबूतर की तरह मैं उड़ नहीं सकता ? "
             
" नहीं ." पिता जी ने बेटे को पुचकारते हुए कहा .
            
 " क्यों नहीं ? "
             
" क्योंकि बेटे , आपके पंख नहीं हैं ."
             
" पिता जी , क्या चिड़िया , तोता और कबूतर मेरे साथ रह नहीं सकते हैं ? क्या शाम को भी मैं उनके साथ खेल  नहीं सकता हूँ ? "
              
" क्यों नहीं बेटे , शाम को भी आप उनके साथ खेल सकते हैं . हम आज ही आपके लिए चिड़िया , तोता और कबूतर ले कर आएँगे। आप अब जी  चाहे उनसे खेलना . हमारा बेटा हमसे कोई चीज़ माँगे और हम ला कर नहीं दें , ऐसा भला कैसे हो सकता है ? "
                 
शाम को जब चन्द्रप्रकाश लौटे तो उनके हाथों में तीन पिंजरे थे - चिड़िया , तोता और कबूतर के। तीनों पंछियों को पिंजरों में दुबके पड़े देख कर बेटा खुश न हो सका . बोला - " पिता जी, ये इतने उदास क्यों हैं ? "
                 
" बेटे , अभी ये नए - नए मेहमान हैं . एक - दो दिनों में ये आपसे घुल - मिल जायेंगे तब देखना इनको उछलते - कूदते और चहचहाते हुए . " चंद्रप्रकाश ने बेटे को तसल्ली देते हुए कहा .
                  
दूसरे दिन जब चन्द्रप्रकाश काम से लौटे तो पिंजरों को खाली देख कर बड़े हैरान हुए। उन्होंने पत्नी से पूछा - " ये चिड़िया , तोता और कबूतर कहाँ गायब हो गये हैं ? "
                  
" अपने लाडले बेटे से पूछिए . " पत्नी ने गुस्से में जवाब दिया।
                  
चंद्रप्रकाश ने बेटे से पूछा - " बेटे , ये चिड़िया , तोता और कबूतर कहाँ हैं ? "
                 
" पिता जी , मैं पिंजरों में बंद उन्हें देख नहीं सका . मैंने उन्हें उड़ा दिया है . "  अपनी भोली ज़बान में जवाब देकर बेटा बाहर आँगन में आ कर अपने - अपने घर को लौटते हुए पंछियों को देखने लगा .
                      

संतान की सफलता 

उद्योगपति नन्दलाल की धर्मपत्नी सुमिता के जीवन की एक ही कामना थी कि उसकी इकलौती बेटी रमा बी . ए  में प्रथम आये। अगर उसने ऐसा कर दिखाया तो वह देश भर की अखबारों में में उसकी सफलता का समाचार मोटे - मोटे , हरे - गुलाबी अक्षरों में छपवायेगी। आस पास के सभी मुहल्लों में मिठाई बंटवायेगी, भले ही उसके हज़ारों रूपये खर्च हो जाएँ। माँ है आखिर !

बेटी रमा ने कमरे की सीढ़ियों के नीचे से गुहार लगायी  - " माँ , कहाँ हैं आप ? मैं पास हो गयी हूँ . आपकी मुराद पूरी हो गई है . मैं प्रथम आई हूँ , प्रथम।"
                       
माँ ने सुना तो वह खुशी में उछल पड़ी . सीढ़ियों के ऊपर से ही बोली - " फिर से बोल, मैंने अच्छी तरह से सुना नहीं है . "
                        
" माँ , मैं प्रथम आई हूँ . " बेटी की आवाज़ कमरे में गूँज उठी।
                        
" मेरी अंतरात्मा को तूने खुश कर दिया है . बलिहारी जाऊँ तुझ पर। " खुशी में पागल माँ बेटी को गले लगाने के लिए नीचे उतरी। एक सीढ़ी पर उसका दाहिना पाँव फिसल गया। धड़ाम से वह नीचे आ गिरी। परमात्मा का शुक्र कि उसका कोई अंग नहीं टूटा . .उसके माथे पर ज़रा सी चोट आयी थी, थोड़ा सा खून बहा था। डाक्टर को बुलाने के लिए बेटी फोन की ओर लपकी। माँ ने रोक लिया . बोली - "पहले मेरे गले से तो लग आ . ऐसी खुशी रोज़ - रोज़ कहाँ आती है ? "
                           
माँ - बेटी गलबइयां हो गयीं . दोनो की पलकों पर खुशी के मोटे - मोटे मोती चमक उठे थे .

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18 comments:

  1. बहुत अच्‍छी लघुकथाएं। संघन संवेदनाओं कर संजीदा अभिव्‍यक्ति।

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  2. बेहद संवेदनशील लघुकथायें ……………बच्चे मासूम होने के साथ बडों से ज्यादा समझदार होते हैं और माँ का दिल तो माँ का ही होता है ।

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  3. दोनों कहानियां बहुत लाजवाब, अंदर तक छूती हैं ...
    बाल मन की मासूमियत ऐसी ही होती है ... और माँ का तो हूबहू चित्र उतार दिया है कहानी में ...

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  4. बेहद मार्मिक लघुकथा है-'संतान की सफलता'. प्राणजी, आप ही लिख सकते है ऐसी रचनाएँ..शुभकामनाये..

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  5. प्राण जी,
    'पिंजरे के पंछी' यह प्रामाणित करती है कि मानवीय संवेदनाएँ ही नहीं अपितु समझदारी के बीज भी बचपन में ही पनपने लगते हैं! (लेकिन समझदारी की उम्र में पहुँच कर इंसान की समझ और संवेदनाएँ अक्सर गायब सी नज़र आती हैं)
    'संतान की सफलता' अपनों के उस निश्छल प्यार की कहानी है जो बिला शर्त उमडता रहता हैं जिसके आगे हर तरह का कष्ट तुच्छ होता हैं !
    अशेष सराहना के साथ, ,
    दीप्ति

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  6. हमेशा की तरह उत्कृष्ट । मानवीय संवेदनाओं की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति 'संतान की सफलता' बहुत ज्यादा पसंद आई । आप ही ऐसी लघुकथा लिख सकते हैं और किसी के बस की बात नहीं हैं..शुभकामनाये।

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  7. दोनों ही लघु कथाएं बिना चॊंकाए मानवी संवेदनाओं की बेहतरीन अभिव्यक्तियां हॆं। बधाई।

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  8. बेहतरीन कथायें...आपकी कथायें बहुत समय तक खुद को याद कराती हैं सदैव!!

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  9. पक्षियों की मानव-गिरफ्त होने की वेदना को आपने स्‍वर देकर एक नया तरीका विकसित किया है। उसका सकारात्‍मक असर बच्‍चे पर किस प्रकार असर करता है, यह समझ सबमें विकसित हो, ऐसी कामना है।

    मन से खुश होने पर छोटी क्‍या बड़ी दिक्‍कत भी खुशी में दब जाती है। यह एक सनातन सत्‍य है जिसे दूसरी लघुकथा में स्‍वर दिया गया है।

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  10. प्राण जी की दोनों ही लघुकथाएं बहुत ही उल्लेखनीय है, क्योंकि दोनों ही मानवीय संवेदनाओं की गहनता परिलक्षित है. हर वह रचना उत्कृष्ट होती है जिसमें जो मानवीय संवेदनाओं से जुड़ती है. प्राण जी को बधाई.

    रूपसिंह चन्देल

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  11. प्राण साहब की दोनों कथाएं ऐसी कथाएं हैं जो पढने के बाद देर तक आपके साथ रहती हैं...आज़ादी और गुलामी में जो फर्क होता है वो बच्चा भी अच्छे से समझता है...उसे चिड़ियों कबूतरों और तोतों से ज्यादा उनकी आज़ादी से प्यार है...सच है..आज़ाद परिंदे ही परिंदों जैसे लगते हैं...दूसरी कथा में माँ के प्यार को बहुत सादगी और भावपूर्ण ढंग से उन्होंने बयां किया है...ऐसी लघु कथाएं प्राण साहब अपनी जादुई कलम से ही रच सकते हैं...उनकी बेजोड़ लघु कथाएं हम तक पहुँचाने के लिए आपका कोटिश धन्यवाद...

    नीरज

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  12. संवेदनशील, मर्मस्पर्शी एवं प्रेरक लघुकथाएँ.
    साधुवाद प्राण जी.

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  13. priya bhai Pran Sharma jee aapki pehli laghu katha ne ek sundar sandesh diya hai kyonki koee bhee jeev pinjre men naheen rehna pasand karega chahe veh sone ka hee kayun n ho.doosri katha bhee marmik v prerna daee hai.sundar.

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  14. प्राण जी की दोनों लघुकथाएं अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी हैं.

    हार्दिक बधाई,

    महेंद्र दवेसर 'दीपक'

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  15. दोनों लघुकथायें पढ़ीं। अच्छी लगीं।
    सादर
    इला

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  16. दोनों ही लघुकथा अच्छी लगी . पिंजरे के पंछी में आभास हो गया था कि अंत क्या होगा व सफलता लघुकथा में अंत जानने की उत्सुकता बनी रही .

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