आज दो दिन हो गए थे उसको गाँव आए! करीब दस साल बाद वो गाँव आया था! इन दस सालों में उसके मम्मी-पापा तो कई बार गाँव आए, पर शैक्षिक-विवशताओं के कारण वो नही आ पाया! पर अब, जब वो गाँव पर था, तो घूम-घूमकर उन सब चीजों को देख रहा था, जिनके साथ उसके बचपन के कई वर्षों की यादें जुड़ी थीं! बहुत सारी चीजें बदल चुकी थीं! बचपन के शुरुआती आठ-दस वर्ष उसने गाँव पर ही बीताए थे! उन आठ-दस वर्षों की सारी यादों को ढूँढ रहा था! वो मोनू, पिंटू, रानू, पिंकी आदि! वो आम का पेड़, कुँए का किनारा, गोलियों के खेल! ये समस्त विस्मरण उसे पुनः स्मरण हो रहे थे! अपने मित्रों के बारे में उसने पता किया, तो पता चला की रानू, रणवीर हो चुका  था; पिंटू, पुनीत हो चुका था; पिंकी, प्रियंका हो चुकी थी! ऐसे ही कई दोस्त, कुछ ना कुछ हो चुके थे! वैसे, उसे अपने मित्रों के संज्ञा-परिवर्तन से कोई विशेष आश्चर्य नही हुवा, क्योंकि उसके साथ खुद भी तो यही स्थिति थी! एकाध दिन और बीते, इस बीच उसके कई दोस्त, जो गाँव पर मौजूद थे, उससे मिलने आए, सिवाय एक के, वो थी पिंकी!

  पिंकी उससे मिलने क्यों नही आई, इस बाबत वो कुछ नही समझ पा रहा था! उसने जब अपने मित्रों से इस बाबत पुछा, तो उन्होंने ज़रा अजीब-सा चेहरा बनाते हुवे बताया कि प्रियंका यानी पिंकी, गाँव पर ही है! और जब उसने ये पुछा कि वो उससे मिलने क्यों नही आई? तो सब हँसने लगे और बोले, वो तुझसे मिलने क्यों आएगी? यही सवाल जब उसने अपनी माँ से पुछा, तो माँ ने भी वही कहा जो उसके मित्रों ने कहा था कि वो तुझसे मिलने क्यों आएगी? पर ये उत्तर उसे संतुष्ट नही कर रहे थे! वो समझ नही पा रहा था कि जो पिंकी बचपन में उसे देखते ही दौड़ पड़ती थी, अब ऐसा क्या हो गया कि वो उससे मिलने भी नही आई? इसी दुविधा में पड़े-पड़े, वो प्रतिदिन इस आशा से उठता कि आज पिंकी उससे मिलने जरूर आएगी, पर शाम होते-होते उसकी आशा बड़ी ही निष्ठुरता से निराशा में बदल जाती! एक रोज वो खुद पिंकी के घर गया, पर ये क्या, उसने देखा कि उसके पहुंचते-ही घर के बाहर ओसारे में खड़ी पिंकी, थोड़ी ही देर में घर के अंदर चली गई! अब उसके सामने एक और सवाल था कि पिंकी ने उसे देखके भी अनदेखा क्यों किया? उसका स्वागत पिंकी के भाई ने किया! फिर थोड़ी देर बातचीत, चाय-नाश्ते के बाद वो चला आया! 

  कुछ दिन और बीते! आज उसको गाँव आए पन्द्रह दिन हो गए थे! शाम का वक्त था! वो अपने घर के बाहर बैठा था! उसके मन में अभी यही ख्याल चल रहे थे कि आखिर क्यों? पिंकी इतना कैसे बदल गई है? कहीं वो उससे नाराज़ तो नही? पर क्यों? ये तमाम तरह की बातें उसके दिमाग में चल रही थी कि तभी उसने देखा कि पिंकी उसके घर की तरफ आ रही है! पहले-पहल तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नही हुवा, पर फिर उसने खुद को संयत कर वास्तविकता को समझा! वो पिंकी ही थी, जो उसके घर ही आ रही थी! उसने सोचा कि अब वो दो दिन बाद शहर जाने वाला है, इसलिए शायद पिंकी उससे मिलने आई है! पर ये क्या, पिंकी उसको अनदेखा करके, उसके घर में घुस गई! उसको बड़ा धक्का लगा! वो दौड़कर घर में पहुंचा! उसने देखा कि पिंकी उसकी बहन से बातों में मशगूल है! पिंकी ने अब भी उसे अनदेखा ही किया! अब उससे नही रहा गया! उसने तय किया कि वो पिंकी से बात करके ही रहेगा! थोड़ी देर बाद, जब पिंकी जाने लगी, तब वो उसके पीछे हो लिया! कुछ दूर चलकर उसने आवाज दी – हे! तुम पिंकी ही हो न? उसकी आवाज सुनकर पिंकी मुड़ी और उसे देखकर बोली – अरे! तुम? हाँ, मै पिंकी ही हूं, पर तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो? तुम तो मुझे जानते हो न?

पिंकी की बातें सुनकर वो ज़रा तेज आवाज में बोला – हाँ-हाँ, जानता हूं तुम्हे, पर शायद तुम मुझे भूल गई हो? 
पिंकी- तुम्हे भूल गई हूं? मतलब क्या है तुम्हारा?

वो बोला- मतलब क्या, आज मुझे गाँव आए पन्द्रह दिन हो गए, दो दिन बाद वापस चला जाऊँगा, और तुम मुझसे मिलने तक नही आई! और आज आई भी तो मुझसे बात किए बगैर चल दी! आखिर ऐसा क्या हो गया कि मेरी बचपन की सबसे अच्छी दोस्त मुझे इस तरह अनदेखा कर रही है?

उसकी ये बातें सुनकर पिंकी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे! वो बोली- क्या बच्चों की तरह बातें कर रहे हो? मै तुमसे मिलने क्यों आती? मै तुमसे बात क्यों करती? हमारे बीच क्या सम्बन्ध? और जिस दोस्ती की बात तुम कर रहे हो, वो हमारा बचपन था, पर अब वो बात नही है! अब हम जवान हैं! तुम एक जवान लड़के, मै एक लड़की, हमारे बीच कैसी दोस्ती?

वो स्तब्ध था! शायद पिंकी ने कुछ ऐसा कहा था, जो उसकी अपेक्षा के प्रतिकूल था! वो बोला- क्या मतलब है तुम्हारी इन बातों का? अगर हम दस साल पहले दोस्त थे, तो अब भी हो सकते हैं! हमारे जवान होने से हमारी दोस्ती का क्या सम्बन्ध? वहां शहर में, कॉलेज में, मेरी बहुतों लड़कियां दोस्त हैं! और तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?

पिंकी- होंगी शहर में लड़कियां तुम्हारी दोस्त, पर ये तो शहर नही है, यहाँ लड़का-लड़की दोस्त नही हो सकते, और अगर हो सकते हैं तो भी, समाज नही मानता है! मै दसवी के बाद से पढ़ाई छोड़ चुकी हूं, क्योंकि गाँव के आसपास कोई स्कूल नही है, और दूर जा नही सकती! अब मै चलती हूं, किसीने इस तरह तुमसे बात करते देखा, तो जाने क्या सोचेगा? ये कहकर वो जाने को हुई, तभी उसने उसका हाथ पकड़ लिया! और बोला- क्यों नही मानता समाज? जो दो हाथ-दो पैर और एक सर के आदमी वहां है, वैसे ही यहाँ भी हैं, फिर ये कैसा अंतर? और तुमने पढ़ाई क्यों.....! अभी वो बोल ही रहा था कि पिंकी बोल पड़ी- ये क्या हो गया है तुम्हे, हाथ छोड़ो मेरा, किसीने देख लिया तो तमाशा हो जाएगा! 

 पिंकी अपना हाथ छुड़ाने का प्रयास कर रही थी! और वो हंसते हुवे बोला- कुछ तमाशा नही होगा! छोटे पर कितने बार तुम्हारा हाथ पकड़ता था, और मौका मिलते ही तुम भाग जाती थी! अब भागो.....आह! वो ये सब कह ही रहा था कि तभी उसके गाल पर एक जोरदार थप्पड़ पड़ा! उसने देखा, उसके दादाजी खड़े थे! जाने कब आ गए उसे पता भी नही चला था! उनका चेहरा गुस्से से एकदम लाल हो रहा था! 

वो बोले- ये क्या तमाशा कर रहे हो तुम? हाथ छोड़ो उसका!

उसने पिंकी का हाथ छोड़ दिया! पिंकी तुरंत घर भाग गई! दादाजी फिर बोले- यही आवारागर्दी सीखता है वहां कॉलेज में! हमारा मान-सम्मान सब मिटा देगा तू! क्यों हाथ पकड़ा था उसका?

वो डर गया था, पर अब भी वो ये नही समझ पा रहा था कि उसकी गलती क्या है? वो बोला- दादाजी, वो पिंकी थी! मेरी बचपन की दोस्त! मै तो बस उसे रोककर उससे बात कर रहा था!

दादाजी- अभी तेरा बचपन चल रहा है! बीच सड़क पर एक लड़की से बात करता है, और अब सफाई दे रहा है! और कैसी दोस्त? एक लड़का-लड़की कभी दोस्त हो सकते हैं क्या? असंभव है!

उससे नही रहा गया! वो फिर ज़रा तेज आवाज में बोला- क्यों नही हो सकते दोस्त? एक ही देश और हज़ार.....!
  
उसकी बात पूरी होने से पहले ही दादाजी तेज आवाज में बोल पड़े- चुप! नही हो सकते दोस्त, मतलब नही हो सकते, क्योंकि यही नियम है! 
  
दादाजी उसका हाथ पकड़कर घर में ले आए! घर पर जब ये बात सबको पता चली कि सबने मिल-जुलकर उसको इस तरह समझाना शुरू किया, जैसे वो दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख हो! पिताजी तो गुस्से में हाथ उठाने को दौड़ते, पर माँ रोक देती! और वो, बेचारे को यही नही समझ आ रहा था कि आखिर उसकी गलती क्या है?
  
दो दिन बाद! तमाम प्रश्न उसके दिल-दिमाग में जस के तस थे, पर कोई उत्तर देने वाला नही था! और अब किसीसे उत्तर पूछने का साहस भी उसमे नही था! एक पिंकी से उत्तर जानना चाहा तो जो तमाशा हुवा, उसको वो अभी भूला नही था! इसलिए चुपचाप, अपने अनुत्तरित प्रश्नों के साथ वापस शहर चला गया! और नही जान पाया कि आखिर ये क्या नियम है? और क्यों है?   

1 comments:

  1. har samay ke saskar hote hai kisi bhi soch ko galat nahi kah sakte jo dada ji ki nazar me galat hai woh aj sahi hai kuki samay se vicar badlt rahte hai

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget