कल हिंदी दिवस पर कई हिंदी सेवियों से मुलाकात हुई। 2012 में हिंदी सेवी होना आसान काम नहीं है। जोहानिसबर्ग दक्षिण अफ्रीका तक जाना पड़ेगा हिंदी योद्धाओं को विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी बचाने को। हिंदी के हक के लिए जोहानिसबर्ग तक जाना पड़ता है घर परिवार को यहां छोड़कर, (दांव लग जाए) तो परिवार को ले जाया जा सकता है। पीत ज्वर का टीका तक लगाना पड़ता है (विश्व हिंदी सम्मेलन की वेबसाइट की ताकीद के मुताबिक)। कई सीनियर हिंदी सेवी जुगाड़ में हैं कि हिंदी के लिए दक्षिण अफ्रीका हो आएं सरकारी खर्च पर।

हिंदी की ऐसी सेवा का मौका कई सालों में एकाध बार आता है। हिंदी सेवी तीन प्रकार के हैं- एक लोकल स्तर के, दूसरे राष्ट्रीय स्तर के और तीसरे ग्लोबल स्तर के। लोकल स्तर के हिंदी सेवी यूं करते हैं कि हिंदी दिवस पर उखर्रा के चमेली देवी राष्ट्रीय इंटर कॉलेज में हिंदी के महत्व पर भाषण कर आते हैं। समोसा, चाय, बरफी मिलती है इस हिंदी सेवा में। राष्ट्रीय स्तर के हिंदी सेवी किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी के हिंदी बजट में फर्स्ट एसी में यात्रा कर आते हैं और हिंदीवालों को हिंदी का महत्व दोबारा-तिबारा तक बता आते हैं। राष्ट्रीय हिंदी सेवीजी मध्यभारत हिंदी समिति के टीए डीए बिल दाबे, परस्पर वार्तारत रहते हैं कि इस बार अहमदाबाद हिंदी परिषद ने ना बुलाया हिंदी का वह महत्व सुनने, जो वो पिछले बीस साल से सुनते आ रहे हैं।

ग्लोबल हिंदी सेवी जोहानिसबर्ग, लंदन तक हिंदी मचा आते हैं। कई हिंदीसेवियों से बातचीत हुई, तो साफ  हुआ कि लोकल स्तर का हिंदी सेवी भी जोहानिसबर्ग में हिंदी के लिए जूझने को उत्सुक ही नहीं, आतुर होता है। हिंदी सेवा लोकल हो, तो मजा कम सा आता है। जोहानिसबर्ग हो जाएगा इस बार। भइया अगली बार किसी सही जगह करवाना, क्या पता मेरा भी दांव लग जाए सरकारी खर्च पर हिंदी का ग्लोबल योद्धा बनने का।

डिस्क्लेमर - अगर विश्व हिंदी सम्मेलन, जोहानिसबर्ग में सरकारी खर्च पर जाने का मेरा दांव इसी बार लग जाए तो माना जाए कि मैंने ये लेख लिखा ही नहीं।
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3 comments:

  1. मेरा भारत महान! अपनी राष्टृभाषा...सॉरी, राजभाषा की सेवा के लिए विदेश जाना पड़ता है...।
    इट हैप्पेन्स ओन्ली इन इण्डिया...।
    बहुत बढ़िया...बधाई...।

    प्रियंका

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