जहां मेरी याद बैठी है 

उस कमरे में मेरी याद बैठी है
जहां शाम के वक्‍त खिड़की से
हल्‍दी जैसा पीला प्रकाश भर जाता है
तुम्‍हारी देह को और कान्तिवान करता हुआ

रसोई के दरवाज़े के ठीक सामने की
उसी खिड़की में
तुम्‍हारे केशों में वेणी बनने को आतुर
मोगरे के फूल महकते हैं

सोफे पर बैठी मेरी याद
देखती रहती है तुम्‍हें
मोगरे की ख़ुश्‍बू को
मसालों के साथ छौंकते हुए

मेरी याद के पहलू में
जब तुम बैठ जाती हो तो
खिलखिलाने लगता है मोगरा
और हंसते हुए कहता है
लो, इसने तो प्‍यार में
मेरी महक भी छौंक दी
और ठठा कर हंस पड़ती है मेरी याद।

आठ के बारे में 

लिखने में वह शून्‍य और एक के बाद
सबसे आसान
देखने में सबसे दर्शनीय
बेहद कल्‍पना-प्रवण

एक जोड़ी जिंदा आंखें
एक दूसरे पर बैठी हों जैसे
किसी महिला का फ्रेंच जूड़ा हो या कि
लेटी हुई स्‍त्री को देखना
किसी अलग ही कोण से

गांधी जी का चश्‍मा है वह खड़ा हुआ कि
चांद और सूरज एक साथ दिखें
अंतरिक्ष में किसी ग्रह से

आठ के ठाठ निराले हैं
किसी आठ तारीख को मिले थे हम
किसी आठ को फिर मिलने वाले हैं
आठों पहर याद आती है तुम्‍हारी
उफ्फ... यह आठ है कि प्रेम की गांठ है
हम दोनों को बांधती हुई
हम आठ की पगडण्‍डी पर चलते हैं
यही प्रेमपंथ है प्रिये।

ये ग़ुलाम हाथ 

मेरा क्‍या है
मैं तो तुम्‍हारा पल्‍लू पकड़कर
कहीं भी तुम्‍हारे साथ चलता चला जाऊंगा
लेकिन तुम क्‍या करोगी

मैंने तो कमीज़ भी पतलून में दबा रखी है
तुम कौन-सा सिरा पकड़ोगी मेरा
या कि सीधे बांह पकड़ोगी
कॉलर-टाई तो बदतमीज़ों की पकड़ी जाती है

मेरे हाथों का हाल क्‍या कहूं प्रिये
रोज़ी के लिए गिरवी रख दिये हैं मैंने हाथ
दो वक्‍त की रोटी और
थोड़ी-सी ख़ुशी के लिए
न जाने कहां-कहां जुड़ते हैं ये हाथ
सलाम ठोकते हैं और
लगातार काम में जुटे रहते हैं

इन ग़ुलाम हाथों को थाम कर
तुम कहां जाओगी प्रिये
मत थामो मेरे हाथ
बस थाम लो मेरा वज़ूद अपनी बांहों में और
पल्‍लू से ढंक लो हम दोनों के सिर।

कविता में तुम्‍हारा आना 

तुम आईं मेरी कविता में
जैसे सूर्य के साथ आती है उषा
बारिश के साथ आता है
अनार के दानों में रंग और मिठास
जैसे जाड़े के दिनों में
धूप और उजास
मटर के दानों में जैसे रचता है
रस का महारास

जैसे सांध्‍य-रवि के बाद आती है
तारिकाओं के साथ रजनी
जिंदगी में नया चांद लेकर
किरणों का जादुई चन्‍दोवा ताने हुए
जैसे चेतना में गूंजती है
बचपन की कोई अबोध खिलखिलाहट
जैसे समय के साथ आती है
मनुष्‍य में प्रज्ञा
जैसे अचानक आती है कोई पंक्ति
कविता को अर्थवान बनाती हुई।

अपने ईश्‍वर से कहना 

कहां और कैसे सम्‍हाल पाउंगा मैं इतना प्रेम
जो लुटाये जा रही हो तुम
क्‍या करूंगा मैं इतने उपहारों का
कैसे जवाब दूं तुम्‍हारी मनुहारों का

मुझे देखते ही तुम्‍हारी आंखों में आ जाती है
ममत्‍व की एक अद्भुत चमक
झूठ और फरेब की दुनिया में
तुम्‍हारा निश्‍छल प्रेम
जैसे रेत के धोरों में
हंसता हुआ रोहिड़ा

तुम तो रोज़ करती हो पूजा-प्रार्थना
अपने ईश्‍वर से कहना
मुझे भी सिखा दे
तुम्‍हारी तरह प्रेम करना-लुटाना
ताकि कुछ तो कर सकूं मैं
तुम्‍हारे प्रेम का प्रतिदान।

----- 
प्रेमचन्द गाँधी; परिचय जयपुर में 26 मार्च, 1967 को जन्‍म। एक कविता संग्रह ‘इस सिंफनी में’ और एक निबंध संग्रह ‘संस्‍कृति का समकाल’ प्रकाशित। समसामयिक और कला, संस्‍कृति के सवालों पर निरंतर लेखन। कई नियमित स्‍तंभ लिखे। सभी पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। कविता के लिए लक्ष्‍मण प्रसाद मण्‍डलोई और राजेंद्र बोहरा सम्‍मान। अनुवाद, सिनेमा और सभी कलाओं में गहरी रूचि। विभिन्‍न सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी। कुछ नाटक भी लिखे। टीवी और सिनेमा के लिए भी काम किया। दो बार पाकिस्‍तान की सांस्‍कृतिक यात्रा। 

13 comments:

  1. मेरी याद के पहलू में
    जब तुम बैठ जाती हो तो
    खिलखिलाने लगता है मोगरा
    और हंसते हुए कहता है
    लो, इसने तो प्‍यार में
    मेरी महक भी छौंक दी
    और ठठा कर हंस पड़ती है मेरी याद।

    तुम तो रोज़ करती हो पूजा-प्रार्थना
    अपने ईश्‍वर से कहना
    मुझे भी सिखा दे
    तुम्‍हारी तरह प्रेम करना-लुटाना
    ताकि कुछ तो कर सकूं मैं
    तुम्‍हारे प्रेम का प्रतिदान।

    उत्तर देंहटाएं
  2. 'तुम्हारे केशों में वेणी बनने को आतुर
    मोगरे के फुल महकते हैं '
    प्रेम महकता है ! ऐसा प्रेम करने का आभार .
    .मोगरे के खुशबू में मसालों की छोंक तुम्हारा प्रेम
    ब्याह के बाद का प्रेम.....(.केन्द्रीय मंत्री जायसवाल साहब गौर फरमाएं ज़रा )
    यहाँ के गृहस्थ में उबाउपन नहीं हैं , 'प्रेम की गाँठ हैं ' 'दोनों को बांधती है'
    'सूर्ये के साथ आती है उषा ' ' मटर के दानों में रचता है रस का महारास'
    जीवन के संग्राम में संघर्ष करता परिवार , जहाँ स्त्री की महता सहज ही जीवन को उदातत्ता प्रदान करती है -'बस थाम लो मेरा वजूद अपनी बांहों में और पल्लू से ढक लो हम दोनों के सिर'
    पुरुष अहं से दूर एक ईमानदार स्वीकार-
    काश! 'मुझे भी ऐसा ही प्रेम करना आए'
    चेतनशील कवि का स्त्री के प्रति बराबरी का भाव, जो समाज की उस व्यवस्था, जिसमें पुरुष ने स्त्री को मात्र भोग्या बनाकर प्रस्तुत किया है को लेकर ग्लानी से भरा है 'ताकि कुछ तो कर सकूँ मैं '
    'प्रतिदान' करना चाहता हैं .......इस प्रतिदान के लिए प्रेम भाई को आदाब !

    उत्तर देंहटाएं
  3. इन ग़ुलाम हाथों को थाम कर
    तुम कहां जाओगी प्रिये
    मत थामो मेरे हाथ
    बस थाम लो मेरा वज़ूद अपनी बांहों में और
    पल्‍लू से ढंक लो हम दोनों के सिर।......
    too good
    बस उस पल्लू में ही समा जाती है कायनात

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  4. bina kish atirikt shringaar ke saadgi se prem ki sahaj sunder abhivaykti.....badhai.....meenakshi jijivisha

    उत्तर देंहटाएं
  5. prem ki chah me,prem ki raah me,sugandhit mongre ki tarah kushbu bikherti hui prem ki aanaya bhav jisme kahi bhi swarth ki bhawna dhumil nhi hoti hai

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही उत्कृष्ट रचनाएं हैं |

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही सुंदर प्रेम कवितायेँ हैं

    उत्तर देंहटाएं
  8. अच्छी कविताओं के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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